नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो/पीटीआइ। केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अनुपालन करते हुए राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की कीमत का ब्योरा सोमवार को सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को सौंप दिया। सरकार ने 14 पन्नों के हलफनामे में कहा है कि राफेल विमान खरीद में रक्षा खरीद प्रक्रिया-2013 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह पालन किया गया। इस हलफनामे का शीर्षक ‘36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने का आदेश देने के लिए निर्णय लेने की प्रक्रिया में उठाए गए कदमों का विवरण’ है। खबरों के मुताबिक, दस्तावेज में विस्तार से बताया गया है कि क्यों सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) इस सौदे में ऑफसेट पार्टनर बनने में नाकाम रही और अनिल अंबानी के रिलायंस समूह की एक कंपनी का चयन दसॉ के साथ हुआ।

विपक्षी लगा रहे ये आरोप

एनडीए सरकार पर राफेल सौदे को लेकर विपक्षियों ने आरोप लगाया है कि हर विमान को करीब 1,670 करोड़ रुपये में खरीद रही है, जबकि यूपीए सरकार जब 126 राफेल विमानों की खरीद के लिए बातचीत कर रही थी तो उसने इसे 526 करोड़ रुपये में अंतिम रूप दिया था। सुप्रीम कोर्ट में दो वकीलों एमएल शर्मा और विनीत ढांडा के अलावा एक गैर सरकारी संस्था ने जनहित याचिकाएं दाखिल कर सौदे पर सवाल उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने गत 31 अक्टूबर को सरकार को सील बंद लिफाफे में राफेल की कीमत और उससे मिले फायदे का ब्योरा देने का निर्देश दिया था। साथ ही कहा था कि सौदे की निर्णय प्रक्रिया व इंडियन आफसेट पार्टनर चुनने की जितनी प्रक्रिया सार्वजनिक की जा सकती हो उसका ब्योरा याचिकाकर्ताओं को दे। सरकार ने आदेश का अनुपालन करते हुए ब्योरा दे दिया है।

राफेल में रक्षा खरीद सौदे की तय प्रक्रिया का पालन

सरकार ने सौदे की निर्णय प्रक्रिया का जो ब्योरा पक्षकारों को दिया है जिसमें कहा गया है कि राफेल में रक्षा खरीद सौदे की तय प्रक्रिया का पालन किया गया है। 36 राफेल विमानों को खरीदने का सौदा करने से पहले डिफेंस एक्यूजिशन काउंसिल (डीएसी) की मंजूरी ली गई थी। इतना ही नहीं करार से पहले फ्रांस के साथ सौदेबाजी के लिए इंडियन नेगोसिएशन टीम (आइएनटी) गठित की गई थी, जिसने करीब एक साल तक सौदे की बातचीत की और खरीद सौदे पर हस्ताक्षर से पहले कैबिनेट कमेटी आन सिक्योरिटी (सीसीए) व काम्पीटेंट फाइनेंशियल अथॉरिटी (सीएफए) की मंजूरी ली गई थी। सुप्रीम कोर्ट राफेल सौदे में गड़बडि़यों का आरोप लगाने वाली याचिकाओं पर 14 नवंबर को सुनवाई करेगा।

बताई सौदे की निर्णय प्रक्रिया

सरकार ने पक्षकारों को दिये गये राफेल सौदे की निर्णय प्रक्रिया के ब्योरे में कहा है कि फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने में रक्षा उपकरण खरीदने की डीपीपी 2013 की तय प्रक्रिया का पालन किया गया है। ऐसे सौदों के लिए 2013 की तय प्रक्रिया के सभी जरूरी कदम उठाए गए थे। जैसे कि सर्विस क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट (एसक्यूआर) तैयार करना, डीएसी की मंजूरी प्राप्त करना, तकनीकी आकलन और तकनीकी गुणवत्ता की मंजूरी, कांट्रेक्ट नेगोसिएशन कमेटी (सीएनसी) द्वारा कामर्शियल नेगोसिएशन करना और सीएफए यानी सक्षम अथारिटी से मंजूरी लेना।

