यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 11, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
क्यों मध्यप्रदेश के पूर्व CM डीपी मिश्र ने कांग्रेस सरकार से अपने जूते की पूजा करने को कहा था, पढ़ें किस्सा
पत्रकार और लेखक दीपक तिवारी द्वारा मध्य प्रदेश की राजनीति की पर लिखी गई किताब राजनीतिनामा मध्यप्रदेश के कुछ दिलचस्प ...और पढ़ें

नई दिल्ली, ऑनलाइन डेस्क। कांग्रेस के कद्दावर नेता द्वारका प्रसाद मिश्र को राजनीति में चाणक्य कहा जाता था। वह एक साहित्यकार और प्रखर राजनेता के रूप में प्रसिद्ध थे। उनका मुख्यमंत्री बनना मध्यप्रदेश में कांग्रेस के इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। सितंबर 1963 में जब मिश्र मुख्यमंत्री बने थे। तब कांग्रेस के पास मात्र 142 सीटें थी।
वहीं ठीक चार साल बाद सन् 1967 में जब मिश्र के नेतृत्व में चुनाव हुए तब कांग्रेस को लगभग 170 सीटें मिली। मिस्र के मुख्यमंत्री रहते हुए ही बड़ी हेर-फेर हुई थी, जिसमें प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के 24 विधायक कांग्रेस में दल- बदल कर आ गए थे।
मध्यप्रदेश में द्वारका प्रसाद मिश्र का परचम
दीपक तिवारी द्वारा लिखी गई 'राजनीतिनामा मध्यप्रदेश' किताब में डीपी मिश्र के राजनीतिक जीवन से जुड़ी रोचक घटनाओं का जिक्र किया गया है। इसमें बताया गया है कि मध्यप्रदेश में द्वारका प्रसाद मिश्र का समय राजनीति का एक यादगार लैंड मार्क युग था। उनका शासन प्रशासन और राजनीतिक जीवन अखबारों की सुर्खियां हुआ करता था। उनके बाद कई मुख्यमंत्री उनकी कार्यशैली से प्रभावित होकर उनकी तरह काम करते हुए नजर आए। बता दें कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद केंद्र सरकार में सरदार पटेल और आरएसएस के बीच मध्यस्थता डीपी मिश्र ने ही कराई थी।
डीपी मिश्र का जवाहरलाल नेहरू से मतभेद
डीपी मिश्र मनोविज्ञान, राजनीति शास्त्र, वेद, पुराण और कामसूत्र पर समान अधिकार से बात करते थे। उनका शुरुआती जीवन कोलकाता के अमृत बाजार पत्रिका में संवाददाता के रूप में हुई थी, जब वह अपनी आजीविका आरंभ करते हुए फिल्म निर्माण में भी अपना हाथ आजमाए। वहीं जब वह मध्य प्रांत के गृह मंत्री थे तब जवाहरलाल नेहरू के साथ उनका मतभेद भी हुआ था। जब वह गृह मंत्री और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य के रूप में कार्यरत थे, तब उन्होंने मिश्र अपने 14 पन्नों के इस्तीफे में नेहरू पर बहुत सारे आरोप लगाए थे।
नेहरू की नीतियों पर डीपी मिश्र ने उठाया सवाल
डीपी मिश्र ने जब कांग्रेस को अलविदा कहा तो उन्होंने एक भविष्यवाणी की थी। उन्होंने कहा था कि नेहरू की नीतियों के कारण 1 दिन चीन और पाकिस्तान भारत पर हमला करेंगे। बता दें कि मिश्र की नाराजगी का सबसे बड़ा कारण यह था कि भारत ने तिब्बत को चीन के हाथों सौंप दिया। डीपी मिश्र उस वक्त नेहरू के सिद्धांतों का खुलकर विरोध कर रहे थे और इसकी दौरान उन्होंने कांग्रेस को छोड़ दी। 12 साल बाद राजनीति की अपनी दूसरी पारी शुरू करते हुए 1963 में वह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनकर वापस लौटे।
कांग्रेस छोड़ने के बाद बनाई थी अपनी पार्टी
डीपी मिश्र ने जिस वक्त कांग्रेस छोड़ी थी, उस दौरान उन्होंने 'भारतीय लोग कांग्रेस' के नाम से एक नई पार्टी बनाई थी। सन 1952 में मिश्र ने इस पार्टी से जबलपुर छिंदवाड़ा और नागपुर में चुनाव भी लड़ा था। लेकिन दुर्भाग्यवश व तीनों जगह से हार गए।
कला और साहित्य से जुड़े डीपी मिश्र
डीपी मिश्र साहित्य में कृष्णायन जैसी महान कृति की रचना भी की। वह सागर विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित शिक्षा के केंद्र में कुलपति रहे और पौराणिक भूगोल जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ को प्रकाशित कराने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी दौरान वह सागर जिले में विदिशा की सीमा पर एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक खुदाई के सूत्रधार भी रहे। डीपी मिश्र को हिंदू होने पर गर्व था। उनकी सनातन धर्म, वेद, पुराण, गीता आदि ग्रंथों में खासी रूचि थी लेकिन बावजूद इसके वह धार्मिक कर्मकांड व पाखंड से दूर रहे।
वर्ष 1951 में राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन के इस्तीफे पर डीपी मिश्र खुलकर जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ गए थे। नेहरू और टंडन के बीच हुए विवाद में द्वारका प्रसाद मिश्र हमेशा नेहरू के खिलाफ बयान देते रहते थे। इसका एक बहुत बड़ा कारण था कि कांग्रेसी उनके घोर विरोधी हो गए थे। तमाम राजनीतिक उथल-पुथल के बाद मिश्र ने कांग्रेस छोड़ दी और कांग्रेस ने भी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया।
जूते की पूजा का किस्सा
डीपी मिश्र, नेहरू का विरोध करने और अपनी पार्टी 'लोक कांग्रेस' बनाने के बाद दिल्ली से जब वह जबलपुर लौटे तब उन्हें एक आम सभा में बोलने तक नहीं दिया गया। इसका मुख्य कारण था कांग्रेसी उनसे नेहरू की आलोचना को लेकर खासे नाराज थे। सभा में ना सिर्फ उन्हें बोलने से रोका गया बल्कि धक्का-मुक्की के बीच मिश्र को बाहर निकलते समय जूते पहने तक का समय नहीं मिला। जिसके कारण उन्हें सभा के बीच ही अपना जूता छोड़कर जाना पड़ा।
सभा के दूसरे दिन उनके जूते को लेकर एक बड़ा मुद्दा बना। उनके जूते को किसी स्थानीय पत्रकार ने अपने कार्यालय में जमा करवाकर व्यंगात्मक समाचार लिखा। इस लेख में लिखा गया कि जिस भी सज्जन को दूसरा जूता मिले वह उसे यहां कार्यालय में जमा करवा दें ताकि दोनों जूते डीपी मिश्र को वापस पहुंचाया जा सके।
वहीं मिश्र भी एक अन्य समाचार के माध्यम से इस बात का करारा जवाब दिया। उन्होंने कहा, 'जूते मेरे पास भेजने की जरूरत नहीं है। कृपया एक जूते की पूजा अपने कार्यालय में करें और दूसरा मिल जाए तो उसे मध्यप्रदेश के सचिवालय में नागपुर भेज दिया जाए, ताकि उसकी पूजा वहां की कांग्रेस सरकार कर सके।'