नई दिल्‍ली [ रमेश मिश्र ]। दक्षिण एशियाई और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के बीच तकनीकी और आर्थिक सहयोग प्रदान करना बिम्सटेक का प्रमुख मकसद है। इसमें करीब-करीब वही देश शामिल हैं, जो दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) में हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर सार्क के रहते हुए एक नए संगठन की जरूरत क्‍यों महसूस की गई? क्‍या है इसका मकसद? अपने लक्ष्‍य को हासिल करने में कितना सफल रहा यह संगठन?

सार्क की सीमित सफलता के चलते अस्तित्‍व में आया बिमस्टेक
दरअसल, दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) की सीमित सफलता और पाकिस्तान के लगातार असहयोगात्मक रवैये के चलते एक क्षेत्रीय संगठन की आवश्‍यकता महसूस की जा रही थी। पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को बढ़ावा देना जारी रखने के चलते भारत ने पाकिस्तान में होने वाले सार्क शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया था, तभी से सार्क के अस्तित्‍व और अस्मिता पर सवाल उठना शुरू हो गया था। अब माना जा रहा है कि भारत की ओर से बिम्सटेक’ को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे बिम्सटेक में शामिल सार्क देशों के बीच भी क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि बिम्सटेक में पाकिस्तान नहीं है।

सात देशों का उप-क्षेत्रीय समूह बिम्सटेक
‘बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी-सेक्टरल टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन’ का संक्षिप्त नाम है बिम्सटेक। इसकी की स्थापना 6 जून 1997 को बैंकाक घोषणा के माध्यम से की गई थी। इसका मुख्यालय बांग्लादेश के ढाका में है। यह दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के सात देशों का उप-क्षेत्रीय समूह है। यह बंगाल की खाड़ी से तटवर्ती या समीप देशों का एक अंतरराष्ट्रीय साझा क्षेत्रीय सहयोग संगठन है। बिम्सटेक में बांग्लादेश, भारत, म्यामांर, श्रीलंका, थाईलैंड, भूटान और नेपाल शामिल हैं। इस पहल की शुरुआत बिस्ट-एक के रूप में जून, 1997 में हुई थी, जिसमें बांग्लादेश, भारत, श्रीलंका और थाइलैंड के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।

उसी वर्ष दिसंबर में इसमें म्यांमार को शामिल किया गया और समूह का नाम बिम्स्ट-एक कर दिया गया। फरवरी, 2004 में नेपाल और भूटान के शामिल होने के बाद बैंकॉक में जुलाई, 2004 में हुए पहले शिखर सम्मेलन में इस समूह का नया नाम ‘बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी-सेक्टरल टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन’ (बिम्सटेक) रखा गया। बिम्सटेक दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के सात देशों के लगभग 1.5 अरब लोगों की आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला समूह हैं, जो लगभग 22 फीसद वैश्विक आबादी को दर्शाता है।

गुजराल डॉक्ट्रिन में पड़ी बुनियाद
इसकी शुरुआत गुजराल डॉक्ट्रिन के वक्त से ही मानी जा सकती है, जिसमें पाकिस्तान को शामिल न करने की बात कही गयी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने साफ संकेत दिया था कि अगर पाकिस्तान अपना असहयोगात्मक रवैया नहीं छोड़ेगा, तो भारत क्षेत्रीय सहयोग में उसे शामिल नहीं करेगा। इसी पृष्ठभूमि में 6 जून, 1997 को बिम्सटेक नामक संगठन की नींव पड़ी, जिसमें पाकिस्तान को शामिल नहीं किया गया। पाकिस्तान को तब भी अलग-थलग रखा गया था।

बिम्सटेक की कार्यप्रणाली
शिखर सम्मेलनों, मंत्री-स्तरीय बैठकों, उच्चाधिकारियों की बैठकों तथा विशेषज्ञों के बीच वार्ताओं तथा बैंकॉक स्थित बिम्सटेक वर्किंग ग्रुप के जरिये बिम्सटेक विभिन्न सरकारों के बीच में संपर्क स्थापित करने का मंच मुहैया कराता है। बिम्सटेक की अब तक तीन शिखर बैठकें और अनेक मंत्री व अधिकारी स्तरीय बैठकें हो चुकी हैं। 