इंडियन आफसेट पार्टनर चुनने में सरकार की कोई भूमिका नहीं

सरकार ने बताया है कि डीपीपी की तय प्रक्रिया का पालन करने के बाद मीडियम मल्टी रोल काम्बेट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) कामर्शियल आकलन की स्टेज पर पहुंचा। इंटर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट (आईजीए) के जरिये फ्रांस से 36 राफेल एयरक्राफ्ट खरीदने का करार करने के लिए डीएसी से 13 मई 2015 को मंजूरी ली गई। डीएसी को मामले की पृष्ठभूमि भी बताई गई थी। राफेल विमानों की खूबियां भी डीएसी को बताई गईं। फ्रांस से सौदे के करार की बातचीत के लिए इंडियन नेगोसिएशन टीम (आइएनटी) गठित की गई थी, इसके मुखिया डिप्टी चीफ आफ एयर स्टाफ(डीसीएएस) थे। इस टीम ने फ्रांस के साथ सौदे की बातचीत मई 2015 में शुरू की और ये बातचीत अप्रैल 2016 तक चली। इस टीम की कुल 74 बैठक हुई थीं। आइएनटी ने सौदेबाजी के दौरान कीमत और गुणवत्ता से लेकर सभी पहलुओं का ध्यान रखा था। डीएसी रक्षा खरीद सौदे की सबसे ऊंची अथारिटी है जिसके मुखिया रक्षामंत्री होते हैं और इसमें सभी सर्विस चीफ और रक्षा सचिव आदि शामिल होते हैं। सरकार ने यह भी कहा है कि इंडियन आफसेट पार्टनर चुनने में सरकार की कोई भूमिका नहीं है। यह मूल निर्माता कंपनी का कामर्शियल फैसला होता है।

पूर्व सौदा नहीं हुआ था फाइनल

सरकार ने बताया है कि 2007 में 126 एमएमआरसीए खरीदने के सौदे की बात चली थी जिसमें 18 फ्लाईअवे एयर क्राफ्ट आने थे और 108 एचएएल को ओरिजनल इक्यूपमेंट मैन्यूफैक्चरर (ओईएम) की मदद से बनाने थे। प्रक्रिया 2012 तक चलती रही। इसके बाद तीन साल तक मामला 108 विमानों के मुद्दे का हल न निकलने के कारण अटका रहा। ये मामला दासों और एचएएल के बीच कामन अंडरस्टैंडिंग की कमी के कारण फंसा रहा। अंत में 126 एमएमआरसी का प्रस्ताव जून 2015 में वापस (विड्रा) हो गया था।

एचएएल और दसॉ के बीच थे कई अनसुलझे मुद्दे

सरकार के मुताबिक, दसॉ और एचएएल के बीच कई अनसुलझे मुद्दे थे, जिसकी वजह से उसे कॉन्ट्रैक्ट नहीं मिला। हालांकि एचएएल की ओर से इस सौदे पर कोई ऐसी प्रतिक्रिया नहीं आई है, जिससे यह पता चले की ये 'अनसुलझे' मुद्दे क्‍या थे। एचएएल की ओर से साफ कहा गया कि वह इस सौदे में शामिल नहीं है, इसलिए उसे इस पर प्रतिक्रिया देने का कोई अधिकार नहीं है। दरअसल, राहुल गांधी के आरोप हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑफसेट पार्टनर के रूप में अनिल अंबानी के रिलायंस समूह की एक कंपनी का चयन करने के लिए फ्रेंच कंपनी दसॉ एविएशन को मजबूर किया, ताकि उसे 30,000 करोड़ रुपये दिए जा सकें। लेकिन रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि रक्षा ऑफसेट दिशानिर्देशों के अनुसार, दसॉ कंपनी ऑफसेट दायित्वों को लागू करने के लिए अपने भारतीय ऑफसेट सहयोगियों का चयन करने के लिए स्वतंत्र है।

Posted By: Tilak Raj

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