(रिजवान अंसारी)। हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच टू प्लस टू डायलॉग के स्थगित होने और ट्रेड-वार को लेकर अमेरिका-चीन के बीच बढ़ती रस्साकशी के कारण भारत-अमेरिका संबंध में फिर से तनाव के संकेत मिल रहे हैं। जहां टू प्लस टू डायलॉग के स्थगन के पीछे अमेरिका ने कोई वजह नहीं बताई, वहीं इस व्यापार-युद्ध की जद में भारत के भी आने की आशंका बढ़ गई है। इससे इतर पिछले महीने जून में सिंगापुर में संपन्न शांगरी-ला वार्ता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारत की विदेश नीति पर दिए गए बयान ने भी भारत-अमेरिका संबंध में बढ़ती असहमति की तरफ इशारा किया था। प्रधानमंत्री ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर भारत और अमेरिका के ‘साझा दृष्टिकोण’ की बात की, जो कि अमेरिकी रक्षा सचिव जेम्स मैटिस द्वारा इसी समारोह में दिए गए बयान से काफी अलग था। लिहाजा दोनों देशों के बीच बढ़ती असहमति इनके रिश्तों में मतभेद के संकेत तो दे ही रही है। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत की साख बढ़ाने की कोशिशों से भी कुछ खास फायदा होता नजर नहीं आ रहा है।

 

मतभेद के बिंदु

गौरतलब है कि भारत और अमेरिका के कूटनीतिक और व्यापारिक संबंध में पिछले कुछ दिनों से तनाव के संकेत मिल रहे हैं और टू प्लस टू डायलॉग का स्थगन इसी कड़ी की बानगी प्रतीत होती है। अगर हिंद-प्रशांत क्षेत्र की बात करें तो प्रधानमंत्री मोदी ने शांगरी-ला डायलॉग में इसे एक प्राकृतिक भू-क्षेत्र के रूप में संबोधित किया, न कि रणनीतिक, जबकि अमेरिकी रक्षा सचिव जेम्स मैटिस ने हिंद-प्रशांत को सैन्य अधिकार के लिए व्यापक सुरक्षा रणनीति का क्षेत्र बताया। इससे साफ होता है कि अमेरिका इस क्षेत्र को रणनीतिक अथवा सामरिक क्षेत्र के रूप में बनाए रखना चाहता है, जबकि भारत सिर्फ व्यापार के नजरिये से इस क्षेत्र को विकसित करना चाहता है। मोदी ने चीन के साथ संबंध सुधार तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थिरता बहाली के लिए अमेरिका, रूस और चीन के साथ भारत के संबंधों को एक समान रूप में संदर्भित किया है, जबकि अमेरिका द्वारा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की गतिविधियों का मुकाबला करने की बात कही गई है। जाहिर है अमेरिका का यह प्रयास हिंद-प्रशांत क्षेत्र में तनाव को निमंत्रण जैसे होगा। अमेरिका-चीन के बीच ट्रेड-वार इसी का दूसरा पहलू हो सकता है।

दरअसल हिंद-प्रशांत आर्थिक गलियारे की अवधारणा भारत-अमेरिका सामरिक वार्ता के दौरान प्रस्तुत की गई थी। यह अवधारणा एशिया के नए विकास क्षेत्रों में अमेरिका की बढ़ती भागीदारी को देखते हुए एक नई संभावना को तलाशने की कोशिश थी। हिंद-प्रशांत शब्द पूर्वी अफ्रीका और पश्चिम एशिया से पूर्वी एशिया तक फैली पूर्वी हिंद महासागर और पश्चिमी प्रशांत महासागर की समुद्री जगह को संदर्भित करता है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस क्षेत्र के देशों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसी एक देश की न बता कर सभी देशों की बताई है। जानकारों के मुताबिक प्रधानमंत्री का यह बयान अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका को संदेश है कि बिना किसी वजह के वह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में कोई तनाव पैदा न करे।

