नई दिल्ली,[स्पेशल डेस्क] । अगर ये कहा जाए कि विवादों से दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल का चोली दामन का साथ है तो गलत न होगा। अरविंद केजरीवाल और उनकी सरकार जब भी कोई फैसले लेती है या योजनाएं बनाती है वो विवादों के घेरे में आ जाती है। आप सरकार अपने दामन को पाक साफ बताती है। लेकिन भ्रष्टाचार के आरोप में मंत्रियों की विदाई, संसदीय सचिव के मामले में 21 विधायकों का अयोग्य होना, आम जनता के धन पर दूसरे राज्यों में पार्टी का प्रचार ये सब ऐसे दाग हैं जो आप के दामन को दागदार बनाती है।ऐसे में सवाल ये है कि केजरीवाल सरकार सुर्खियों में बने रहने के लिए ऐसे फैसले करती है या उनकी पार्टी को सरकार चलाने नहीं आता है। ताजा मामला, सरकारी ऐड से जुड़ा हुआ है जिसमें आप सरकार की तीन साल की उपलब्धियों का बखान किया गया है। लेकिन ये विज्ञापन नियम और कानून की पेंचीदीगियों में फंस चुका है। सबसे पहले ये बताते हैं कि आखिर टीवी विज्ञापन में क्या है जो सवालों के घेरे में है।

 एक लाइन से जब मामला हुआ खराब

केजरीवाल सरकार के विज्ञापन में सब कुछ सही है लेकिन एक लाइन ने पूरे मामले को खराब कर दिया। विज्ञापन में केजरीवाल सरकार की तारीफ कुछ इस तरह की गई है। “ वो कहते हैं जब आप सच्चाई और ईमानदारी के रास्ते पर चलते हैं तो ब्रह्मांड की सभी दृश्य और अदृश्य शक्तियां आपकी मदद करती हैं ’’। इस लाइन के जरिए अरविंद केजरीवाल अपनी सरकार दुश्वारियों को बयां कर रहे हैं। लेकिन इस लाइन की वजह से विज्ञापन आम लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है। बताया जा रहा है कि इस लाइन पर कुछ अधिकारियों की तरफ से ऐतराज किया गया। अधिकारियों से सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का हवाला दिया। दरअसल सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के तहत विज्ञापन में सभी तथ्यों की संबंधित विभाग द्वारा पुष्टि होनी चाहिए। लेकिन पेंच यहीं फंसा कि आखिर इस लाइन को किस विभाग के जरिए पुष्ट कराया जाए।

दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल से अधिकारियों की बैठक बुलाई जिसमें ऐड कैंपेन के बारे में जिक्र किया गया।बैठक में विज्ञापन के सभी हिस्सों के साथ साथ इस खास लाइन पर भी चर्चा हुई। नियम कानून के दायरों की दुहाई दी गई लेकिन सीएम ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन इस बात का जिक्र करती है तथ्य सही हों। ये नहीं कहा गया है कि विज्ञापन पर रोक लगा दिया जाए।

विज्ञापन की शुरुआत कुछ इस तरह होती है, ''तीन साल हुआ कमाल बदले स्कूल, बदले अस्पताल, बदला बिजली, पानी का हाल''। इसके साथ ही ये भी बताया गया है कि किस तरह से पिछले तीन साल में भ्रष्टाचार के मामलों में कमी आई है। लोगों के पैसों को सड़क, पानी और बिजली में खर्च किया जा रहा है। इसके साथ ही वो बताते हैं कि किस तरह से उनकी राह में कांटे बिछाए गए जिसका उन्होंने बखूबी सामना किया। ये बात अलग है कि आप के बागी विधायक कपिल मिश्रा अपनी सरकार को कुछ यूं कोसते हैं।

दरअसल आप सरकार पिछले साल इन आरोपों का सामना की थी कि जनता के पैसों को पार्टी पंजाब और गोवा में अपने चुनाव प्रचार के लिए कर रही है। उपराज्यपाल अनिल बैजल ने 97 करोड़ की रिकवरी के निर्देश दिए थे। इस मुद्दे पर जमकर सियासत हुई। आप पार्टी ने कहा कि पूर्व में दूसरे प्रदेशों की सरकारें ऐसा करती रही हैं। लेकिन उनकी सरकार पर निशाना साधा जा रहा है।  

सुप्रीम कोर्ट और विज्ञापन

सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में एक फैसले में सरकारी विज्ञापनों पर पीएम, राष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश के फोटो लगाने का आदेश दिया था। 

18 मार्च 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला पलटा और राज्य के सीएम को फोटो लगाने की अनुमति दी।

सरकारी विज्ञापनों पर तस्वीरों के इस्तेमाल पर राज्यों और केंद्र सरकार की तरफ से रिव्यू याचिका दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश के अलावा राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और कैबिनेट मंत्रियों की तस्वीरों को भी विज्ञापनों में छापा जा सकता है। 

इससे पहले, बीते साल के अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि सरकारी विज्ञापनों में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश के अलावा किसी और की तस्वीर इस्तेमाल नहीं की जा सकती। उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और असम की सरकारों ने इस फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी। इन राज्यों का कहना था कि सरकारी विज्ञापनों में राज्यपाल, मुख्यमंत्री और मंत्रियों की तस्वीर के इस्तेमाल की इजाजत होनी चाहिए।

केंद्र सरकार और तमिलनाडु सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतहगी ने कहा था कि सरकारी विज्ञापन में जो बात लिखी गई होती है देश में तमाम लोग या ता उसे पढ़ नहीं सकते या फिर उस पर ध्यान ही नहीं देते। मंत्रियों या मुख्यमंत्रियों की तस्वीर लोगों का ध्यान विज्ञापन की तरफ खींचती है।

By Lalit Rai