चंडीगढ़ [अनुराग अग्रवाल]। हरियाणा की 43 साल की राजनीति में 30 साल तक राज करने वाली कांग्रेस का सफर कभी एक जैसा नहीं रहा। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटे हरियाणा में कांग्रेस का राजनीतिक सफर अक्सर हिचकोले खाता दिखाई दिया। यहां के दिग्गज नेताओं ने पार्टी हाईकमान की कभी खास परवाह नहीं की। अपनी तरह की राजनीति करने के आदी रहे इन नेताओं की गुटबाजी को दिल्ली दरबार से अक्सर हवा मिली, जिसका नतीजा यह रहा कि हरियाणा कांग्रेस अपनी परपंरागत गुटबाजी और एक-दूसरे की टांग खिंचाई की पुरानी आदत से आज तक उबर नहीं पाई। जनता पार्टी, लोकदल, हविपा और भाजपा ने समय-समय पर कांग्रेस की इस गुटबाजी को अपने फायदे के रूप में इस्तेमाल किया है।

हरियाणा की राजनीति में कांग्रेस का मजबूत और प्रभावशाली दखल किसी से छिपा नहीं है। पंडित भगवत दयाल शर्मा, राव बीरेंद्र और बनारसी दास गुप्ता से लेकर चौ. देवीलाल, चौ. बंसीलाल, चौ. भजनलाल और भूपेंद्र सिंह हुड्डा तक बड़े नेता कांग्रेस की ही देन हैं। गुटबाजी और सत्ता में स्थापित रहने की ललक ने इन नेताओं को राजनीति का मंजा हुआ खिलाड़ी बना दिया।

कांग्रेस की एक बड़ी कमजोरी यह रही कि वह अपने इन नेताओं को कभी तरीके से साध नहीं पाई। कांग्रेस ने उन्हें आपस में लड़ने तथा एक-दूसरे को पछाड़ने की लड़़ाई में उलझाकर रखा। इसका असर आज तक महसूस किया जा रहा है। अब कांग्रेस पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा, डा. अशोक तंवर, कुलदीप बिश्नोई, कु. सैलजा, रणदीप सिंह सुरजेवाला, किरण चौधरी और कैप्टन अजय यादव के खेमों में बंटी है। यह अलग बात है कि अशोक तंवर को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी से उतारकर हुड्डा और सैलजा ने हाथ मिला लिए।

एक नवंबर 1966 को हरियाणा बना था। इससे पहले हरियाणा संयुक्त पंजाब का हिस्सा हुआ करता था। पंजाब में उस समय हरियाणा के कांग्रेस विधायकों का अच्छा खासा दबदबा था। तब 1966 में पंडित भगवत दयाल शर्मा को हरियाणा का पहला मुख्यमंत्री बनाया गया। हरियाणा बनने के एक साल बाद ही 1967 में हरियाणा में आया राम गया राम की राजनीति का दौर शुरू हो गया। उस समय 81 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस के 48 सीटें जीतने के बावजूद राव बीरेंद्र हरियाणा के सीएम बने। राव उस समय कांग्रेस से बाहर चले गए थे। इसके बाद हर चुनाव में कांग्रेस नेताओं ने एक दूसरे को पटखनी देने की अपनी कला का नमूना दिखाने में कोई कमी नहीं रखी।

हरियाणा में सात बार कांग्रेस की सरकारें रहीं हैं। दो बार चौ. बंसीलाल मुख्यमंत्री बने तो तीन बार चौ. भजनलाल ने सत्ता संभाली। चौ. देवीलाल कांग्रेस की विचारधारा के जरूर थे, लेकिन इस पार्टी के बैनर तले वह सीएम नहीं रहे। कांग्रेस ने उन्हें खादी बोर्ड का चेयरमैन जरूर बनाया। भूपेंद्र सिंह हुड्डा को कांग्रेस में लगातार दस साल तक मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल है। अब वह कु. सैलजा के साथ मिलकर भाजपा को चुनौती देने की लड़ाई लड़ रहे हैं। प्रदेश में कांग्रेस के इस समय 17 विधायक हैं, जिनमें हजकां का कांग्रेस में विलय करने वाले कुलदीप बिश्नोई और उनकी पत्नी रेणुका बिश्नोई भी शामिल हैं।

