नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। पेगासस जासूसी मामले में इलेक्ट्रानिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि इस विषय को तर्कसंगत तरीके से देखने से पता चलता है कि इस सनसनीखेज विषय में कोई सच्चाई नहीं है। संसद में दी गई जानकारी में उन्होंने कहा कि पेगासस से जुड़ी रिपोर्ट के प्रकाशक के अनुसार यह नहीं कहा जा सकता है कि इस रिपोर्ट में दिए गए फोन नंबरों की निगरानी की जा रही थी। उन्होंने कहा कि जिस कंपनी की तकनीक का कथित दुरुपयोग किया जा रहा था, उसने इन दावों को सिरे से खारिज किया है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा, इस सनसनीखेज मामले में नहीं है कोई सच्चाई

इसके अलावा लंबे समय से देश में स्थापित कानूनी प्रक्रियाएं यह सुनिश्चित करती हैं कि किसी प्रकार की गैरकानूनी निगरानी संभव नहीं है। चार दिन पहले स्पाइवेयर पेगासस के जरिये फोन के डाटा से छेड़छाड़ कर संबंधित व्यक्ति की जासूसी से जुड़ी खबर एक पोर्टल पर प्रकाशित होने के बाद काफी हो-हल्ला मचा था। गुरुवार को वैष्णव ने कहा कि पहले भी इसी प्रकार से पेगासस स्पाइवेयर के वाट्सएप पर दुरुपयोग के दावे किए गए थे। इन दावों का कोई तथ्यात्मक आधार नहीं था और सर्वोच्च न्यायालय सहित सभी पक्षों ने उन्हें खारिज कर दिया था।

उन्होंने कहा कि पेगासस स्पाइवेयर के माध्यम से जासूसी की खबर का आधार एक समूह है, जिसने कथित तौर पर 50 हजार फोन नंबरों के लीक किए गए डाटा बेस को प्राप्त किया। आरोप यह है कि इन फोन नंबरों से संबंधित व्यक्तियों की निगरानी की जा रही थी। लेकिन रिपोर्ट कहती है कि डाटा बेस में फोन नंबर मिलने से यह सिद्ध नहीं होता है कि फोन पेगासस स्पाइवेयर से प्रभावित था या उस पर कोई साइबर हमला किया गया था।

आइटी मंत्री ने कहा कि इस तकनीक का स्वामित्व रखने वाली एनएसओ मानती है कि ये सेवाएं किसी को भी कहीं भी किसी भी समय उपलब्ध हैं, जिनका सामान्य प्रयोग सरकारी संस्थाएं और प्राइवेट कंपनियां दुनियाभर में कर रही हैं। निश्चित रूप से इस डाटा का निगरानी या एनएसओ से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए इस डाटा की निगरानी के लिए उपयोग होने की बात का कोई आधार नहीं है। वैष्णव ने कहा कि भारत में एक स्थापित प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से ही निगरानी के सभी मामले अनुमोदित किए जाते हैं। भारत के कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति के रूप में निगरानी की एक स्थापित व्यवस्था है।