इन्द्रप्रीत सिंह, चंडीगढ़। युवाओं में अपनी खास पहचान रखने वाले प्रसिद्ध पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला का राजनीति में उतरना कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी पंजाब की राजनीतिक पार्टियां कलाकारों और खासतौर पर गायकों को उतारती रही हैं और ज्यादातर कलाकारों को राजनीति में सफलता भी मिली है। मूसेवाला द्वारा अपने गानों में गन कल्चर को बढ़ावा देने के कारण कांग्रेस भले ही विवादों में घिर गई है, लेकिन पार्टी के इस कदम से विपक्षी खेमे में चिंता भी बढ़ गई है। 1992 से ही कांग्रेस की स्टेजों पर गाने वाले लोक गायक मोहम्मद सद्दीक हों या हंस राज हंस, कामेडियन गुरप्रीत घुग्गी, भगवंत मान, फिल्म अभिनेता सनी देयोल आदि भी राजनीति में अच्छा मुकाम पा चुके हैं। ये फेहरिस्त बहुत लंबी है।

दरअसल, युवाओं को अपने खेमे में लाने के लिए राजनीतिक पार्टियां कलाकारों का सहारा लेती रही हैं। उनके क्रेज का जादू युवाओं पर इस कदर सिर चढ़कर बोलता है कि वह चुनाव से कुछ ही दिन पूर्व टिकट पाने पर भी सालों से राजनीतिक जमीन पर पांव जमाए हुए खिलाड़ियों को पलट देते हैं। ऐसे कई उदाहरण हमारे सामने हैं।

इसकी शुरुआत बलवंत सिंह रामूवालिया से हुई। कविशर करनैल सिंह पारस के बेटे बलवंत सिंह खुद भी कविशरी का गायन करते रहे हैं। स्टेजों पर रैलियों से पूर्व अपनी कविशरी के जरिए रंग बांधने वाले रामूवालिया ने अपनी कविशरी के जरिए ही राजनीति में कदम रखा और केंद्रीय मंत्री तक बने।

लोक गायक मोहम्मद सद्दीक तो लंबे समय से ही कांग्रेस के साथ जुड़े हुए हैं। पहले 2012 में उन्होंने भदौड़ हलके से तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के प्रिंसिपल सेक्रेटरी रहे दरबारा सिंह गुरु को हराया और बाद में फरीदकोट हलके से जीत हासिल करके लोकसभा की सीढ़ियां भी चढ़े। भगवंत मान को राजनीति में मनप्रीत बादल लाए जब उन्होंने अपनी पीपीपी बनाई। बेशक वह अपना पहला चुनाव लहरागागा हलके से राजिंदर कौर भट्ठल से हार गए, लेकिन उसके बाद संगरूर लोकसभा चुनाव उन्होंने दो बार भारी मतों से जीता और इस समय में भी वह आम आदमी पार्टी की ओर से सीएम पद की प्रबल दावेदार हैं।

आम आदमी पार्टी में प्रांतीय संयोजक रहे गुरप्रीत घुग्गी भी इसी क्षेत्र से आए हैं। हालांकि उन्हें राजनीति सफलता नहीं मिली इसलिए वह वापस अपनी दुनिया में लौट गए। सूफी गायक हंस राज हंस को शिरोमणि अकाली दल राजनीति में लाई और उन्हें जालंधर से संसदीय चुनाव भी लड़वाया गया, लेकिन वह हार गए। कुछ देर बाद उन्होंने शिअद को अलविदा कहकर कांग्रेस का हाथ थाम लिया, लेकिन यह यारी भी ज्यादा देर तक नहीं चली और वह भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा ने उन्हें दिल्ली से संसदीय चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिया तो उन्हें सफलता भी मिल गई।

इससे पहले भी भाजपा ने गुरदासपुर से विनोद खन्ना को कांग्रेस की सुखबंस कौर भिंडर के खिलाफ जो लगातार लोकसभा का चुनाव जीत रहीं थीं। विनोद खन्ना ने यह चुनाव दो बार जीता। उनके बाद पार्टी ने दो बार यह सीट गंवाई लेकिन जब एक बार फिर फिल्मी कलाकार सन्नी देयोल को मैदान में उतारा तो पार्टी को जीत का स्वाद मिला।

ऐसा नहीं है कि जो कलाकार यहां खड़े किए जाते हैं वह जीतते ही रहे हैं। उन कलाकारों की फेहरिस्त भी काफी लंबी है जो सफलता का स्वाद नहीं चख सके। ऐसे कलाकारों में पंजाबी कलियों के बादशाह कुलदीप माणक का नाम भी आता है जो बठिंडा से चुनाव मैदान में उतरे। उनकी रैलियों की भीड़ देखकर लगता था कि वह अपने विरोधियों की जमानतें जब्त करवा देंगे, लेकिन खुद ही बहुत बुरी तरह से हार गए। गायक बलकार सिद्धू बेशक आप में रहे या कांग्रेस में उन्हें सफलता नहीं मिली। विधायक जस्सी जसराज हों या केएस मक्खण, सतविंदर बिट्टी हों या फिर बलदीप सिंह इन्हें भी सियासत में सफलता नहीं मिली। सोनिया मान भी अकाली दल से जुड़ी हैं।

Edited By: Kamlesh Bhatt