दूसरी ओर एच-1बी पेशेवर वीजा में प्रस्तावित कटौती और एच4 वीजा को रद करने की अमेरिकी कोशिश भी भारत-अमेरिका के रिश्तों में तनाव पैदा कर सकता है। एच-1बी वीजा एक गैर-प्रवासी वीजा है जिसके तहत अमेरिकी कंपनियां कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में विदेशी कर्मचारियों की भर्ती करती हैं। यह जानना बेहद जरूरी है कि एच-1बी वीजा भारतीय पेशेवरों के बीच बेहद लोकप्रिय है, क्योंकि लाखों भारतीय अभी अमेरिका में काम कर रहे हैं। जहां तक एच4 वीजा का सवाल है तो यह एच-1बी वीजा धारकों के जीवन साथियों को जारी किया जाता है। ऐसे समय में जब लाखों भारतीय अमेरिका में रोजगार पा रहे हैं तब ट्रंप प्रशासन के इस प्रस्ताव से अमेरिका में रह रहीं हजारों भारतीय महिलाएं प्रभावित होंगी।

 

अगर अमेरिका द्वारा स्टील और एल्युमीनियम के आयात पर नए टैरिफ की बात करें तो इससे सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया प्रभावित होगी। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा विदेशी इस्पात पर 25 फीसद और एल्युमीनियम पर 10 फीसद की दर से शुल्क लगाने का फैसला न केवल भारत के स्थानीय बाजारों पर असर डालेगा, बल्कि दुनिया भर में तेल की कीमतों को भी बढ़ाएगा। जाहिर है इससे भी रिश्ते में तल्खी बढ़ने की आशंका है। एक और बात जो महत्वपूर्ण है वह यह कि हार्ले-डेविडसन मोटरसाइकिल मामले ने भी भारत और अमेरिका के बीच विवाद को बढ़ा दिया। हार्ले-डेविडसन मोटरसाइकिल पर भारत ने टैरिफ को 75 फीसद से कम कर 50 फीसद जरूर किया, लेकिन इसके बावजूद वाशिंगटन के अधिकारियों को आपत्ति है। यहां पर गौर करने वाली बात यह भी है कि अमेरिका इंडियन रॉयल एनफील्ड मोटरसाइकिल के आयात पर शून्य टैरिफ लगाता है। जाहिर है मोदी प्रशासन की भी कुछ कोशिशें तनाव को बढ़ा रही हैं।

भारत की भूमिका
दरअसल दोनों देशों के बीच बढ़ने वाला यह तनाव एकतरफा नहीं है। भारत द्वारा भी उठाए गए कई ऐसे कदम हैं जिन पर अमेरिका ने एतराज जताया है। भारत ने इस वर्ष जून में अमेरिका और जापान के साथ समुद्री अभ्यास में शामिल होने के लिए ऑस्ट्रेलियाई अनुरोध को खारिज कर दिया था। इसके विपरीत रूस तथा चीन की अगुआई वाले शंघाई सहयोग संगठन के देशों के साथ किंगदाओ में होने वाले सैन्य अभ्यास के आयोजन में शामिल होने की भारत की स्वीकृति से भी ट्रंप प्रशासन चिंतित है। साथ ही डेयरी और पोर्क उत्पादों के निर्यात के प्रतिरोध पर भारत के टैरिफ और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अमेरिकी कंपनियों के लिए भारतीय सर्वर पर डाटा स्थानीयकरण के नियम लागू करना, ऐसे प्रयास हैं जो तनाव के कारण बन रहे हैं। इसके अलावा यदि अनौपचारिक और औपचारिक शिखर सम्मेलन के साथ-साथ शंघाई सहयोग संगठन, ब्रिक्स और जी-20 बैठकों की बात की जाए तो भारतीय प्रधानमंत्री मोदी चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से वर्ष के अंत तक चार-पांच बार मिल चुके होंगे। इसके विपरीत भारत-अमेरिका के बीच टू प्लस टू वार्ता को निर्धारित करने में लगभग छह माह का वक्त लग गया था। हाल के महीनों में व्यापार संरक्षणवाद के नाम पर दोनों देश कई दफा एक-दूसरे को विश्व व्यापार संगठन में ले गए हैं और यह भी भारत और अमेरिका के बीच विरोध का बड़ा मुद्दा है। जाहिर है ये ऐसे पहलू हैं जिन पर भारत को भी मंथन करने की जरूरत है।

