लखनऊ (राज्य ब्यूरो)। कर्नाटक में बुधवार को मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में मंच पर नजर आई विपक्ष के शीर्ष नेताओं की एकजुटता की पहली परीक्षा उत्तर प्रदेश के कैराना संसदीय व नूरपुर विधानसभा क्षेत्रों में होने वाले उपचुनाव में होगी। भाजपा के विरोध में रालोद व सपा गठबंधन को समर्थन देने का निर्णय कांग्रेस ने स्थानीय स्तर पर लिया है, लेकिन प्रदेश स्तरीय वरिष्ठ नेता सीधे सामने आने से बच रहे हैं। वहीं, बसपा प्रमुख मायावती ने अभी पत्ते नहीं खोले हैं, जबकि गोरखपुर व फूलपुर संसदीय क्षेत्रों में बसपा के स्थानीय नेताओं को सक्रिय कर दिया गया था।

बुधवार को देर शाम लखनऊ पहुंचीं बसपा प्रमुख मायावती से उम्मीद लगी थी कि वह गुरुवार को कैराना व नूरपुर उपचुनाव को लेकर कोई अहम फैसला कर सकती हैं। मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के शपथग्रहण समारोह के बाद बसपा और सपा की ओर से गठबंधन को लेकर जो तेजी दिखायी गई थी, उसका प्रभाव नहीं दिखा। बसपा व सपा की ओर से ट्वीट कर विपक्षी एकजुटता को सराहा गया था। बसपा की ओर से किये गए ट्वीट में अखिलेश व मायावती का एक मंच पर आना भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक मुकाम बताया गया है।

सूत्रों का कहना है कि एकजुटता के इस अभियान के गुरुवार को एक कदम आगे बढ़ने की उम्मीद जतायी जा रही थी। समाजवादी व राष्ट्रीय लोकदल के नेताओं को भरोसा था कि मायावती कैराना व नूरपुर उपचुनाव में भाजपा को हराने के लिए अपने पार्टी कार्यकर्ताओं का आह्वान कर सकती है, लेकिन अब तब ऐसा नहीं हो सका है।

उपचुनावों से दूर रहने वाली बसपा ने गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनाव में पहली बार सपा उम्मीदवारों के पक्ष में अपने स्थानीय कार्यकर्ताओं को जुटने के लिए कहा था। इसके बदले राज्यसभा व विधान परिषद के चुनाव में बसपा को सपा का साथ मिला था। विधान परिषद में बसपा के भीमराव अम्बेडकर सदस्य निर्वाचित होने में कामयाब रहे थे लेकिन राज्यसभा चुनाव में रालोद विधायक द्वारा क्रास- वोटिंग करने पर मायावती ने नाराजगी जतायी थी जिसे कैराना उपचुनाव में बसपा प्रमुख की खामोशी से जोड़ कर देखा जा रहा है।

 

Posted By: Nancy Bajpai

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