पंजाब चुनाव 2027: बिना आदेश के बदल जाता है 69 सीटों का गणित, मालवा में क्यों सबसे अहम है राधा स्वामी डेरा?
पंजाब चुनाव 2027 से पहले राजनीतिक दलों की नजरें डेरा राधा स्वामी सत्संग ब्यास पर टिकी हैं, जो सीधे तौर ...और पढ़ें

डेरा राधा स्वामी सत्संग ब्यास (Radha Swami Satsang Beas)।
HighLights
डेरा ब्यास पंजाब की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है
2 करोड़ से अधिक अनुयायी, 90 देशों में विशाल सामाजिक दायरा
2027 चुनाव से पहले नेता डेरा प्रमुख से आशीर्वाद ले रहे
नितीश कुशवाहा/विपिन कुमार राणा, अमृतसर। पंजाब चुनाव 2027 की सरगर्मियां तेज हैं और अभी से सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी-अपनी तैयारियों में जुट गई हैं। पंजाब की सियासत को समझने के लिए मालवा क्षेत्र की राजनीति को समझना बेहद जरूरी है। मालवा को पंजाब का राजनीतिक दिल भी कहा जाता है और राज्य की सत्ता की चाबी इसे क्षेत्र के हाथ में है।
पंजाब का मालवा क्षेत्र सतलुज नदी के दक्षिण में स्थित है, जिसके अंतर्गत लुधियाना, पटियाला, बठिंडा, संगरूर, मोगा, मुक्तसर, मानसा, फिरोजपुर और फरीदकोट जैसे जिले आते हैं। सतलुज पार करते ही पंजाब की सियासत और समाजिक मिजाज दोनों की बदलने लगते हैं।
117 में से 69 सीटें अकेले मालवा से
मालवा क्षेत्र सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक, तीनों रूप से पंजाब का सबसे संवेदनशील और बेहद प्रभावशाली इलाका माना जाता है। पंजाब की 117 में से 69 सीटें अकेले मालवा से आती हैं और इस क्षेत्र में एक ऐसी धार्मिक संस्था काम करती है, जो न तो कभी चुनाव लड़ती है, न ही अपने मंच से सीधे किसी के लिए वोट मांगती है, लेकिन प्रभाव इतना कि जब भी कोई चुनाव नजदीक आता है तो बड़े-बड़े नेता आए दिन यहां चक्कर के लगाते रहते हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं डेरा राधा स्वामी सत्संग ब्यास (डेरा ब्यास) की।
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वैसे पंजाब की चुनावी बिसात पर धार्मिक डेरों का दखल नया नहीं है, लेकिन 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के बीच सियासी दलों की दौड़ फिर से ब्यास की ओर तेज हो गई है। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल, ये चारों प्रमुख दलों के दिग्गज डेरा प्रमुख से मुलाकात कर आशीर्वाद लेने की होड़ में हैं।
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पंजाब के अन्य डेरों से उलट, राधा स्वामी सत्संग ब्यास (डेरा ब्यास) न तो कोई सियासी विंग चलाता है और न ही संगत को किसी दल विशेष के हक में मतदान करने का कोई खुला फरमान या आदेश जारी करता है।
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आइए जानते हैं राधा स्वामी सत्संग ब्यास और डेरा ब्यास को आखिर पंजाब की राजनीति में नजरअंदाज क्यों नहीं किया सकता?, की पूरी इनसाइड स्टोरी...
