नई दिल्ली [जयप्रकाश रंजन]। भारतीय अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदली है तो राजनीति का मिजाज भी बदला है। और इसी तरह से सरकार और आरबीआइ के संबंधों का तानाबाना भी बदला है। यह बदलाव इस बात से भी सामने आता है कि हाल के वर्षो में आरबीआइ के गवर्नर पद पर शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति बैठा हो जिसका सरकार के साथ किसी न किसी मुद्दे पर कोई विवाद न हुआ है। हां, यह अलग बात है कि अभी यह विवाद जितना मुखर हुआ है उतना पहले कभी नहीं हुआ। यहां तक कि पूर्व गवर्नर डॉ. रघुराम राजन और मौजूदा सरकार के बीच ब्याज दर, एनपीए पर अंकुश समेत कुछ दूसरे मुद्दों पर भी असहमति रही लेकिन इसके बावजूद दोनो पक्षों ने इसे सार्वजनिक नहीं किया।

केंद्र सरकार व केंद्रीय बैंक के बीच विवाद का एक उल्लेखनीय पहलू यह भी है कि कई बार उन गवर्नरों ने उनकी भी नहीं मानी है जिन्होंने उन्हें नियुक्त करने में अहम भूमिका निभाई। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव है जिन्हें यूपीए के कार्यकाल में वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने वित्त सचिव से सीधे गवर्नर बना कर मिंट रोड भेजा गया। लेकिन कुछ ही महीनों बाद वित्त मंत्री के साथ उनका विवाद पूरी तरह से सामने आ गया। ब्याज दर घटाने की वित्त मंत्रालय की मांग जब सुब्बाराव ने एक के बाद एक ठुकराई तो चिदंबरम ने यहां तक कहा कि, ''अगर देश के विकास की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की है तो वह उसके लिए भी तैयार है।''

इस क्रम में सबसे ताजा उदाहरण मौजूदा गवर्नर ऊर्जित पटेल का है जिन्हें रघुराम राजन के बाद जब यह पद दिया गया तो उनकी राजग सरकार के कुछ लोगों के करीब होने की बात कही गई। लेकिन अभी सरकार और आरबीआइ के बीच विवाद जितना सार्वजनिक हुआ है उतना पहले कभी नहीं हुआ। सूत्रों का कहना है कि पूर्व गर्वनर डॉ. वाई वी रेड्डी के कार्यकाल में देश के एक बड़े उद्योग समूह के खिलाफ आरबीआइ ने लगातार कड़े कदम उठाये जिससे आज वह समूह बेहद मुसीबत में है। तब वित्त मंत्रालय और आरबीआइ के बीच इस बारे में काफी तनाव रहा लेकिन कोई बाद सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आ पाई। रेड्डी के कार्यकाल में ब्याज दरों को काफी बढ़ाया गया जिसे यूपीए सरकार ने कभी पसंद नहीं किया।

Posted By: Vikas Jangra

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