लखनऊ [आनन्द राय]। केरल के नवनियुक्त राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान भले ही स्वतंत्र पार्टी, बीकेडी, कांग्रेस, जनता दल, बसपा और भाजपा जैसे राजनीतिक दलों के झंडाबरदार रहे, लेकिन कभी किसी के पिछलग्गू नहीं हुए। उसूलों पर आंच आई तो टकराने से नहीं चूके। बगावत की और अपना अलग रास्ता बना लिया। आरिफ ने अपने राजनीतिक सफर में सिर्फ अपने दिल की सुनी। अनुच्छेद 370 हटाने और तीन तलाक पर वह मोदी सरकार के समर्थन में दिखे तो शाहबानो केस में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के रवैये के विरोध में सत्ता को लात मार दी।

बुलंदशहर जिले में 1951 में जन्मे और बाराबस्ती से जुड़े आरिफ मोहम्मद खान ने स्वतंत्र पार्टी के बैनर तले पीलू मोदी से राजनीति का ककहरा सीखा। 1974 में उनकी उम्र महज 23 वर्ष थी, लेकिन वोटर लिस्ट में 25 वर्ष होने से वह बुलंदशहर के अनूप शहर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतर गए। भारतीय क्रांति दल के विजयी उम्मीदवार के 16866 मतों के सापेक्ष चौथे स्थान पर रहे आरिफ को 11301 मत मिले थे। आपातकाल के बाद विपक्षी एका में जब पीलू मोदी भारतीय क्रांति दल (जनता पार्टी) में शामिल हुए तो उन्होंने आरिफ को टिकट देने का दबाव बनाया और फिर उन्हें 1977 में स्याना विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिया गया। आरिफ चुनाव जीत गये और राम नरेश यादव की सरकार में उप मंत्री बनाये गए।

आरिफ के करीबी किसान नेता नरेंद्र त्यागी कहते हैं कि उन्होंने कभी दबाव महसूस नहीं किया और सत्ता त्यागने में उन्हें दो पल से ज्यादा समय नहीं लगा। आरिफ को पश्चिम के एक बड़े नेता का दबाव रास नहीं आया और उनका जनता पार्टी से मोहभंग हो गया। वह सत्ता की चमक छोड़कर तब संघर्ष कर रहीं इंदिरा गांधी से मिले। इंदिरा गांधी ने भी उन पर भरोसा किया और 1980 के लोकसभा चुनाव में कानपुर संसदीय क्षेत्र से उम्मीदवार बना दिया। आरिफ सांसद हो गए। 1984 में उन्हें बहराइच से कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया और वह फिर चुनाव जीते। तब राजीव सरकार में मंत्री बनाए गए। वह 1987 में बने जनमोर्चा में शामिल हुए और वीपी सिंह के साथ पूरे देश में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम चलाई। जनता दल के टिकट पर बहराइच से सांसद चुने गए और वीपी सिंह की सरकार में मंत्री बने। वह 1991 और 1996 का चुनाव हार गए, लेकिन 1998 में बसपा के टिकट पर बहराइच से फिर सांसद चुने गए। हालांकि, 1999 के चुनाव में हाथी की सवारी उन्हें दिल्ली नहीं पहुंचा सकी।

सम्मान नहीं मिला तो भाजपा से हो गए किनारे

आरिफ मोहम्मद खान ने 2004 में भाजपा की सदस्यता ग्रहण की। भाजपा ने उन्हें कैसरगंज से चुनाव मैदान में उतारा, लेकिन सफलता नहीं मिली। आरिफ को भाजपा में सम्मान नहीं मिला तो यह पार्टी भी उन्होंने छोड़ दी। हालांकि, 2014 में तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाये जाने की प्रक्रिया में वह मोदी सरकार के साथ खड़े रहे पर किसी दल में शामिल नहीं हुए।

शाहबानो केस के चलते आरिफ ने छोड़ा था मंत्री पद

मुस्लिम महिला शाहबानो ने तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया तो सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के पक्ष में फैसला दिया। आरिफ सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पक्ष में थे, लेकिन मुस्लिम नेताओं के दबाव में राजीव गांधी ने मुस्लिम पर्सनल लॉ संबंधी एक कानून संसद में पास करवा दिया और शाहबानो के पक्ष में आये फैसले को पलट दिया। आरिफ ने मंत्री पद से इस्तीफा देते हुए कांग्रेस को भी अलविदा कह दिया।

बधाई संदेश मिलने पर राज्यपाल बनने की हुई जानकारी : आरिफ

आरिफ मोहम्मद खान को भाजपा शीर्ष नेतृत्व से तीन दिन पहले संकेत जरूर मिला था, लेकिन उन्हें यह कतई पता नहीं था कि केरल के राज्यपाल बनाये जा रहे हैं। फोन पर हुई बातचीत में आरिफ ने बताया 'मुझे तो किसी ने बधाई दी तो मैं जाना। फिर थोड़ी देर बाद राष्ट्रपति की अधिसूचना की कॉपी भी मिल गई।' उन्होंने इस जिम्मेदारी के प्रति खुशी जताई। कहा, 'यह सेवा का अवसर है। भारत में पैदा होकर मैं भाग्यशाली हूं जो विविधता में इतना विशाल और समृद्ध है। यह मेरे लिए भारत के इस हिस्से को जानने का एक शानदार अवसर है।' चार सितंबर को केरल के मौजूदा राज्यपाल का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। उसी शाम को आरिफ केरल जाने की तैयारी में हैं। सोमवार को उनका कार्यक्रम अधिकृत रूप से तय हो जाएगा। उन्होंने कहा कि 'राज्यपाल की जिम्मेदारी स्पष्ट है। राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के तौर पर यह देखना है कि सरकार का कार्यकलाप संविधान के अनुसार होना चाहिए।'

उत्तर प्रदेश से आठवें राज्यपाल बने आरिफ मोहम्मद
राज्यपालों की नियुक्ति में मोदी सरकार उत्तर प्रदेश के लोगों को खूब महत्व दे रही है। केरल के राज्यपाल बनाये गए पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान उत्तर प्रदेश से आठवें राज्यपाल हैं। इनके पहले अभी हाल ही में प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री फागू चौहान को बिहार का राज्यपाल बनाया गया। मौजूदा समय में देश के आठ राजभवनों में उत्तर प्रदेश की मौजूदगी बनी हुई है। राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह चार सितंबर को सेवानिवृत्त हो जाएंगे और पांच को वह यहां भाजपा की सदस्यता ग्रहण करेंगे। इनके अलावा मध्य प्रदेश के राज्यपाल लालजी टंडन, जम्मू-कश्मीर के सत्यपाल मलिक, उत्तराखंड की बेबी रानी मौर्य, अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल बीडी मिश्रा भी उत्तर प्रदेश के ही निवासी हैं। कल्याण सिंह के बाद उप्र में मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार कलराज मिश्र यहां तो उनके उत्तराधिकारी नहीं बन सके, लेकिन अब वह हिमाचल प्रदेश से राजस्थान के राज्यपाल नियुक्त किये गए हैं। कल्याण सिंह के बाद राजस्थान के राजभवन की बागडोर अब उनके ही हाथों में होगी।

Posted By: Umesh Tiwari

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