नई दिल्ली, प्रेट्र। भारतीय जनता पार्टी को एक साल के भीतर अपने दो पुराने साथियों का नुकसान उठाना पड़ा है। शिवसेना के बाद शिरोमणि अकाली दल (सअद) भी भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) से अलग हो गया है। हालांकि, इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा खुद इतनी मजबूत हो गई है, जितनी पहले कभी नहीं थी। राजग से सअद के अलग होने से मोदी सरकार की सेहत पर तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन पंजाब में भाजपा के लिए राजनीतिक तौर पर मुश्किलें हो सकती हैं।

अकाली दल के जाने से पंजाब में भाजपा के लिए हो सकती है मुश्किल

 पंजाब में भाजपा-सअद के गठबंधन को राजनीतिक के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर एक तरह से मान्यता मिली हुई थी और मतदाताओं के दो विरोधी धड़ों पर दोनों दलों को अच्छा खासा प्रभाव था। राजनीति के जानकारों का मानना है कि भाजपा अकाली दल में सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व के खिलाफ मुखर रहे नेताओं को बढ़ावा दे सकती है। लेकिन तीन कृषि सुधार कानूनों के विरोध में किसानों के प्रदर्शन और अधिकतर राजनीतिक दलों द्वारा उनके समर्थन को देखते हुए भाजपा के लिए यह राह भी आसान नहीं है। 

शिवसेना और अकाली दल का साथ छोड़कर जाना दुर्भाग्यपूर्ण

शिवसेना और अकाली दल के अलग होने के बाद राजग में अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला जनता दल (यूनाइटेड) ही भाजपा का पुराना साथी रह गया है। सिर्फ 2013-17 को छोड़कर नीतीश कुमार भाजपा के साथ और बिहार में राजग के चेहरा रहे हैं। 2013 में नीतीश कुमार ने लालू यादव की पार्टी के साथ मिलकर बिहार में सरकार बनाई थी और 2017 में फिर अलग हो गए थे।

भाजपा के एक नेता ने कहा कि शिवसेना और अकाली दल का साथ छोड़कर जाना दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि दोनों ही अच्छे-बुरे दिनों के साथी रहे। लेकिन उनके अलग होने के लिए भाजपा को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उनके साथ छोड़ने के कारण अलग हैं। भाजपा न तो मुख्यमंत्री पद शिवसेना को सौंप सकती थी और न ही कृषि सुधार के अपने एजेंडे को छोड़ सकती थी। 

 

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