पटना [मनोज झा]। जेपी आंदोलन के दौरान राजनीति के चुनौतीपूर्ण मैदान में कूदने वाले जनता दल (यू) के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह चुनावी गहमा-गहमी से दूर अपने पार्टी कार्यालय में ही बैठकर रणनीति तैयार करने में जुटे हैं। उनके पास सीमांचल के किसी प्रखंड स्तरीय नेता का फोन आता है और वह उसे संबंधित सीट का चुनावी समीकरण समझाने लगते हैं। उन्हें गोपालगंज और वाल्मीकिनगर के दूरदराज स्थित सीमावर्ती इलाकों का भी सियासी मिजाज बखूबी पता है।

वह बताते हैं कि इस चुनाव में बिहार में किस तरह मोदी और नीतीश सब पर भारी पडऩे जा रहे हैं। कहते हैं कि नतीजों को लेकर तो विपक्ष के दिग्गजों को भी संशय नहीं है। बाकी चुनाव है, सभी पार्टियों को दावा करने का हक है।

तीसरे चरण का मतदान खत्म होने के बाद वशिष्ठ नायारण से उनके आवास पर दैनिक जागरण, बिहार के स्थानीय संपादक मनोज झा की मुलाकात हुई। इस दौरान चुनावों के साथ-साथ केंद्र में मोदी और प्रदेश में नीतीश की सरकार, चुनाव में विपक्ष की रणनीति, बिहार का बदलता चेहरा, लालू प्रसाद के दौर की राजनीति जैसे मसलों पर बातचीत हुई। बातचीत के प्रमुख अंश.... 

प्रश्न: आम चुनाव के तीन चरण बीत चुके हैं। बिहार की सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष के नाते आपका आकलन क्या है?

वशिष्ठ : इस बार के चुनाव में अंडर करंट है। लोग नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहते हैं। बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सुशासन व चौतरफा विकास के चलते यह करंट और तेज है। देश भर में आधी सीटों से ज्यादा पर मतदान हो चुका है। हर चरण में एनडीए के पक्ष में मजबूत माहौल दिखाई दे रहा है।

बिहार में अब तक 14 सीटों पर मतदान हो चुका है और एनडीए क्लीन स्विप करने जा रहा है। विपक्ष के बड़े-बड़े नाम चुनाव हारने जा रहे हैं। बिहार में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर मतदान में हिस्सा लिया है। यह एनडीए के पक्ष की बात है।

प्रश्न: यदि महिलाएं ज्यादा संख्या में वोट कर रही हैं तो उसे एनडीए के पक्ष में कैसे माना जाए?

वशिष्ठ: बिहार में नीतीश कुमार की अगुआई वाली एनडीए की सरकार ने महिलाओं के लिए कई ठोस कदम उठाए हैं। नौकरियों में आरक्षण के अलावा पंचायती राज और निकाय चुनावों में महिलाओं के लिए पचास फीसदी आरक्षण का व्यापक असर हुआ है। इसके चलते पिछड़े और दलित समुदाय की महिलाएं बड़ी संख्या में निर्वाचित होकर सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में अपनी सक्रियता बढ़ा रही हैं।

पुलिस में महिलाओं की विशेष भर्ती के माध्यम से प्रदेश में नारी सशक्तीकरण का सरोकार और मजबूत हुआ है। शराबबंदी के फैसले को पूरे प्रदेश की महिलाओं ने हाथों हाथ लिया है। इसका सकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहा है। कुल मिलाकर आमलोगों के साथ-साथ बिहार की महिलाओं में सरकार के प्रति एक भरोसा जगा है। लोग मोदी और नीतीश के हाथ मजबूत करना चाहते हैं।

प्रश्न : लेकिन राजद के नेता तेजस्वी यादव तो कह रहे हैं कि देश का संविधान बचाने के लिए मोदी सरकार को हटाना जरूरी है। 

वशिष्ठ: (हंसते हुए) चुनावी जुमला है, सुनते जाइए! 

प्रश्न: आप तो तेजस्वी की बात को मजाक में उड़ा रहे हैं?

वशिष्ठ: यह मजाक नहीं तो और क्या है? राजद के नेता यदि संविधान और कानून की बात करें तो इससे बड़ा मजाक भला और क्या हो सकता है? राजद ने बिहार में पंद्रह साल तक शासन किया। जरा उनसे पूछिए कि क्या तब प्रदेश में कानून का शासन नाम की कोई चीज भी थी?

