नई दिल्‍ली, एएनआइ। Rajiv Gandhi assassination case सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को तमिलनाडु सरकार से पूछा कि राजीव गांधी हत्याकांड के एक दोषी की दया याचिका पर उसने फैसला लिया है या नहीं? अदालत ने हत्या के पीछे बड़ी साजिश का पता लगाने वाली सीबीआइ के नेतृत्व में मल्टी डिसिप्लिनरी मॉनिटरिंग एजेंसी (एमडीएमए) की जांच के बारे में पहले जैसी स्थिति रिपोर्ट पेश करने पर केंद्र की खिंचाई की।

जस्टिस एल नागेश्वर राव और दीपक गुप्ता की पीठ ने राज्य सरकार से बताने को कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत उसने क्या फैसला लिया है? यह अनुच्छेद राज्यपाल को अदालत में दोषी साबित हुए व्यक्ति को माफी देने का अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट 46 वर्षीय एजी पेरारीवलन की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिकाकर्ता ने एमडीएमए की जांच पूरी होने तक उसे दी गई उम्रकैद की सजा को निलंबित रखने का अनुरोध किया है।

एमडीएमए का गठन 1998 में एमसी जैन जांच आयोग की सिफारिश पर हुआ था, जिसने पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या में साजिश के पहलू की जांच की थी। सीबीआइ अधिकारी के नेतृत्व में गठित इस एजेंसी में खुफिया ब्यूरो, रॉ, रिवेन्यू इंटेलीजेंस और अन्य एजेंसियां शामिल हैं। न्यायालय ने केंद्र से पूछा, 'क्या आप हमें बता सकते हैं कि अप्रैल 2018 में पेश की गई स्थिति रिपोर्ट और नवंबर 2019 में पेश स्थिति रिपोर्ट में क्या अंतर है? इनमें कोई अंतर है ही नहीं। हमने इस मामले में आपके द्वारा पेश की गई सभी स्थिति रिपोर्ट देखी है।' केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पिंकी आनंद ने पीठ को बताया कि सरकार को अभी तक श्रीलंका और दूसरे देशों को भेजे गए अनुरोध पत्रों का कोई जवाब नहीं मिला है।

इससे पहले केंद्र सरकार की ओर से स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की गई थी जिस पर उसने असंतोष जाहिर किया गया था। इसी मसले पर केंद्र सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट को अपने जवाब में बताया था कि उसने राजीव गांधी हत्या मामले में उम्र कैद की सजा पाए सभी सातों दोषियों को रिहा करने के तमिलनाडु सरकार के मार्च 2016 के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था क्योंकि इससे खतरनाक परंपरा की शुरुआत हो जाएगी।

यही नहीं हाई कोर्ट को सरकार की ओर से यह भी बताया गया था कि केस की जांच करने वाली सीबीआइ ने भी प्रस्ताव का विरोध किया था। केंद्र सरकार ने अपने जवाब में कहा कि उसने 18 अप्रैल 2018 को तमिलनाडु के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर कहा था कि IPC की धारा 435 के अनुसार भी दोषियों की सजा को दोबारा कम करने के प्रस्ताव को मंजूरी देना गलत है। दोषियों को रिहा करने से खतरनाक परंपरा पड़ेगी जो भविष्‍य के लिए भी चुनौती बन जाएगी।

उल्‍लेखनीय है कि 21 मई 1991 को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की एक चुनावी रैली में आत्मघाती हमले में हत्या कर दी गई थी। विशेष टाडा अदालत ने केस में सात आरोपियों वी श्रीहरन, टी सत्येंद्रराजा, जयकुमार, रॉबर्ट पायस (सभी श्रीलंका के नागरिक) और एजी पररीवलन, रविचंद्रन और नलिनी (भारतीय) को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। बाद में तमिलनाडु सरकार ने इस तर्क को आधार बनाकर सभी को रिहा करने का प्रस्ताव किया था कि दोषियों ने 24 साल से ज्यादा समय तक जेल की सजा भुगत ली है।

Posted By: Krishna Bihari Singh

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