पटना [अरविंद शर्मा]। राष्‍ट्रीय जनता दल (RJD) में संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया आखिरी दौर में है। एक सप्ताह के भीतर ही बिहार में लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) के सबसे बड़े वफादार की तलाश पूरी हो जाएगी, जिसके हाथ में अगले तीन वर्षों तक पार्टी की कमान रहेगी।  पांचवी बार भी डॉ. रामचंद्र पूर्वे (Dr. Ramchandra Purvey) की ही ताजपोशी तय मानी जा रही है। लालू परिवार के प्रति पूर्वे की वफादारी, बौद्धिक क्षमता, सहिष्णुता, समाजवादी चरित्र और सामाजिक समीकरण दूसरे दावेदारों पर फिर भारी पड़ रहे हैं।

आरजेडी प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में दर्जन भर दावेदार

आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में वैसे तो करीब दर्जन भर दावेदार हैं। किंतु लालू परिवार की अपेक्षाओं के अनुरूप किसी के भी प्रदर्शन को पूर्वे से बेहतर नहीं माना जा रहा है। यही कारण है कि प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए नामांकन से कुछ दिन पहले से लालू परिवार में पूर्वे की काबिलियत को ही कई कसौटियों पर नापा-तौला जाने लगा है।

तेजस्‍वी को पूर्वे जैसे समर्पित कमांडर की जरूरत

एक साल के भीतर ही बिहार विधानसभा के चुनाव (Bihar Assembly Election) होने हैं, जिसमें लालू परिवार (Lalu Family) को कठिन परीक्षा से गुजरना होगा। लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election) में बुरी तरह पस्त होने के बाद तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) के लिए दोबारा उठ खड़े होने का यह बेहतर मौका होगा। ऐसे में तेजस्वी को अपने पिता की सियासी विरासत को बचाए रखने और आगे बढ़ाने के लिए पूर्वे जैसे सहनशील, समझदार और समर्पित कमांडर की जरूरत होगी।

परिवर्तन के पक्ष में नहीं दिख रहे लालू के लाल

इस खबर से पूर्वे के प्रतिद्वंद्वियों को झटका लग सकता है कि लालू के बाद अब उनके बेटे तेजस्वी भी बिहार आरजेडी में परिवर्तन के पक्ष में नहीं दिख रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में पूर्वे के कार्यों और व्यवहार ने तेजस्वी को भी काफी हद तक प्रभावित किया है। इसकी वजह है कि महत्वपूर्ण मौकों पर पूर्वे ने लालू की तरह ही तेजस्वी के प्रति भी समर्पण दिखाया। मंचों पर उन्हें अगले मुख्यमंत्री (Chief Minister) के रूप में बढ़-चढ़कर प्रस्तुत किया। पार्टी में अपनी मर्जी नहीं चलाई। किसी भी काम को तभी आगे बढ़ाया, जब शीर्ष नेतृत्व से सहमति ले ली।

सब पर भारी वफादारी व समाजवादी चरित्र

कर्पूरी ठाकुर (Karpuri Thakur) की कृपा से राजनीति में कदम रखने वाले पूर्वे का रिश्ता लालू परिवार से पुराना है। जनता दल से अलग होकर लालू ने जब 1997 में अपनी पार्टी बनाई तो पूर्वे उसके प्रस्तावक बने। तभी से पूर्वे ने इधर-उधर नहीं देखा। सर्व स्वीकार्य भी रहे। कभी भी किसी भी स्तर का नेता या कार्यकर्ता फरियाद कर सकता है। लहजा चाहे कुछ भी हो, सुनने में कोताही नहीं। खरी-खोटी सुनकर भी कभी आपा नहीं खोया। नेतृत्व को परेशानी में नहीं डाला। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में तेजस्वी ने इसकी तारीफ भी की थी।

2010 के बाद से लगातार कमान संभाल रहे पूर्वे

प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए नामांकन 25 नवंबर को किया जाना है। आरजेडी के संगठनात्मक चुनाव में लालू परिवार की मर्जी चलती है। चयन की प्रक्रिया लोकतांत्रिक होती है किंतु लालू-राबड़ी (Lalu-Rabri) की पसंद-नापसंद का पूरा ख्याल रखा जाता है। यही कारण है कि पूर्वे 2010 के बाद से ही लगातार प्रदेश की कमान संभालते आ रहे हैं। पहली बार उन्हें मनोनीत किया गया था। बाद के वर्षों में चुनाव की प्रक्रिया पूरी कर तीन-तीन बार निर्विरोध रूप से उन्हें ही बागडोर थमा दी गई। अबकी चौथी बार फिर चुनाव की प्रक्रिया पूरी होगी। किंतु निर्वाचन निर्विरोध होगा। इस तरह पूर्वे पांचवी बार लगातार आरजेडी की प्रदेश अध्यक्ष बन सकते हैं।

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Posted By: Amit Alok

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