3000 एकड़ में फैला विशाल केंद्र
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डेरा ब्यास की असली ताकत उसका अनुशासित सांगठनिक ढांचा और विशाल सामाजिक दायरा है। अमृतसर जिले में ब्यास दरिया के किनारे स्थित डेरा बाबा जैमल सिंह (डेरा ब्यास) का मुख्य मुख्यालय लगभग 3,000 एकड़ में फैला हुआ है।
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यह अपने आप में एक आत्मनिर्भर शहर जैसा है, जिसमें एशिया के सबसे बड़े कवर्ड शेड(लगभग 32 एकड़ से अधिक), करीब 48 एकड़ में फैला विशाल लंगर हॉल, 1200 एकड़ से अधिक में प्राकृतिक खेती और अत्याधुनिक चैरिटेबल अस्पताल शामिल हैं।
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90 से अधिक देशों में विस्तार
डेरे का दायरा केवल पंजाब तक सीमित नहीं है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, स्पेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान और अफ्रीकी देशों सहित दुनिया के 90 से अधिक देशों में डेरे के केंद्र और सत्संग इकाइयां (साइंस ऑफ द सोल स्टडी सेंटर्स) सक्रिय हैं।
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भारत भर में डेरा ब्यास के करीब 5,000 से अधिक उप-केंद्र और सत्संग घर स्थापित हैं, जबकि विश्वभर में संबद्ध केंद्रों की संख्या हजारों में है। देश-विदेश में डेरा ब्यास से जुड़े श्रद्धालुओं और पंजीकृत संगत का आंकड़ा 2 करोड़ से अधिक माना जाता है।
आदेश नहीं, फिर भी अहम है आशीर्वाद
वैसे तो पंजाब के कई डेरे सीधे तौर पर अपनी राजनीतिक शाखाओं के जरिए उम्मीदवारों की सूची जारी करते रहे हैं या खुलेआम समर्थन देते हैं, जिससे कई बार सामाजिक ध्रुवीकरण भी देखने को मिला। लेकिन डेरा राधा स्वामी सत्संग ब्यास ने इसके विपरीत हमेशा तटस्थता की सार्वजनिक छवि बनाए रखी है।
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डेरा प्रमुख कभी किसी पार्टी या प्रत्याशी के नाम की पर्ची जारी नहीं करते। संगत में हर जाति, वर्ग और राजनीतिक विचारधारा के लोग शामिल हैं। इसके बावजूद नेताओं की ब्यास दौड़ के पीछे तीन बड़े सियासी कारण हैं।
माझा और दोआबा के 48 हलकों में निर्णायक स्थिति
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पंजाब की कुल 117 विधानसभा सीटों में से माझा की 25 और दोआबा की 23 सीटों (कुल 48 सीटें) पर डेरा ब्यास का सामाजिक प्रभाव सबसे अधिक माना जाता है। ब्यास खुद अमृतसर ग्रामीण और तरनतारन-कपूरथला की सीमाओं से सटा हुआ है।
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अमृतसर, गुरदासपुर, जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला और नवांशहर जिलों के दर्जनों विधानसभा क्षेत्रों में डेरे से जुड़ी संगत की आबादी 15 से 25 प्रतिशत तक प्रभाव रखती है। बहुकोणीय मुकाबलों में जहां जीत-हार का अंतर 2,000 से 5,000 वोटों का रह जाता है, वहां यह प्रभाव किसी भी उम्मीदवार का खेल बना या बिगाड़ सकता है।
पंजाब चुनाव 2027 से पहले तेज हुई सियासी बिसात
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हाल के दिनों में अकाली दल के वरिष्ठ नेता बिक्रम सिंह मजीठिया सहित सत्ताधारी आम आदमी पार्टी और भाजपा नेताओं की ब्यास यात्राओं ने सियासी पारे को गरमा दिया है। डेरा प्रमुख बाबा गुरिंदर सिंह ढिल्लों द्वारा जसदीप सिंह गिल को अपने उत्तराधिकारी के तौर पर आगे लाने के बाद सांगठनिक स्थिरता को लेकर जो संदेश गया है, उस पर भी सभी सियासी दलों की बारीक नजर है।
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पंजाब की राजनीति के जानकारों का कहना है कि 2027 का दंगल बेहद कड़ा होने वाला है। ऐसे में डेरा ब्यास बिना किसी राजनीतिक नारे के भी पंजाब के सत्ता गलियारों का वह ध्रुव बना रहेगा, जिसे साधे बिना चंडीगढ़ की कुर्सी तक पहुंचना किसी भी दल के लिए आसान नहीं होगा।
