पटना [अमित आलोक]। Indira Gandhi Birth Anniversary: जिस बिहार ने आपातकाल (Emergency) के दौरान लोकनायक जयप्रकाश नारायण (Jai Prakash Narayan) के नेतृत्‍व में तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के राजनीतिक अवासन की पटकथा लिखी थी, वहीं के बेलछी गांव (Belchi village) में उन्‍हें राजनीतिक नवजीवन (political Re-birth) भी मिला। बिहार के नालंदा का बेलछी गांव दो कारणों से चर्चा में रहता आया है। पहला, 27 मई 1977 को वहां हुआ दलित नरसंहार (Dalit Massacre) और दूसरा 13 अगस्‍त 1977 को इंदिरा गांधी की यात्रा। आपातकाल के पश्‍चात 1977 में हुए आम चुनाव (1977 Lok Sabha Election) में भारी पराजय के बाद यह इंदिरा का पहला सार्वजनिक कार्यक्रम था, जिसके दूरगामी राजनीतिक परिणाम निकले।

कांग्रेस के अध्‍यक्ष रहे सीताराम केसरी (Sita Ram Keshri) ने इस यात्रा की तुलना महात्‍मा गांधी (Mahatma Gandhi) के दांडी मार्च (Dandi March) से की थी। केसरी के इस दावे के पक्ष-विपक्ष में त‍र्क हो सकते हैं, लेकिन यह तथ्‍य है कि बेलछी यात्रा ने इंदिरा गांधी के अस्‍त होती राजनीति को नया जीवन दिया। न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स (Newyork Times) ने 24 दिसंबर 1977 के अंक में मीनू मसानी (Minoo Masani) ने उन्‍हें 'द गॉल' (de Gaulle) व 'मॉम जनरल' (Mom General) तक की संज्ञा दी।

नरसंहार के बाद बेलछी पहंचने वाली पहली राजनेता बनीं इंदिरा

बिहार के बेलछी गांव में 27 मई 1977 को हुए दलित नरसंहार के करीब ढाई महीने बाद 13 अगस्त 1977 को इंदिरा गांधी वहां पहुंचीं। नालंदा जिला में हरनौत से बेलछी तक 15 किलोमीटर के दुर्गम रास्ते को पार कर इंदिरा गांधी पीडि़तों से मिलीं। उनकी यात्रा के बाद बेलछी पूरी दुनिया में चर्चा में आ गया। इसके बाद तो तमाम राजनेता यहां पहुंचने लगे। लेकिन इंदिरा बाजी मार चुकीं थीं।

जमकर नारे लगे- ''इंदिरा तेरे अभाव में, हरिजन मारे जाते हैं''

अपराध प्रभावित दुर्गम इलाके के बदतर हालात में खराब मौसम की मार के बीच इस यात्रा के दौरान इंदिरा कभी पैदल चलीं तो कभी हाथी की सवारी की। साथ चल रहे कांग्रेस नेताओं को आपातकाल के दाग के साथ सत्‍ता से विदा की गईं इंदिरा के विरोध की आशंका थी, लेकिन बेलछी में उनका उम्‍मीद भरा स्‍वागत हुआ। नरसंहार के बाद बेलछी में किसी बड़े राजनेता की इस पहली यात्रा के दौरान नारे लगे- ''इंदिरा तेरे अभाव में, हरिजन मारे जाते हैं।''

न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स में बताया गया 'द गॉल' व 'मॉम जनरल'

बेलछी ने इंदिरा में दलित हितों की रक्षा की उम्‍मीद देखा। इंदिरा की यात्रा के साथ यह उम्‍मीद भी सुर्खियों में रही। देश-विदेश में मीडिया की सुर्खियों में रही इस यात्रा ने इंदिरा का राजनीतिक कद कितना बढ़ा दिया था, इसका अंदाजा लगाने के लिए न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स में प्रकाशित यह उद्धरण काफी है-

''...And Indira Gandhi will be your de Gaulle?" He (Minoo Masani) nodded. "Madame," he said, "will be mon general."

- Aubrey Menen in New York Times, 24th December 1977.

बेलछी से लौटते वक्‍त जयप्रकाश नारायण से मिलीं इंदिरा

बेलछी से लौटते वक्‍त इंदिरा गांधी पटना में आपताकाल के दौर में अपने प्रबल विरोधी रहे जयप्रकाश नारायण से मिलीं। प्रख्‍यात गांधीवादी रजी अहमद के अनुसार कालांतर में इंदिरा गांधी और जेपी के रिश्‍ते फिर ठीक हो गए थे, लेकिन वह जेपी की जिंदगी का आखिरी दौर था।

इंदिरा की उस यात्रा से जगी उम्मीदें आज भी अधूरी

बहरहाल, बेलछी की यात्रा से इंदिरा गांधी को उनका खोया राजनीतिक कद मिला। लेकिन बेलछी को अंतहीन उम्‍मीदाें के सिवा क्‍या हासिल हुआ? उस वक्‍त और आज के बेलछी में अंतर तो आया है, लेकिन विकास की लकीर गहरी नहीं दिखती। सुविधाविहीन स्कूल में डेढ़-दो सौ बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन पुरानी पीढ़ी के अधिकांश लोग निरक्षर हैं। लगभग साढ़े चार सौ घरों की करीब चार हजार आबादी में अधिकांश दलित हैं। गांव में मूलभूत सुविधाएं मयस्‍सर नहीं हैं। इंदिरा की उस यात्रा से जगी उम्मीदें आज भी अधूरी हैं।

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Posted By: Amit Alok

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