जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। प्रधानमंत्री के तौर पर अपनी दूसरी पारी की शुरुआत कर चुके नरेंद्र मोदी की विशेष कूटनीति का आगाज गुरुवार से जापान के शहर ओसाका से होगा। ओसाका में 27 से 29 जून, 2019 तक समूह-20 देशों की बैठक होने वाली है। बुधवार देर शाम मोदी इस बैठक में हिस्सा लेने के लिए रवाना हो गये।

वैसे तो मोदी से मुलाकात का आग्रह लगभग तमाम देशों से आया था, लेकिन अभी तक विदेश मंत्रालय ने आठ देशों के प्रमुखों के साथ भारतीय पीएम की द्विपक्षीय आधिकारिक मुलाकात का समय तय कर दिया है। आठ द्विपक्षीय मुलाकातों के अलावा मोदी वहां तीन बहुपक्षीय मुलाकातों में हिस्सा लेंगे।

विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि पीएम मोदी जापान-अमेरिका-भारत के प्रमुखों की बैठकों के अलावा चीन-रूस-भारत के प्रमुखों की बैठक में शिरकत करेंगे। इसके अलावा ब्रिक्स देशों के राष्ट्र प्रमुखों की बैठक भी होनी तय है।

इन तीन बहुपक्षीय बैठक के अलावा पीएम मोदी आस्ट्रेलिया के पीएम स्काट मॉरीसन, जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल, फ्रांस के राष्ट्रपति एमानुएल मैक्रां, तुर्की के राष्ट्रपति तैयीप एर्डोगन, रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, सउदी अरब के प्रिंस सलमान समेत आठ नेताओं के साथ मुलाकात तय हो गई है। अन्य देशों का आग्रह भी है, लेकिन समयाभाव की वजह से सभी को स्वीकार करना संभव नहीं हो पा रहा है। अन्य नेताओं के साथ अनौपचारिक मुलाकात भी होगी।

सनद रहे कि समूह-20 बैठक का आयोजन वर्ष 2007-08 के वैश्विक मंदी के बाद अमेरिका के आग्रह पर शुरु किया गया था ताकि वैश्विक आर्थिक मुद्दों पर एक समग्र नीति बनाई जा सके।

इस समूह ने ब्लैक मनी और आतंक के खिलाफ फंडिंग रोकने जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग को पुख्ता करने का काम किया है। ओसाका में होने वाली बैठक में वैश्विक अर्थव्यवस्था के समक्ष चुनौतियों को लेकर विमर्श होगा।

इससे पहले 1‍ दिसंबर 2018 को G20 summit ब्यूनस आयर्स में आयोजित की गई थी। इस बार यह बैठक 28-29 जून को होनी है। 

कई देशों की चिंता के पीछे अमेरिका
चीन को परेशानी
चीन की बात करें तो अमेरिका इस मंच के जरिए उस पर तीन तरफा हमला कर सकता है। अमेरिका पहले ही साफ कर चुका है कि वह इस मंच से हांगकांग के मसले को भी उठा सकता है। इस बारे में राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप और विदेश मंत्री माइक पोंपियों में विचार-विमर्श हो चुका है।

आपको बता दें कि हांगकांग में 12 जून को लाखों लोगों ने सड़कों पर उतरकर चीन के खिलाफ एक प्रदर्शन में हिस्‍सा लिया था। यह प्रदर्शन एक कानून में संशोंधन के खिलाफ था। हांगकांग के लोगों का मानना है कि कानून में संशोधन करके चीन को मनचाहे तरीके से लोगों को जेल में डालने का अधिकार मिल जाएगा।

वहीं, अमेरिका द्वारा यह मुद्दा इस मंच पर उठाने की आशंका के डर से ही चीन कुछ डरा हुआ है। दरअसल, इसकी वजह ये है कि यहां पर हांगकांग का मुद्दा उठाकर अमेरिका इसको अंतरराष्‍ट्रीय मुद्दे का रंग देने की कोशिश करेगा। यदि इसमें वह कामयाब हो गया तो यह चीन की परेशानियों को बढ़ा देगा। 

