लखनऊ, जेएनएन। लोकसभा चुनाव में गठबंधन के वोटों की खुराक से कुछ मजबूत होता नजर आया हाथी आखिरकार फिर बेदम होकर ढेर है। 12 विधानसभा सीटों (हमीरपुर को शामिल करते हुए) पर बढ़त मिलना तो दूर, 2017 में जीती एक सीट जलालपुर भी बसपा गंवा बैठी। सूबे की सियासत के नजरिए से बसपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी सपा के बढ़ते कदम मायावती के लिए इसलिए भी तगड़ा झटका हैं, क्योंकि उनकी उम्मीदों के इकलौते आधार दलित-मुस्लिम गठजोड़ में भी सपा सेंध लगाने में कामयाब रही है। यूपी ही नहीं, महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी बसपा खाता नहीं खोल सकी, जबकि सपा को महाराष्ट्र में दो सीटों पर जीत मिली है।

बसपा मुखिया मायावती 2022 में सत्ता वापसी के ख्वाब बुन रही हैं, जिसमें उपचुनाव के नतीजों ने खासा खलल डाल दिया है। इगलास व जलालपुर को छोड़ अन्य पर बसपा का प्रदर्शन खराब रहा है। मुस्लिम बाहुल्य रामपुर में बसपा की स्थिति बेहद दयनीय रही। पार्टी मात्र 3441 वोट ही बटोर सकी और मुस्लिमों का सपा की ओर धुव्रीकरण न रोक सकी। गंगोह में कमोबेश यही हालात रहे। बसपा का दलित मुस्लिम फार्मूला नहीं चला। यहां बसपा के मोहम्मद इरशाद भी मुस्लिमों को कांग्रेस की ओर जाने से न रोक पाए। तीसरे स्थान पर खिसके हाथी को 14 फीसद मत ही मिले। जैदपुर व प्रतापगढ़ सदर सीट पर पार्टी चौथे स्थान से आगे न बढ़ी। बलहा सुरक्षित सीट पर तीसरे स्थान पर फिसली बसपा को 17 प्रतिशत वोट ही मिल सके।

इगलास में सपा की गैरहाजिरी भी काम न आई

बसपा को जलालपुर सीट के हाथ से जाने का बड़ा झटका लगा है। यहां से विधायक रहे रितेश पांडेय के सांसद बनने से खाली हुई सीट पर बसपा ने विधानमंडल दल नेता लालजी वर्मा की बेटी छाया वर्मा को मैदान में उतारा। इस सीट पर सपा की कामयाबी, बसपा को दोहरा झटका देने वाली है। इगलास में सपा उम्मीदवार न होने का फायदा भी बसपा नहीं उठा सकी।

मुस्लिम प्रदेशाध्यक्ष बनाने का लाभ नहीं

उपचुनाव से पहले प्रदेश अध्यक्ष के पद पर मुनकाद अली की ताजपोशी करना भी बसपा के काम न आया। मुस्लिमों को सपा से हटाकर हाथी की सवारी के लिए रिझाने में वह नाकाम रहे हैं। पश्चिमी उप्र से ताल्लुक रखने वाले मुनकाद अपने क्षेत्र में भी बसपा को राहत दिलाने में कामयाब नहीं हो सके।

Posted By: Umesh Tiwari

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