लखनऊ [अवनीश त्यागी]। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की बैठक में सपा-बसपा का गैरहाजिर रहना सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। दरअसल, उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव निकट है और कांग्रेस महासचिव व उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका वाड्रा की बढ़ती सक्रियता दोनों दलों की बेचैनी बढ़ा दी है। शुक्रवार को दिल्ली में सोनिया गांधी की बैठक में शामिल नहीं होकर दोनों दलों ने अपनी राजनीतिक दिशा को भी स्पष्ट कर दिया।

आगामी विधानसभा चुनाव में दोनों की निगाह यूपी के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है। दोनों ही दलों के नेता एकला चुनाव लड़ने का एलान भी कर चुके हैं। गत विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ और लोकसभा चुनाव में बसपा से मिलकर चुनाव लड़ने को समाजवादी नेतृत्व बड़ी भूल मानता रहा है। 

एक पूर्व मंत्री का कहना है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस मजबूत होती है तो इसका सीधा नुकसान समाजवादी पार्टी को ही होगा। प्रदेश में मुस्लिम वोटबैंक कांग्रेस से अलग होने के बाद ही समाजवादी साइकिल सत्ता तक पहुंचने में कामयाब हो सकी थी। सपा संस्थापक मुलायम सिंह के प्रति मुसलमानों के भरोसे को कायम रखने के लिए अखिलेश यादव ऐसा कोई कदम उठाने से बचेंगे, जिससे कांग्रेस मजबूत हो और मुस्लिम वोट बैंक उनके हाथों से फिसलने का खतरा हो।

मुस्लिम राजनीति के जानकार डॉ.नदीम अख्तर का कहना है कि समाजवादी पार्टी  को मुस्लिम व पिछड़ा वोट जोड़ रखने के लिए अपना वजूद मजबूत बनाए रखना होगा। कांग्रेस महासचिव व प्रदेश प्रभारी प्रियंका वाड्रा जिस तरह से उत्तर प्रदेश को केंद्रित कर आक्रामक हो मैदान में हैं, उससे समाजवादियों में बेचैनी लाजिम है।

बसपा लगातार कांग्रेस विरोध पर डटी

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की बैठक में बसपा की गैर हाजिरी अप्रत्याशित नहीं है। बसपा लगातार कांग्रेस विरोधी लाइन पकड़े हुए है। सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस से बसपा प्रमुख की नाराजगी प्रियंका व राहुल गांधी द्वारा भीम आर्मी सुप्रीमो चंद्रशेखर को तरजीह देने के बाद से बढ़ती जा रही है। राजस्थान में बसपा विधायकों का दलबदल कराकर कांग्रेस में शामिल कराने के बाद से मायावती नाराज हैं। बसपा को अपना दलित वोटबैंक बचाने की चिंता भी सता रही है। बसपा के पूर्व कोआर्डिनेटर असलम का कहना है कि बसपा के लिए यह समय सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण है। भाजपा के प्रति दलितों में बढ़े रुझान के अलावा भीम आर्मी जैसे संगठनों की लोकप्रियता खतरे की घंटी है। ऐसे में कांग्रेस अगर यूपी में मजबूत होगी तो बसपा के लिए दलितों में भी जनाधार बचाना मुश्किल होगा।

Posted By: Umesh Tiwari

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