अमिय भूषण। Vivah Panchami 2021 आज अगहन शुक्ल पक्ष पंचमी है। इसे विवाह पंचमी के नाम से भी जाना जाता है। आज ही के दिन जनकपुरधाम में सीता राम विवाह संपन्न हुआ था। सीता और राम की कथा अद्भुत है। यह आज भी वृहत्तर भारत से लेकर विश्व के कोने कोने में किसी न किसी रूप में लोकप्रिय है। बात केवल रामायणों की ही करें तो तुर्कमेनिस्तान से इंडोनेशिया तक लगभग तीन सौ रामायण चलन में हैं। रोम से लेकर वियतनाम तक की पुरातात्विक संरचनाओं और भित्ति चित्रों एवं मूर्तियों में इसके चिन्ह मिल जाएंगे। वहीं भारत और नेपाल के अलावा सुदूरवर्ती फिजी और सूरीनाम से लेकर मारीशस तक आज भी विवाह गीतों के बोल में सीता राम, अवध और मिथिला का उल्लेख किया जाता है।

जीवन के सर्वोच्च आदर्श और मूल्य बोध कराने वाले राम और सीता के जीवन मे अनेक दुश्वारियां आईं। इन्होंने वनवास, हरण, बिछुड़न और लांछन क्या कुछ नहीं सहा। इसके बावजूद इनका आत्मिक प्रेम और अनुराग एक दूसरे के लिए कभी कम नहीं हुआ। इसीलिए हर समाज कई युगों से राम सा नायक, सीता सी नायिका और सीताराम सी सुंदर जोड़ी चाहता है।

विविध कथाओं में सुंदर दृश्यों का चित्रण : रामायण की कथाओं में विवाह पूर्व भेंट की सुंदर चर्चा आती है। तब राम और सीता ने एक दूसरे को उपवन में देखा था। इस संदर्भ में अनेक दृश्यों का सुंदर चित्रण आप दक्षिण पूर्व एशियाइ देशों के रामायण और उसकी नाट्य प्रस्तुति में भी देख सकते हैं। इस क्षेत्र के हर देश के पास अपना एक रामायण है। कंबोडिया का महाकाव्य रीमकर रामायण है तो लाओस का राष्ट्रीय गौरव रामजातक नामक महाग्रंथ है, जबकि थाइलैंड जैसे देश में तो भारत की तरह दर्जनों रामायण चलन में र्है।

वहीं बदलते समय और सूचना क्रांति के इस दौर में परिवर्तन की प्रक्रिया कहीं अधिक तेज है। हमारी जीवनशैली कुछ इस तरह से होती जा रही है कि अधिकांश लोगों का अधिकतम समय अपने जीवन के प्रबंधन और पारिवारिक जीवन को खुशहाल बनाने के उपक्रमों पर ही केंद्रित हो गया है। ऐसे में वे तनाव से दूर रहने और जीवन के बेहतर प्रबंधन के लिए रामायण की ओर आकृष्ट हो रहे हैं। कोरोनाकाल को यदि छोड़ दें तो बीते वर्षो के दौरान विश्व भर से अयोध्या और जनकंपुर आने वालों की संख्या निरंतर बढ़ती रही है।

रामायण सर्किट : ऐसे में राम सीता और रामायण से जुड़े पवित्र स्थलों के विकास की आवश्यकता है। ऐसे तीर्थ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैले हैं। वहीं बात अगर रामायण सर्किट की हो तो हमें सीता और राम के उद्देश्यपूर्ण यात्रओं का विचार करना होगा। सीताजी की यात्रओं पर विचार करें तो यह बिहार के सीतामढ़ी से शुरू होती है। यहीं पुनौरा धाम में राजा जनक को उनकी प्राप्ति हुई थी। यह सीता की प्राकट्य स्थली और जन्मभूमि है। वहीं नेपाल स्थित जनकपुर में हुए स्वयंवर उपरांत श्रीराम की अर्धागिनी बन अयोध्या नगरी पहुंची थीं। बात अगर रामजी की हो तो पिता के घर से गुरु वशिष्ठ के आश्रम की यात्र उनके जीवन की प्रथम यात्र है। दूसरी यात्र ऋषि विश्वामित्र के साथ अवधपुरी से जनकपुरी और पुन: जनकपुरी से अवधपुरी आगमन की है। अयोध्या से जनकपुर और जनकपुर से अयोध्या जाने के मार्ग अलग अलग थे। अयोध्या से आरंभ हुई इस यात्र को बक्सर में किए गए ताड़का वध से व्यापक पहचान मिली। जबकि जनकपुर में हुए सीता स्वयंवर के उपरांत इसे पूर्णता प्रदान हुई थी। इस यात्र के पड़ाव स्थल पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और नेपाल तक विस्तृत हैं।

