कानपुर,जागरण संवाददाता। 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद से अब तक 42 वर्ष में उसकी जितनी भी सरकारें बनी हैं, पहला मौका है जब कानपुर के पास कोई मंत्री पद नहीं है। इस बार चुनाव में भाजपा के पास 10 में से छह विधायक थे। औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना और उच्च शिक्षा राज्यमंत्री नीलिमा कटियार भी अपने चुनाव जीत गई थीं लेकिन उन्हें क्या बाकी चार में से भी किसी को मंत्री पद नहीं दिया गया। दूसरी ओर मात्र चार विधानसभा क्षेत्र वाले कानपुर देहात जिले में तीन मंत्री दिए गए। अब शहर के बड़े प्रोजेक्ट जिन पर कार्य चल रहा है या जिन्हें अभी शुरू होना है, उनमें पैरवी का संकट पैदा हो गया है।

भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश में पहली बार 1991 में सरकार बनाई थी, उस सरकार में कानपुर से प्रेमलता कटियार, बालचंद मिश्रा कैबिनेट मंत्री थे। वहीं सतीश महाना राज्यमंत्री थे। 1996 में पार्टी की फिर सरकार आई तो इन तीनों को फिर मंत्रिमंडल में शामिल होने का मौका मिला। 2002 में जब पार्टी मिलीजुली सरकार में आई तो कानपुर से प्रेमलता कटियार कैबिनेट और सतीश महाना मंत्रिमंडल में शामिल हुए।

2017 में जब योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने तो कानपुर से सतीश महाना, सत्यदेव पचौरी मंत्री बने। जब मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ तो कानपुर से ही कमल रानी वरुण और नीलिमा कटियार को भी मौका मिला। चुनाव से ठीक पहले तक सतीश महाना और नीलिमा कटियार कानपुर से मंत्रिमंडल में शामिल थे।

इस चुनाव में सतीश महाना प्रदेश ने लगातार आठवीं जीत हासिल की। वह प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से शीर्ष 15 विधायकों में शामिल हैं जिन्हें कुल पड़े वोट का सबसे ज्यादा प्रतिशत वोट मिला। दूसरी ओर नीलिमा कटियार ने भी अपनी सीट जीत ली।

इनके अलावा कानपुर से सुरेंद्र मैथानी, अभिजीत सिंह सांगा, महेश त्रिवेदी, राहुल बच्चा भी विधायक बने हैं लेकिन उन्हें भी मौका नहीं मिला।

दूसरी ओर कानपुर देहात से बनाए गए राकेश सचान, अजीत पाल सिंह, प्रतिभा शुक्ला को मत्री पद मिला है लेकिन जब कुछ पहल करने की बात आएगी तो वे अपने जिले को सुविधाएं देंगे, जहां से वे जीते हैं और वहां अभी ठीक से विकसित नगरीय क्षेत्र, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट कुछ भी नहीं है। कानपुर के बारे में सोचने का उनके पास बहुत मौका नहीं होगा।

Edited By: Abhishek Verma