हालात ये थे कि लोग शाम ढलने से पहले घरों में बंद हो जाते थे। देहात की तो छोडि़ए, शहर यहां तक कि राजधानी पटना में सरेआम लूटपाट, मार-काट, हत्या और अपहरण जैसी वारदातों को अंजाम दिया जाता था। बिजली थी नहीं और पूरा प्रदेश अंधेरे मे डूबा रहता था। पैदल चलने तक को सड़कें नहीं थीं। लोग बेबस और डरे हुए थे और कहीं कोई उसकी सुनने वाला नहीं था।

यह वही दौर था, जब बिहार से बड़ी संख्या में लोगों ने पलायन किया था। तमाम उद्योग-धंधे ठप हो गए। बिहार ने राजद के इस जंगलराज का दंश लंबे समय तक झेला है। सवाल है कि तब राजद या तेजस्वी को संविधान की याद क्यों नहीं आई? संविधान तो तभी तक सुरक्षित है, जब तक कानून का राज है।

जब कानून ही ताक पर रख दिया गया हो तो फिर संविधान की बात करना बेमानी है। इसलिए तेजस्वी के मुंह से संविधान की बात को मैंने मजाक या जुमला कहा है। लोकतंत्र में दृष्टि, विचार, नीति और कार्यक्रम के आधार पर चुनाव होता है। यह कौन सी बात हुई कि मोदी हटाओ, संविधान बचाओ। भारत में संविधान सर्वोच्च है और इसे कोई नहीं मिटा सकता।

प्रश्न : तो क्या अब बिहार अंधेरे के उस दौर से बाहर निकल चुका है?

वशिष्ठ : आज बिहार प्रकाश, प्रगति और परिवर्तन की राह पर तेजी से दौड़ रहा है। तब के दौर से तो आज के बिहार की कोई तुलना ही नहीं की जा सकती। जमीन आसमान का फर्क है। आज प्रदेश में कानून-व्यवस्था सुदृढ़ है। सड़क और बिजली कोई समस्या ही नहीं रह गई है।

अच्छी बात है कि लोग बिहार लौटने लगे हैं। क्या आप इसे मामूली बात मानते हैं?  और यदि हालात बदले हैं, चीजें अच्छी हुई हैं तो इसका लाभ आम जनता के साथ-साथ राजद के लोगों को भी मिल रहा है। चौड़ी और चिकनी सड़कों पर राजद नेताओं की गाडिय़ां भी फर्राटे भर रही हैं। उनके घरों में भी चौबीस घंटे बिजली है। अपराध से निजात का सुख और लाभ उन्हें भी मिल रहा है। 

प्रश्न: राजद तो आरक्षण खत्म करने की साजिश रचने का भी आरोप लगा रहा है।

वशिष्ठ: आपने हिटलर के प्रचार मंत्री गोयबल्स का नाम सुना ही होगा। वह दुष्प्रचार करने में माहिर था। उसका मानना था कि यदि एक झूठ को सौ बार बोलो तो वह सच लगने लगता है। प्रधानमंत्री मोदी खुद अनगिनत बार यह स्पष्ट कर चुके हैं कि आरक्षण को किसी भी कीमत पर खत्म नहीं किया जा सकता।

ऐसे में बार-बार आरक्षण खत्म करने की बात करना दुष्प्रचार नहीं तो और क्या है? इसी प्रकार आप राफेल मामले को भी देख लें। सुप्रीम कोर्ट यह कह चुका है कि इस सौदे में उसे किसी प्रकार की गड़बड़ी नहीं मिली है। बावजूद इसके, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इसमें घोटाले की रट लगा रहे हैं। इतना ही नहीं, कोर्ट की आड़ में गलतबयानी करके माफी भी मांग रहे हैं। यह सब क्या है? ऐसा झूठ आप बोलते ही क्यों हैं, जिसके लिए आपको माफी मांगनी पड़े।

साफ है कि पूरा विपक्ष दुष्प्रचार का हथकंडा अपना रहा है। दरअसल में जब आपके पास कुछ ठोस होता नहीं है तो फिर आप इसी तरह फिजूल की बातें करते हैं, झूठ प्रचारित करते हैं। जब शब्द खत्म हो जाते हैं तो जुबान पर गलत बातें ही आती हैं।

प्रश्न: विपक्ष का आरोप है कि लालू प्रसाद को जेल में भी परेशान किया जा रहा?