बात अगर सीताराम वनवास यात्र की हो तो यह अयोध्या से श्रीलंका तक की है। इसके स्मृति चिन्ह आपको उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे प्रांतों में मिल जाएंगे। वहीं धार्मिक मान्यताएं कहती हैं कि लंका से अयोध्या की यात्र वायु मार्ग से की गई थी। लंका विजय के बाद की यात्रओं पर विचार करें तो सीता और रामजी ने भारत वर्ष के सभी महत्वपूर्ण तीर्थो की यात्र की है। अगर आगे की यात्र का विचार करें तो सीता के अरण्य वास और लव कुश जन्म के स्थल महत्वपूर्ण हैं। वहीं लव कुश द्वारा अश्वमेध यज्ञ के अश्व को रोकने का प्रसंग रामायण में वर्णित है। ऐसे में दिग्विजयी आकांक्षाओं वाले श्रीराम को युद्ध भूमि में प्रस्तुत होना पड़ा था। इससे जुड़े स्थल को भी हम रामायण सर्किट से जोड़ सकते हैं। किंतु सीता और राम जिन शील गुण मर्यादाओं के नाते पूजे जाते हैं वो केवल दो यात्रओं में सिमटी है। ऐसी पहली यात्र अवधपुरी से मिथिलापुरी और मिथिलापुरी से अवधपुरी की है। वहीं दूसरी यात्र अवधपुरी से लंकापुरी तक की है।

इन जगहों में सीता और राम से जुड़े क्रीड़ा विहार स्थलों के अलावा युद्ध भूमि, रंग भूमि है और ऋषियों व देवताओं से जुड़े अनेक पवित्र स्थल हैं। सीता और रामजी द्वारा शबरी और निषादराज से भेंट वाले स्थलों के अलावा अहिल्या की श्रप से मुक्ति वाले ऐसे स्थल भी शामिल हैं, जहां वह वर्षो से उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। इनके अलावा अनेक यक्ष, गंधर्व, अप्सरा और मनुष्यों की मुक्ति के पड़ाव स्थल भी इस यात्र मार्ग में हैं। आज आवश्यकता इन तमाम पड़ावों को तीर्थस्थलों के रूप में विकसित करने और उन्हें व्यापक रूप से प्रचारित करने की है।

जानकीजी का भव्य मंदिर : अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि के साथ ही जानकी प्राकट्य भूमि पर भी भव्य मंदिर निर्माण के स्वप्नों को साकार करना होगा। वहीं राम जन्मोत्सव के साथ ही जानकी प्राकट्योत्सव को भी व्यापक बनाने की आवश्यकता है। बात आधी आबादी और पूरी राम कहानी की है। वास्तव में राम सीता और रामायण सर्किट की संकल्पनाएं अभी अधूरी है। उत्तर प्रदेश में तो रामायण सर्किट के विकास की योजनाएं मूर्त रूप ले रही है, नित्य नवीन निर्माण और परिवर्तन दिख रहे हैं। परंतु बिहार समेत कई अन्य राज्यों में यह घोर उपेक्षा का शिकार है। जबकि बिहार रामायण सर्किट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अन्य पड़ावों को छोड़ भी दें तो श्रीराम के जीवन की प्रथम यात्र में युद्धभूमि चरित्रवन बक्सर, सीता प्राकट्य भूमि सीतामढ़ी और राम सीता प्रथम भेंट के साक्षी रहे फुलहर उपवन जैसे करीब एक दर्जन महत्वपूर्ण स्थल यहां हैं। इस उदासीनता को लेकर प्रश्न और इसके विकास को लेकर व्यापक चर्चा की आवश्यकता है। रामायण सर्किट का संपूर्ण और समग्र विकास ही आने वाली पीढ़ियों को रामायण की महत्ता और राम सीता आदर्श चरित्र से अवगत करा सकेगा। यह संपूर्ण विश्व को सनातन भारत के जीवंत गौरवशाली अतीत का दर्शन कराएगा। वहीं यह मूल्यबोध कराने का भी एक बेहतरीन उपक्रम होगा।

