नोएडा [धर्मेंद्र चंदेल]। Rahul Gandhi Bhatta Parsaul: आज से ठीक 9 साल पहले 10 मई, 2011 को दिल्ली से सटे गौतमबुद्धनगर के भट्टा-पारसौल में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने यूपी पुलिस को ऐसा चकमा दिया था, जिसे भारतीय राजनीति के इतिहास में कभी नहीं भूलाया जा सकता है। दरअसल, भट्टा पारसौल गांव में गोलीकांड के बाद राहुल गांधी ग्रामीणों से मिलना चाहते थे और तत्कालीन मायावती सरकार ऐसा नहीं चाहती थी। बावजूद इसके जेवर के स्थानीय नेता ठाकुर धीरेंद्र सिंह के साथ मिलकर राहुल गांधी ने ऐसा जाल बुना कि यूपी पुलिस धोखा खा गई और राहुल गांधी बाइक पर बैठकर भट्टा पारसौल गांव पहुंच गए। यह मामला मीडिया में कई दिनों तक सुर्खियों में बना रहा।

दरअसल, विवाद की कड़ी में भट्टा-पारसौल गांव में ग्रामीणों और पुलिस के बीच 7 मई, 2011 को हिंसा हुई थी, जिसमें 2 किसानों और 2 पुलिसवालों की मौत गोली लगने से हो गई थी। इसके बाद किसान और ग्रामीण आमने-सामने आ गए थे। हिंसा में तत्कालीन जिलाधिकारी दीपक अग्रवाल को भी गोली लगी थी। इसके बाद यहां पर माहौल ज्यादा खराब हो गया था। 

राहुल गांधी आना चाहते थे भट्टा पारसौल, यूपी सरकार नहीं थी तैयार

बता दें कि भट्टा पारसौल में 7 मई को हुई हिंसा के बाद यह एक राजनीतिक मुद्दा बन गया था। सभी दलों ने तत्कालीन बहुजन समाज पार्टी सरकार और मुख्यमंत्री मायावती पर निशाना साध रहे थे। राहुल गांधी भी इस राजनीति में कूद पड़े थे। इसी के साथ राहुल गांधी ने भट्टा-पारसौल जाने का एलान कर दिया। वहीं, यूपी में सत्तासीन बसपा सरकार किसी भी हाल में राहुल गांधी को भट्टा पारसौल नहीं आने देना चाहती थी।

कांग्रेस के युवा नेता धीरेंद्र सिंह बने राहुल के सारथी

गौतमबुद्धनगर के रहने वाले ठाकुर धीरेंद्र सिंह उस समय युवा कांग्रेस के नेताओं में शुमार थे और पार्टी में अच्छी पैठ बनाना चाहते थे। धीरेंद्र सिंह 10 मई राहुल गांधी के सारथी बने थे। 10 मई, 2011 को तत्कालीन कांग्रेस नेता धीरेंद्र सिंह उत्तर प्रदेश की पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए राहुल गांधी को बाइक पर पीछे बैठाकर किसानों के बीच पहुंच गए। 

धीरेंद्र सिंह अचानक आए थे लाइम लाइट में

10 मई, 2011 से पहले तत्कालीन कांग्रेसी नेता धीरेंद्र सिंह की कोई खास पहचान नहीं थी,लेकिन जैसे ही राहुल गांधी को बाइक पर बैठाकर भट्टा पारसौल गांव पहुंचाने का मामला प्रकाश में आया तो उन्हें प्रदेश प्रवक्ता घोषित किया था। चर्चा में आने के चले वर्ष 2012 में हुए यूपी विधानसभा चुनाव में बतौर प्रत्याशी चुनाव लड़े, लेकिन 58024 वोट प्राप्त कर वह दूसरे स्थान पर रहे थे। वहीं, 2017 विधानसभा चुनाव में वह कांंग्रेस छोड़कर भाजपा में आ गए और फिलहाल जेवर विधानसभा से विधायक हैं।

यह भी जानें

7 मई, 2011 को जमीन अधिग्रहण के मुद्दे पर यूपी पुलिस और किसान आमने-सामने आ गए और दोनों ओर से जमकर फायरिंग हुई। इस खूनी संघर्ष में किसान राजपाल, राजवीर और पुलिस कर्मी मनोज और मनोहर की गोली लगने से मौत हो गई। वहीं तत्कालीन जिलाधिकारी दीपक अग्रवाल के पैर में गोली लगी थी। उनके पैरों में गोली लगने की तस्वीर उस दौरान सबसे ज्यादा सुर्खियों में आई थी। 

यह था पूरा विवाद

बताया जाता है कि किसानों की जमीन पर आबादी है या नहीं इसका भी ध्यान नहीं रखा गया था। जब किसानों को इस बात का पता चला कि उनकी आबादियों तक को अधिग्रहीत कर लिया गया है तो वह गुस्सा गए और 17 जनवरी 2011 से आंदोलन की नींव पड़ी। इसके बाद हिंसक प्रदर्शन शायद ही कभी जिले के लोग भुला पाएं।

Posted By: JP Yadav

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