अशोक तंवर को पद से हटाने की मुहिम में शामिल सोनीपत के राई से विधायक जयतीर्थ दहिया इस्तीफा दे चुके हैं। कांग्रेस के पास इस समय 16 विधायक हैं, जिनमें 12 विधायक हुड्डा के साथ हैं। हरियाणा कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन के बाद अब पूरी चुनावी लड़ाई का दारोमदार हुड्डा और सैलजा की जोड़ी पर आ गया है, जिसे अशोक तंवर, कुलदीप बिश्नोई, किरण चौधरी और रणदीप सुरजेवाला को साथ लेकर चलने की बड़ी चुनौती है। कैप्टन अजय को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस उन्हें साध चुकी है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर और मुख्यमंत्री मनोहर लाल के कामों के चलते जिस तरह की यह चुनावी लड़ाई है, उसमें कांग्रेस की गुटबाजी सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।

कांग्रेस के कमजोर पहलू

  • कांग्रेस नेताओं की महत्वाकांक्षा पार्टी का सबसे कमजोर पक्ष है।
  • ताऊ देवीलाल, चौ. बीरेंद्र सिंह, राव इंद्रजीत इसी अनदेखी के कारण पार्टी से छिटके।
  • गुटबाजी ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया। चौटाला परिवार के बिखराव का फायदा नहीं ले पाए हरियाणा के नेता।
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उदय और मनोहर लाल के काम कांग्रेस को ले बैठे।

कांग्रेस के मजबूत पहलू

  • कांग्रेस कितनी भी गुटबाजी की शिकार रही, लेकिन उसका काडर बेस कार्यकर्ता हमेशा एक्टिव रहा।
  • सत्ता में रहने की कांग्रेस कार्यकर्ता की ललक ने उसे एक्टिव बनाए रखा।
  • कांग्रेस भले ही कितने भी गुटों में बंटी रही, लेकिन हर गुट के नेता ने अपने-अपने ढंग से पार्टी की गतिविधियों को बढ़ावा दिया।
  • कांग्रेस को राष्ट्रीय पार्टी होने का लाभ मिला।

हरियाणा के अब तक के चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन

  • 1966 में संयुक्त पंजाब से हरियाणा अलग हुआ और पंडित भगवत दयाल शर्मा राज्य के पहले सीएम बने
  • 1967 में पहला चुनाव हुआ। आया राम गया राम की राजनीति की शुरुआत। 81 सदस्यीय विधानसभा में 48 सीटें कांग्रेस ने जीती। फिर भी राव बीरेंद्र सीएम बने।
  • 1968 में 81 में से 48 सीटें कांग्रेस को मिली और बंसीलाल सीएम बने। सात साल सीएम रहे।
  • 1972 में 81 में से 51 सीटें करांग्रेस ने जीती और बंसीलाल व बनारसी दास गुप्ता सीएम बने।
  • 1977 में 90 विधानसभा हो गई। जनता पार्टी ने 75 सीटें और कांग्रेस ने मात्र 3 सीटें जीती। पहले देवीलाल फिर भजनलाल सीएम बने।
  • 1982 में 36 सीटें कांग्रेस ने जीती और राजनीतिक उठापटक के बीच सीएम पहले भजनलाल, फिर बंसीलाल और फिर देवीलाल बने।
  • 1987 में लोकदल, बीजेपी ने 76 सीटें जीती और कांग्रेस पांच सीटों पर सिमट गई।
  • 1991 में 51 सीटें जीतकर भजनलाल सीएम बने।
  • 1996 में हविपा व भाजपा ने 44 सीटें जीती और कांग्रेस 9 सीटों पर रह गई।
  • 2000 में इनेलो व भाजपा ने 53 सीटें जीती और कांग्रेस ने 21 सीटें जीती।
  • 2005 में कांग्रेस ने 67 सीटें जीती और भजनलाल की पीएचडी को उलटकर भूपेंद्र हुड्डा सीएम बने।
  • 2009 में कांग्रेस ने 40 सीटें जीती। निर्दलीय विधायकों के सहयोग से हुड्डा ने फिर सरकार बनाई।
  • 2014 में भाजपा ने 47 सीटें और कांग्रेस ने 15 सीटें जीती तथा मनोहर लाल भाजपा सरकार में सीएम बने।

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