भारत-नेपाल संबंधों में मजबूती का माध्यम : आज जनकपुरधाम भले ही नेपाल के प्रशासनिक क्षेत्र में आता है, लेकिन पूर्व में यह भारतीय भूमि में ही रहा है। वैसे भी वहां की संस्कृति, भाषा, खानपान आदि पूर्णतया हमारी तरह ही है। माना जाता है कि वर्ष 1815 में सुगौली की संधि के पश्चात जनकपुरधाम का क्षेत्र नेपाल के अधीन हो गया, जबकि पारंपरिक रूप से वह आज भी मिथिला ही है। यह भी एक महत्वपूर्ण कारण रहा है कि नेपाल के साथ हमारे संबंध बेहद प्रगाढ़ रहे हैं। परंतु बीते कुछ दशकों के दौरान नेपाल में चरमपंथी ताकतों के पनपने और चीन द्वारा उन्हें सहयोग मिलने के कारण वहां भारत विरोधी गतिविधियों के साथ ही भारत के प्रति अनेक प्रकार के दुष्प्रचार को अंजाम दिया जा रहा है।

ऐसे में नेपाल भारत संबंधों को मजबूती प्रदान करने का सेतु सीताराम विवाह हो सकता है। राम सीता विवाह की स्मृतियों को संजोए मिथिला भूमि अयोध्या से आने वाली राम बारात की प्रतीक्षा करती है। साधु-संतों के नेतृत्व में बड़ी संख्या में निकलने वाली यह पारंपरिक यात्र बदलते दौर में नया स्वरूप ले चुकी है। विश्व हिंदू परिषद के प्रयासों से अब यह कहीं अधिक व्यवस्थित और लोकप्रिय हो चली है। बदलते दौर के नाते यात्र के साधन बदल से गए हैं। तब भी अनेक प्रकार के वाहनों के साथ बैंड बाजा और हाथी घोड़े इस बारात का हिस्सा होते हैं। यह बारात आज भी पुराने राम परिपथ और सीता राम मार्ग से होकर आती-जाती है। संत अयोध्या से बहुरानी सीता के लिए भेंट लेकर आते हैं। अयोध्या से आते समय गंगा नदी पार करने के बाद बिहार में प्रवेश करते ही बारात के स्वागत का अंदाज बदल जाता है। मिथिला के गांवों मे हर्ष का वातावरण होता है। मार्ग में अवस्थित अधिकांश शहरों और गांवों में स्वागत के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता है। तरह तरह के पकवानों के साथ लोग यहां बारातियों का स्वागत करते हैं।

वास्तव में दुनिया के लिए राम बहुत बड़े आराध्य और आदर्श के रूप में देखे जाते हैं, परंतु जनकपुर समेत संपूर्ण मिथिला में उन्हें विशेष रूप में भी देखा जाता है। दरअसल रामजी अयोध्या के लिए बेटा तो मिथिला और नेपाल के लिए युगों-युगों से दामाद ही समङो जाते रहे हैं। वहीं बात सीताजी की हो तो बिहार और नेपाल में उनकी पहचान बहन-बेटी के रूप में कहीं अधिक है।

इसीलिए नेपाल और भारत में आज भी राम जन्मोत्सव, सीता प्राकट्य उत्सव और राम सीता विवाह का उत्सव आनंदमय होता है। इन दिनों जनकपुर नेपाल का दृश्य बहुत ही अद्भुत होता है। सारे गिले शिकवे भूल कर भारत और नेपाल के लोग इस दैवीय विवाह का आनंद लेते हैं। यहां वे पड़ोसी नहीं, अपितु रिश्तेदार हैं। वास्तव में भारत नेपाल संबंधों की बेहतरी के लिए इस भावना के विस्तार की आवश्यकता है। वहीं ऐसे पारंपरिक आयोजन इस दिशा में मील के पत्थर साबित हो सकते हैं।

बस ऐसे अवसर और आयोजनों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। उल्लेखनीय यह भी है कि रामायण सर्किट का विकास भारत और नेपाल के संबंधों को प्रीतिकर बनाए रखने की क्षमता रखता है। वहीं राम सीता सर्किट को चिन्हित करने और उसे विकसित करने से व्यापक स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। साथ ही इससे क्षेत्र विशेष की एक सशक्त पहचान बनेगी। वहीं किसी भी अन्य बाहरी शक्ति का नेपाल भारत के संबंधों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव और हस्तक्षेप कम होगा।

[अध्येता, भारतीय ज्ञान परंपरा]

Edited By: Sanjay Pokhriyal