वशिष्ठ: देखिए, जेल सरकार या कोई आपकी मर्जी से नहीं चलती। सब कुछ जेल मैनुअल्स के मुताबिक तय होता है कि किस बंदी को कौन सी सुविधा मिलेगी और कौन सी नहीं। वीआइपी और आम बंदियों के लिए अलग-अलग इंतजाम होते हैं।

असलियत यह है कि विपक्ष के लोग सहानुभूति पाने के मकसद से लालू प्रसाद को जेल में परेशान करने का झूठ फैला रहे हैं। हालांकि इसका कोई लाभ होगा नहीं, क्योंकि लालू प्रसाद से समाज को बड़ी उम्मीदें थीं। उन्होंने उम्मीदें तोड़ दीं और एक घेरे में सिमटते चले गए।

प्रश्न: लालू जी के बिना चुनाव फीका तो नहीं लग रहा?

वशिष्ठ: लालू जी के भाषण में हास्य-विनोद का पुट रहता है और वह चुनाव प्रचार को रोचक भी बनाते हैं। उनका अंदाज लोगों को हंसाता है। चुनाव मैदान में लालू जी के नहीं रहने से इस बार यह सब नहीं है। 

प्रश्न: जदयू और भाजपा की दोस्ती कितनी पक्की है?

वशिष्ठ: दोनों दलों की दोस्ती पूरी तरह मजबूत है। दरअसल, राजनीतिक और सामाजिक अपेक्षाओं को पूरा करने के लिहाज से यह एक स्वाभाविक गठबंधन है। आपने शायद ही किसी बात को लेकर दोनों दलों के बीच मतभेद की बात सुनी हो। दोनों दलों का नजरिया विकासवादी है, इसलिए मतभेद के बिंदु न के बराबर है। नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के बीच अच्छा तालमेल है। प्रधानमंत्री से मेरे भी व्यक्तिगत रिश्ते हैं। 

प्रश्न: क्या भाजपा-जदयू गठबंधन की छतरी पिछड़ा और सवर्ण दोनों को साधने को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है? 

वशिष्ठ: ऐसा आप कैसे कह सकते हैं? जाति आधारित राजनीति तो हमने कभी की ही नहीं। हमारे लिए तो समाज का समग्र विकास ही मूलभूत एजेंडा है। इसमें अगड़े-पिछड़े सब हैं। जदयू या नीतीश सरकार का मूल्यांकन करें तो साफ है कि उसमें जाति या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया गया है।

सवर्ण समाज के नेता भी पार्टी या सरकार में अहम पदों पर रहे हैं। जहां तक अति पिछड़ा वर्ग को विशेष महत्व देने की बात है तो यह समाज लंबे समय तक हाशिये पर रहा है। उसे बराबरी में लाने के लिए कुछ विशेष उपाय जरूरी भी हैं। इसी प्रकार जहां तक भाजपा का प्रश्न है तो मेरी नजर में वहां भी चीजों को समग्रता में देखा जाता है। खुद प्रधानमंत्री ही पिछड़ा वर्ग से हैं।

प्रश्न: एक निजी सवाल कि लोग आपको दादा क्यों कहते हैं?

वशिष्ठ: जेपी आंदोलन के समय मैं लंबे समय तक जेल में रहा। बांकीपुर जेल में एके राय भी साथ थे। वहां बड़ी संख्या में विद्यार्थी भी थे। हम सभी एके राय को दादा कहते थे। जेल से निकले तो कई लोगों ने मुझे वशिष्ठ दादा कहना शुरू कर दिया। तब से बहुत सारे लोग दादा कह रहे हैं। 

प्रश्न: आप जेपी आंदोलन की उपज हैं। क्या जेपी की संपूर्ण क्रांति का सपना सच होना अभी बाकी है?

वशिष्ठ: जेपी की संपूर्ण क्रांति की अवधारणा को पूरा करने में अभी और समय लगेगा। जेपी विकेंद्रीकरण की धारणा में विश्वास रखते थे। वह कहते थे कि लोहिया की सप्तक्रांति ही उनकी संपूर्ण क्रांति है। विकेंद्रीकरण की अवधारणा को ही आगे बढ़ाते हुए बिहार सरकार ने स्थानीय प्रशासन को काफी मजबूती दी है। महिला और दलितों के सशक्तीकरण की दिशा में भी ठोस काम हुआ है। चेतना तो जगी है, लेकिन अभी दूर तक जाना है।

प्रश्न: क्या राजनीति में कोई स्वप्न शेष है?

वशिष्ठ: स्वप्न क्या, एक इच्छा जरूर है कि एक ऐसा दौर भी आए, जब बिहार से बाहर चले गए नौजवान अपने प्रदेश लौटें और यहां लोक निर्माण के काम में सहभागी बनें।

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