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केरलम में तीसरी ताकत बन रही BJP? LDF-UDF की राजनीति में मची हलचल

Published: Sun, 03 May 2026 08:15 PM (GMT+05:30)

केरल में भाजपा पारंपरिक LDF-UDF की दोध्रुवीय राजनीति को चुनौती देते हुए एक तीसरी ताकत के रूप में उभर रही ...और पढ़ें

केरलम में तीसरी ताकत बन रही BJP LDF-UDF की राजनीति में मची हलचल (फाइल फोटो)

केरलम में तीसरी ताकत बन रही BJP LDF-UDF की राजनीति में मची हलचल (फाइल फोटो)

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। केरल में सोमवार को चुनाव नतीजों का इंतजार है, लेकिन इससे पहले बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा राज्य की पारंपरिक दोध्रुवीय राजनीति को चुनौती देने लगी है?

लंबे समय से यहां सत्ता LDF (वाम मोर्चा) और UDF (कांग्रेस गठबंधन) के बीच ही बदलती रही है। 140 सदस्यीय विधानसभा में मजबूत संगठन, वोट ट्रांसफर और स्थानीय समीकरणों के चलते तीसरी ताकत के लिए जगह बनाना मुश्किल रहा है।

भाजपा बना रही है जगह

लेकिन हाल के चुनावों में संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा धीरे-धीरे कुछ इलाकों में अपनी जगह बना रही है। 2024 लोकसभा चुनाव में त्रिशूर से पहली जीत, बढ़ता वोट शेयर, स्थानीय निकाय चुनावों में प्रदर्शन और तिरुवनंतपुरम व पालक्काड जैसे शहरी क्षेत्रों में पकड़ मजबूत होने से राजनीतिक तस्वीर बदलती दिख रही है।

हालांकि भाजपा अभी पूरे राज्य में सत्ता की चुनौती देने की स्थिति में नहीं है, लेकिन उसकी रणनीति चुनिंदा सीटों पर ध्यान केंद्रित करने की है। इससे कई जगह एलडीएफ और यूडीएफ के बीच सीधी लड़ाई अब त्रिकोणीय हो रही है, जिससे भाजपा का महत्व बढ़ रहा है।

केरल की पारंपरिक राजनीति

करीब चार दशकों तक केरल की राजनीति एक तय पैटर्न पर चलती रही, जहां हर पांच साल में एलडीएफ और यूडीएफ के बीच सत्ता बदलती थी। इस मजबूत व्यवस्था में तीसरी पार्टी के लिए जगह बनाना बेहद कठिन था।

लेकिन 2021 में यह सिलसिला टूटा, जब मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ दोबारा सत्ता में लौटा और 99 सीटें जीतीं, जबकि यूडीएफ 41 सीटों पर सिमट गया। इससे यह संकेत मिला कि राज्य में पारंपरिक राजनीति अब भी मजबूत है।

इसके बावजूद भाजपा ने धीरे-धीरे अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश जारी रखी है। पार्टी का फोकस तत्काल सत्ता नहीं, बल्कि वोट शेयर बढ़ाने और संगठन को मजबूत करने पर रहा है।

भाजपा का धीरे-धीरे बढ़ता असर

भाजपा की स्थिति अब केवल प्रतीकात्मक नहीं रही। 2024 लोकसभा चुनाव में त्रिशूर से सुरेश गोपी की जीत ने पार्टी को बड़ा राजनीतिक आधार दिया। इसके साथ ही पार्टी का वोट शेयर 15.64% से बढ़कर 19.24% हो गया।

दूसरी ओर, लोकसभा चुनावों में वाम दलों की स्थिति कमजोर हुई है। 2004 में 12 सीट जीतने वाली पार्टी 2019 और 2024 में केवल एक सीट तक सिमट गई। हालांकि विधानसभा में उसका दबदबा बना हुआ है।

स्थानीय निकाय चुनावों में भी भाजपा ने अपनी ताकत दिखाई है। तिरुवनंतपुरम नगर निगम में पार्टी ने 30 साल बाद वाम दलों का दबदबा खत्म करते हुए 100 में से 50 वार्ड जीतकर सबसे बड़ा दल बनने का रिकॉर्ड बनाया।

किन सीटों पर भाजपा की नजर

भाजपा अब पूरे राज्य में फैलने के बजाय कुछ खास सीटों पर ध्यान दे रही है। तिरुवनंतपुरम, पालक्काड, त्रिशूर, कासरगोड और पथनमथिट्टा ऐसे क्षेत्र हैं जहां पार्टी अपनी पकड़ मजबूत मानती है।

तिरुवनंतपुरम में नगर निगम जीत के बाद पार्टी को संगठनात्मक मजबूती मिली है। वहीं पालक्काड में 2015 से लगातार सफलता ने इसे त्रिकोणीय मुकाबले का केंद्र बना दिया है।

त्रिशूर में लोकसभा जीत के बाद भाजपा का आत्मविश्वास बढ़ा है, जबकि कासरगोड में कन्नड़ भाषी मतदाताओं और कर्नाटक से नजदीकी का फायदा मिलने की उम्मीद है। पथनमथिट्टा में सबरीमाला मुद्दा भाजपा के लिए अहम बना हुआ है।

सीमित सीटों पर फोकस

भाजपा की रणनीति साफ है सभी 140 सीटों पर लड़ाई लड़ने के बजाय कुछ सीटों पर मजबूत पकड़ बनाना। इससे वह धीरे-धीरे अपनी स्थिति मजबूत कर रही है और कई जगह मुकाबले को त्रिकोणीय बना रही है।

यह रणनीति बताती है कि भाजपा केरल में तुरंत सत्ता नहीं, बल्कि लंबे समय के लिए मजबूत राजनीतिक आधार तैयार कर रही है। अगर यह रुझान जारी रहता है, तो आने वाले समय में केरल की पारंपरिक दोध्रुवीय राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

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