अमृतसर बीआरटीएस बंद करने पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट सख्त, 600 करोड़ के खर्च पर सरकार से मांगा जवाब
अमृतसर में 600 करोड़ रुपये की लागत से बनी बीआरटीएस परियोजना को बंद करने के प्रस्ताव पर पंजाब एवं हरियाणा ...और पढ़ें

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट फाइल फोटो
HighLights
हाईकोर्ट ने अमृतसर बीआरटीएस बंद करने पर सवाल उठाए।
600 करोड़ खर्च के बाद परियोजना बंद करने का कारण पूछा।
सरकार से मूल व बाद की रिपोर्ट पेश करने को कहा।
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। अमृतसर में करीब 600 करोड़ रुपये की लागत से शुरू की गई बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (बीआरटीएस) परियोजना को बंद करने के प्रस्ताव पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने पंजाब सरकार से परियोजना की मूल रिपोर्ट और इसे बंद करने के समर्थन में तैयार की गई बाद की रिपोर्ट पेश करने को कहा है।
हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया आशंका जताई कि परियोजना पर खर्च किए गए सैकड़ों करोड़ रुपये कहीं अनुपयोगी न हो जाएं। अदालत ने सरकार से यह भी स्पष्ट करने को कहा कि करीब 10 वर्ष बाद परियोजना बंद करने की जरूरत क्यों पड़ी और अब इसका क्या विकल्प प्रस्तावित है।
मुख्य न्यायाधीश अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की खंडपीठ ने राज्य सरकार के वकील को दोनों रिपोर्ट रिकार्ड पर रखने का निर्देश दिया। अदालत के अनुसार, मूल रिपोर्ट से पता चलेगा कि बीआरटीएस की परिकल्पना किस उद्देश्य से की गई और इसे किस आधार पर मंजूरी मिली। वहीं, बाद की रिपोर्ट से परियोजना बंद करने का प्रस्ताव तैयार करने का आधार स्पष्ट होगा।
खंडपीठ ने टिप्पणी की कि पहले की रिपोर्ट के आधार पर खर्च की गई सैकड़ों करोड़ रुपये की राशि अनुपयोगी रह सकती है। इसलिए परियोजना बंद करने के फैसले और उसके आधार की जांच जरूरी है।
600 करोड़ रुपये खर्च से जुड़ा मामला
यह मामला अमृतसर विकास मंच की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि करीब 600 करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद बीआरटीएस परियोजना को उचित कारण के बिना बंद किया जा रहा है। इससे सरकारी धन की बर्बादी होगी और आम जनता को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
सुनवाई में बताया गया कि पंजाब सरकार परियोजना बंद करने के प्रस्ताव को फिलहाल स्थगित कर चुकी है। पिछली सुनवाई पर राज्य के महाधिवक्ता ने हाईकोर्ट को यह जानकारी दी थी। अदालत ने फिर भी परियोजना के भविष्य और सार्वजनिक धन के उपयोग पर विस्तृत जवाब मांगा है।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था कि संबंधित विभाग के सचिव से नीचे के स्तर का अधिकारी नहीं, बल्कि जिम्मेदार अधिकारी हलफनामा दाखिल करे। इसमें बताया जाए कि परियोजना शुरू करते समय क्या योजना बनाई गई थी, इस पर कितना सार्वजनिक धन खर्च हुआ और लगभग एक दशक बाद इसे बंद करने की जरूरत क्यों महसूस हुई। हलफनामे की प्रति अगली सुनवाई से कम से कम 24 घंटे पहले याचिकाकर्ता को देने का भी निर्देश है।
