मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। ईरान से तेल खरीदने में भारत को छूट देने का अमेरिकी फैसला उस समय आया है जब भारत में आम चुनाव पूरे उफान पर है। इस हालात से निबटने के लिए जिस स्तर पर राजनीतिक व कूटनीतिक विमर्श की दरकार है वह निश्चित तौर पर केंद्र सरकार नहीं दे सकती। ऐसे में अब अमेरिकी छूट को फिर से हासिल करने या ईरान से तेल खरीदने की वैकल्पिक व्यवस्था को स्थापित करने जैसे अहम मुद्दों को नई सरकार के गठन तक इंतजार करना होगा। इसी बीच पेट्रोलियम मंत्री धर्मेद्र प्रधान और विदेश मंत्रालय ने आश्वस्त किया है कि देश में क्रूड की कोई दिक्कत नहीं होगी। भारत ईरान के बदले दूसरे देशों से तेल खरीदने की योजना तैयार कर चुका है।

अमेरिका ने सोमवार को एक अहम फैसला करते हुए ईरान पर तेल बेचने से पूरी तरह से रोक लगा दी है। पहले जो प्रतिबंध लगा था, उससे भारत समेत आठ देशों को छह महीने की छूट मिली हुई थी। इस छूट को हासिल करने के लिए भारत ने जबरदस्त कूटनीतिक पहल की थी। छूट की अवधि 2 मई, 2019 को समाप्त हो रही है।

पेट्रोलियम मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक अब कोई भी कूटनीतिक पहल अगली सरकार के आने के बाद ही संभव है। सिर्फ अमेरिका से ही इस बारे में बात नहीं करना होगा बल्कि ईरान से भी तेल आयात को जारी रखने की वैकल्पिक व्यवस्था पर बात करनी होगी।

पिछले वर्ष की शुरुआत में जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर नए सिरे से प्रतिबंध लागू करने का ऐलान किया था, तभी से भारत व ईरान के बीच तेल कारोबार को बनाए रखने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था पर बात हो रही है। इस व्यवस्था के तहत कुल आयात बिल के एक बड़े हिस्से का भुगतान भारतीय रुपये में करना भी था। भारत इस बारे में ईरान के अलावा यूरोपीय देशों से भी बात कर रहा था कि भुगतान की कोई दूसरी व्यवस्था हो जाए। लेकिन इस बातचीत को अभी तक अंजाम पर नहीं पहुंचाया जा सका है।

बहरहाल, अमेरिका के नए फैसले को लेकर आश्वस्त करते हुए प्रधान ने कहा है कि देश की रिफाइनरियों को पर्याप्त क्रूड की आपूर्ति करने के लिए सरकार ने एक ठोस कार्ययोजना बना ली है। विश्व के प्रमुख तेल उत्पादक देशों से तेल आयात बढ़ाने पर बात हो रही है। देश की रिफाइनरियां पेट्रोल, डीजल व अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की पर्याप्त आपूर्ति को बनाए रखने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।

विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने भी ऐसा ही आश्वासन देते हुए कहा है कि सरकार अमेरिका समेत अन्य सभी साझेदार देशों के साथ मिल कर इस समस्या का समाधान निकालने की कोशिश करेगी ताकि भारत की ऊर्जा व आर्थिक सुरक्षा हितों की रक्षा की जा सके।

ईरान पर प्रतिबंध से गड़बड़ा सकता है तेल आयात का गणित

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली : ईरान से तेल नहीं खरीद पाने का असर भारत पर कई तरीके से पड़ेगा। एक तो भारत अपने एक विश्वसनीय तेल आपूर्तिकर्ता देश से हाथ धो बैठेगा, वहीं महंगा क्रूड खरीदने से देश के तेल आयात बिल में भी भारी इजाफा हो सकता है। पिछले वित्त वर्ष (2018-19) में भारत का तेल आयात बिल तकरीबन 125 अरब डॉलर का था जो वर्ष 2017-18 के मुकाबले 42 फीसद ज्यादा था।

अगर क्रूड इस वर्ष महंगा हुआ तो तेल आयात बिल और बढ़ जाएगा। तमाम प्रतिबंधों के बावजूद वर्ष 2017-18 में भारत ने ईरान से 2.26 करोड़ टन तेल खरीदा था जो वर्ष 2018-19 में बढ़ कर 2.4 करोड़ टन हो गया था। इस दौरान देश का कुल तेल आयात 22 करोड़ टन से बढ़ कर 22.86 करोड़ टन हो गया था। चालू वर्ष में इसके बढ़ने के पूरे आसार हैं। क्योंकि एक तो भारत के कुल तेल खपत में घरेलू उत्पादन की हिस्सेदारी घटती जा रही है।

छह वर्ष पहले भारत अपनी जरूरत का 74 फीसद तेल बाहर से आयात करता था, जबकि वर्ष 2017-18 में 83 फीसद आयात किया गया था। चालू वित्त वर्ष में घरेलू उत्पादन में कोई वृद्धि होने की संभावना नहीं है, जबकि आर्थिक विकास दर 7 फीसद से ज्यादा रहने की वजह से मांग में भी इजाफा होने के आसार हैं।

ईरान से आयातित तेल की कमी भारत को इसलिए भी महसूस होगी कि वह हमेशा जरूरत के वक्त भारत को आसान शर्तो पर तेल की आपूर्ति करता रहा है। ईरान के तेल बाजार से हट जाने की वजह से क्रूड की कीमत में तेजी आने लगी है, इसका भी खामियाजा भारत को उठाना पड़ेगा।

ईरान पर पूरा प्रतिबंध लागू होने से पहले वेनेजुएला और लीबिया जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों से भी आपूर्ति प्रभावित हो गई है। साथ ही तेल उत्पादक देशों के संगठन (ओपेक) ने मार्च, 2019 में ही कुल तेल उत्पादन में 15 लाख बैरल प्रति दिन की कटौती करने का फैसला किया है। इससे कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने की संभावना जताई जा रही है। सोमवार को कच्चे तेल की कीमत छह महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थी।

बहरहाल, भारत ने दूसरे वैकल्पिक बाजारों से बात शुरू कर दी है। सउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ईराक, मैक्सिको और अमेरिका से ज्यादा क्रूड खरीदा जा सकता है, लेकिन इन्हें ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी।

गौरतलब है कि महंगा क्रूड खरीदने से तेल आयात बिल बढ़ता है जिसका असर चालू खाते में घाटे (आयात व निर्यात पर खर्च राशि का अंतर) के रूप में दिखाई देता है। चालू खाते में घाटा बढ़ने का असर देश में महंगाई पर भी पड़ता है और डॉलर के मुकाबले रुपया भी कमजोर होता है। सोमवार को ही डॉलर के मुकाबले रुपये में 32 पैसे की गिरावट के लिए क्रूड के महंगा होने की संभावना को ही जिम्मेदार ठहराया गया था।

Posted By: Bhupendra Singh

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप