नितिन प्रधान, नई दिल्ली। अनुशासन, बेबाकी और निडरता केंद्रीय कानून, इलेक्ट्रॉनिक्स व सूचना प्रौद्योगिकी और संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद के व्यक्तित्व के तीन ऐसे पहलू हैं, जिसने उनका बचपन भले ही छोटा कर दिया हो, लेकिन उसमें संघर्ष की ऐसी क्षमता भरी जिसने उन्हें जिंदगी में मजबूत बनाया। सुविधा संपन्न होने के बावजूद तीन किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाने की आदत ने जीवन में संघर्ष करने की क्षमता विकसित की। यही संघर्ष आगे चलकर राजनीति में अपने बूते नई ऊंचाइयों को प्राप्त करने में मददगार साबित हुआ। व्यक्तित्व में चारित्रिक दृढ़ता आई, जिसने राजनीतिक जीवन के तमाम झंझावातों का सामना करने की शक्ति दी।

अनुशासन और आंदोलनों से निखरा व्यक्तित्व
भाजपा में ऐसे नेताओं की भरमार है, जिन्होंने संघ से अनुशासन सीखा। रविशंकर ने तभी से शाखा जाना शुरू कर दिया था, जब वह बालक थे- यानी बाल स्वयंसेवक। घर में पिता का अनुशासन और बाहर संघ की नजर। बचपन से ही मन अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने का था। लेकिन पिता ने एक बार मना किया तो अनुशासन के इतने पक्के कि उसके बाद कोई बहस नहीं। पटना के कदमकुआं स्थित स्कूल से पढ़ाई की शुरुआत हुई। बचपन में अनुशासन का जो मंत्र सीखा वो अभी तक उनके जीवन का हिस्सा है। हालांकि बचपन में होली से पहले ही होली खेलने की शरारत के चलते एक बार उन्हें पिता की मार का स्वाद चखने का भी मौका लगा। चाहे छात्र राजनीति रही हो या फिर जेपी का आंदोलन, अनुशासन का यह भाव उन्हें हर बार आगे बढ़ाने में काम आया। जेपी उनके आदर्श रहे हैं और उनके सानिध्य में उन्होंने अनुशासन का पाठ भी कड़ाई से पढ़ा। आंदोलन के दौरान कई मौके ऐसे भी आए जब युवा मन ने उत्साहित होकर गर्मी दिखा दी। लेकिन जेपी की डांट ने युवा मन के उस उत्साह को दिशा दी और मन को अनुशासन में बांधना सीखा।

यह वो दिन थे जब प्रसाद ने बिहार में छात्र राजनीति में प्रवेश किया ही था। इंटर पास करके कॉलेज में प्रवेश करने के साथ ही उन्हें छात्र राजनीति में सुशील कुमार मोदी और लालू प्रसाद यादव का साथ मिला। इन दोनों नेताओं का साथ जेपी आंदोलन में भी मिला। जेपी के अलावा अटल और आडवाणी से भी उनके राजनीतिक जीवन को दिशा मिली। यही वजह है कि प्रसाद भारतीय जनता पार्टी की नींव रखने वाले इन दोनों नेताओं को भी अपना रोल मॉडल मानते हैं। यही नहीं लाल बहादुर शास्त्री और कपरूरी ठाकुर का प्रभाव भी उनके व्यक्तित्व पर पड़ा है। बचपन से युवा और उसके बाद राजनीतिक करियर को मजबूत बनाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में सीखे गीतों का असर भी उनके चरित्र पर खासा पड़ा। इन गीतों को प्रसाद आज भी उतने की उत्साह से गाते हैं।

युवा जूनून से बना दिया बेबाक और निडर
रविशंकर प्रसाद के व्यक्तित्व में बेबाकी एक बड़ी विशेषता है। उनके चरित्र की यह खासियत बचपन से ही रही है। 1972 में जब जेल जाने की नौबत आई तो पिता ने पूछा, ‘क्या इरादा है ? पढ़ाई नहीं करनी क्या।’ बेबाक इतने कि पिता को जवाब दिया ‘फर्स्ट क्लास दूंगा। रेस्ट इज नन ऑफ योर कंसर्न।’ जेल गए लेकिन वापस आने के बाद इम्तिहान दिए और पिता को दिया वचन भी निभाया। सक्रिय जीवन के साथ-साथ प्रसाद ने पढ़ाई को भी उतना ही महत्व दिया। फर्क सिर्फ इतना था कि परीक्षा से तीन महीने पहले कड़ी मेहनत और एक दिन में 18 घंटे की पढ़ाई ने उन्हें शैक्षणिक योग्यता में कभी पीछे नहीं रहने दिया।

युवा मन के जुनून ने प्रसाद को बेबाक तो बनाया ही, सामाजिक मूल्यों का निर्वाह करने में भी कभी पीछे नहीं रहे। विद्यार्थी परिषद के दिनों में अपने एक दलित मित्र को घर लाए, भोजन कराया। इस पर पिता की बहन यानी बुआ ने एतराज जताया। लेकिन प्रसाद पीछे नहीं हटे। जीवन के मूल मानकों से समझौता न करने की इसी प्रवृत्ति ने उनके राजनीतिक जीवन को भी दृढ़ता प्रदान की। उनकी इसी सोच ने उन्हें बेबाक के साथ-साथ निडर भी बनाया। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कोयला मंत्रलय का प्रभार संभालने के बाद प्रसाद के मन में कोयले की तस्करी रोकने का जुनून इस हद तक सवार हुआ कि वो धनबाद में कोयला खदान से ट्रकों पर होने वाली लदाई का मुआयना करने जा पहुंचे और ट्रक पर चढ़ गए। कोयला खदानों पर ट्रकों में तय सीमा से अधिक कोयला लोड कर उसे चोरी कर लिया जाता था।

बेबाकी, निडरता और अनुशासन में बंधे प्रसाद एक गंभीर अध्ययन करने वाले व्यक्ति भी हैं। रामजन्मभूमि का मुकदमा लड़ने वाले प्रसाद ने भारत की सनातन परंपरा का भी विस्तार से अध्ययन किया है। भारत को वह एक व्यापक रूप में देखते हैं। यह दृष्टि उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ-साथ विवेकानंद से लेकर महर्षि अरविंद के अध्ययन से मिली।

Posted By: Shashank Pandey

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