अध्यक्षता
देशों के नाम के प्रथम अक्षर के अनुसार क्रम से इस समूह की अध्यक्षता का निर्णय होता है। फिलहाल नेपाल इसका अध्यक्ष है। इससे पहले बांग्लादेश (1997-99), भारत (2000), म्यांमार (2001-02), श्रीलंका (2002-03), थाइलैंड (2003-05) और बांग्लादेश (2005-06) बिम्सटेक की अध्यक्षता कर चुके हैं। भूटान के मना करने पर भारत ने 2006-09 तक अध्यक्षता की थी।

सहयोग के क्षेत्र
इस संगठन के सात सदस्यों के बीच मुख्य तौर पर 14 क्षेत्रों में सहयोग करेंगे। इनमें टेलीकॉम, क्राइम, कृषि, पर्यावरण, आतंकवाद और गरीबी जैसे क्षेत्र अहम हैं।

क्‍या है सार्क
सार्क यानी दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन का गठन (1985) में हुआ। अपने गठन के बाद से सार्क दक्षिण एशियाई देशों के विकास में कोई सार्थक और उपयोगी पहल नहीं कर सका। क्षेत्रीय सुरक्षा के मामले में पाकिस्तान ने भारत का साथ नहीं दिया और पाक में पल रही कट्टरता के कारण दक्षिण एशियाई देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग पर आतंकवाद की छाया मंडराती रही। पाकिस्‍तान के आतंकवादी पोषक रुख के कारण सार्क के दो महत्वपूर्ण देश भारत और पाक के बीच आपसी सामंजस्य और सहयोग कभी स्थापित ही नहीं हो पाया। सार्क का एक और प्रावधान था कि कोई भी निर्णय सभी सदस्य देशों की सहमति से लिया जाएगा। लेकिन, इस प्रावधान का भी अनुपालन नहीं हुआ, जिसके चलते साफ्टा (साउथ एशियन फ्री ट्रेड एरिया) का कोई लाभ नहीं मिल सका।

यह भी जानें
1- बिम्सटेक के सफर से जुड़े दो महत्वपूर्ण तथ्य हैं। एक, दक्षिण एशियाई देशों के बीच उप-क्षेत्रीय सहयोग का विकास हुआ और दूसरा, इसमें आसियान संगठन के दो (दक्षिण-पूर्वी एशियाई) देशों- म्यांमार और थाइलैंड- के शामिल होने से सदस्य देशों के बीच अंतरक्षेत्रीय सहयोग का विकास हुआ। म्यांमार और थाइलैंड का बिम्सटेक में शामिल होना भारत की ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ का परिणाम था, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ का रूप दिया है।

2- जाहिर है, सार्क तक तो भारत सिर्फ दक्षिण एशिया में ही क्षेत्रीय सहयोग, व्यापार, आयात-निर्यात आदि कर रहा था, लेकिन बिम्सटेक को बढ़ावा मिलने से पहुंच दक्षिण-पूर्वी एशिया तक हो गई है। भारत पहले सिर्फ दक्षिण एशिया पर ही फोकस कर रहा था, लेकिन अब उसने अपना विस्तार शुरू कर दिया है। अब भारत ने विकल्प के रूप में बहुपक्षीय संगठनों को प्रोत्साहन देना शुरू कर दिया है, जिसमें सबसे ऊपर है बिम्सटेक।

3- बिम्सटेक के विकास के लिए इस संगठन का डेवलपमेंटल पार्टनर एडीबी (एशियन डेवलपमेंट बैंक) बना। बिम्सटेक देशों के बीच में भौतिक संपर्क, आर्थिक संपर्क और सांस्कृतिक संपर्क इन तीनों को बढ़ाने के लिए एडीबी प्रोत्साहन करता है और फंड देता है।

4- इसके लिए त्रिपक्षीय संपर्क मार्ग की व्यवस्था बनाई है, जो भारत, थाइलैंड और म्यांमार के बीच है। वर्ष 2013 में इस समूह का आंतरिक व्यापार 74.63 अरब डॉलर था, जो 2005 में महज 25.16 अरब डॉलर ही था। मुक्त व्यापार समझौते के लागू होने के बाद इस समूह के अंदर व्यापार में 43 से 59 अरब डॉलर तक की बढ़ोतरी हो सकती है, लेकिन इसके लिए हर सदस्य देश को अपने यहां यातायात और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर सुविधाओं में बहुत अधिक बेहतरी करनी होगी।

Posted By: Ramesh Mishra