चीन का आरोप है कि अमेरिका ट्रेडवार के चलते इस तरह की हरकत कर रहा है। गौरतलब है कि चीन और अमेरिका के बीच काफी लंबे समय से ट्रेड वार चल रहा है। अमेरिकी राष्‍ट्रपति वन चाइना पॉलिसी पर पहले ही नाराजगी जता चुके हैं। इसके अलावा दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर भी दोनों देश कई बार आमने सामने आ गए हैं। चीन की परेशानी सिर्फ इन्‍हीं दो मुद्दों को लेकर नहीं है। ताइवान से बढ़ते अमेरिकी संबंधों से भी चीन परेशान है।

भारत की चिंता
भारत की तरफ से इस बार जी20 की बैठक में पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु को नियुक्‍त किया गया है। इस बार छठी बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सम्‍मेलन का हिस्‍सा बनेंगे।

इस सम्‍मेलन में उठने वाले ट्रेड वार के मुद्दे को लेकर भारत चिंतित है। इस मुद्दे को भी उठाने वाला अमेरिका ही है। अमेरिका का चीन के साथ-साथ भारत से भी ट्रेड वार चल रहा है।

अमेरिका चाहता है कि उसके यहां से आने वाले सामान पर किसी तरह का कोई कर न लगाया जाए। अमेरिकी राष्‍ट्रपति पहले से ही भारत द्वारा लगाए जा रहे कर को गलत करार दे चुके हैं।

आपको बता दें कि भारत ने अमेरिका से आने वाली बाइक हर्ले डेविडसन पर कर 50 फीसद तक कम कर दिया है, लेकिन इस पर भी अमेरिकी राष्‍ट्रपति तैयार नहीं हैं।

वह साफ कह चुके हैं कि जिस तरह से अमेरिका में आने वाले भारतीय सामान पर कोई कर नहीं लगता है, ठीक उसी रास्‍ते पर भारत को भी चलना होगा। ऐसा नहीं होने पर अमेरिका भी भारत से आने वाली वस्‍तुओं पर उतना ही कर लगा देगा।

ईरान को डर
जी20 की बैठक में अमेरिका ईरान से बढ़ते तनाव को जायज ठहराने की कोशिश कर सकता है। आपको यहां पर ये भी बता दें कि मिडिल ईस्‍ट में से केवल सऊदी अरब ही जी20 का सदस्‍य है। वहीं वर्तमान में यह अमेरिका का बड़ा सहयोगी भी बनकर उभरा है।

वहीं ईरान से परमाणु डील खत्‍म करने के बाद से ही अमेरिका उसके प्रति काफी सख्‍त हो गया है। यहां तक की अमेरिका की ही वजह से ईरान से भारत और चीन को मजबूरन तेल खरीद खत्‍म करनी पड़ी है। इतना ही नहीं इन दोनों के बीच तनाव इस कदर बढ़ चुका है कि वहां पर अमेरिका ने अपने जंगी जहाजों को मरीन के साथ तैनात किया हुआ है।

इस बैठक में राष्‍ट्रपति ट्रप ईरान के मुद्दे को भले ही सीधेतौर पर न उठाएं लेकिन वह इशारों ही इशारों में ईरान के खिलाफ होने वाली कार्रवाई का जिक्र जरूर कर सकते हैं।

बेहद खास मंच
यहां पर आपको ये भी बताना जरूरी होगा कि वैश्विक मंच होने की वजह से यहां पर उठने वाले सभी मुद्दे खास अहमियत रखते हैं। अमेरिका के लिए यह मंच इसलिए बेहद खास है क्‍योंकि यहां से उठी आवाज सभी देशों के लिए होती है। यहां पर राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप जो कुछ कहेंगे वह दूसरे देशों के लिए भी स्‍पष्‍ट इशारा होगा और कुछ देशों के लिए चेतावनी भी होगी।

ये देश हैं शामिल
जी-20 सदस्यों में अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, यूरोपियन यूनियन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, मैक्सिको, रूस, सऊदी अरब, साउथ अफ्रीका, साउथ कोरिया, तुर्की, ब्रिटेन और अमेरिका शामिल है। जी-20 में दुनिया का 80 प्रतिशत व्यापार, दो-तिहाई जनसंख्या और दुनिया का करीब आधा हिस्सा शामिल है।

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Posted By: Nitin Arora