टू प्लस टू डायलॉग
जब दो देशों के बीच एक साथ ही दो-दो मंत्रिस्तरीय या सचिवस्तरीय वार्ताएं आयोजित की जाती हैं तो इसे टू प्लस टू वार्ता मॉडल का नाम दिया जाता है। गौरतलब है कि यह पहला मौका था जब मंत्री स्तर पर भारत किसी देश के साथ टू प्लस टू डायलॉग जैसी पहल को अंजाम देने की राह पर था। हालांकि सचिव स्तर पर भारत ऐसी वार्ताएं दूसरे देशों के साथ कर चुका है। भारत और अमेरिका के बीच संवाद को नया रूप देने के लिए नियमित वार्ता का एक ऐसा ढांचा विकसित करने की कोशिश की जा रही थी, जिससे दोनों देशों के बीच रक्षा और व्यापार के क्षेत्र में साङोदारी और मजबूत हो सके। इसका दूसरा उद्देश्य यह भी था कि क्षेत्र में शांति और स्थिरता कायम करने में भारत-अमेरिका मिलकर अपनी भूमिका निभाएं। प्रस्तावित संरचना के तहत भारत और अमेरिका के बीच टू प्लस टू संवाद व्यवस्था में नियमित रूप से दोनों देशों के रक्षा एवं विदेश सचिवों के बीच लगातार संपर्क बनाए रखने की योजना थी।

 

आगे की राह

गौरतलब है कि पूंजीवादी और मिश्रित अर्थव्यवस्था के रूप में भारत-अमेरिकी संबंध हमेशा से ही सहयोगी बने रहे हैं, लेकिन मौजूदा वक्त में यह संबंध लेन-देन की नीति पर निर्भर कर रहा है। इसी कारण भारत-अमेरिका के बीच अलग-अलग मुद्दों पर असहमति देखी जा रही है। इन असहमतियों के कारण ही दोनों देशों के रिश्ते में अस्थिरता आ रही है। लेकिन सवाल यह भी है कि इससे इतर दूसरे मुद्दों पर अगर दोनों देशों के बीच सहमति नहीं बनती है तो दोनों देशों के व्यापारिक और कूटनीतिक हित किस हद तक प्रभावित होंगे? दरअसल नए अमेरिकी कानून तथा रूस, ईरान पर अमेरिका के प्रतिबंध भारत-अमेरिकी संबंधों के लिए बड़ी चुनौतियां पेश कर रहे हैं। अमेरिका ईरान के मामले में भारतीय संस्थाओं को तो रोक ही रहा है, साथ ही रूस के साथ व्यापार करने पर भी इन्हें रोकने की कोशिश कर रहा है। जाहिर है अमेरिका भारत के हितों की अनदेखी कर रहा है। एक ओर रूस के साथ जहां भारत का 70 सालों का गहरा रिश्ता है, वहीं मौजूदा वक्त में भारत ईरान से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल आयात करता है। जाहिर है ये प्रतिबंध भारत का ईरान और रूस के साथ संबंधों को एक चुनौतीपूर्ण चौराहे पर ले जाएंगे।

 

हालांकि भारत ने कई बार संकेत दिए हैं कि वह अमेरिकी नाराजगी के बावजूद ईरान से तेल खरीदना जारी रखेगा। इसी तरह मौजूदा ट्रेड-वार पर भी भारत ने अमेरिका के सामने नहीं झुकने के संकेत दिए हैं। बहरहाल अमेरिका और भारत दोनों देशों को टू प्लस टू संवाद जैसी व्यवस्था को बहाल करने की कोशिश करनी चाहिए ताकि निरंतर संवाद के जरिये हिंद-प्रशांत जैसे मुद्दे सहित अन्य मसलों को सुलझाने के प्रयास किए जा सकें। भारत को भी वह आगे बढ़ कर अमेरिका के साथ अपने संबंध बेहतर करने की कोशिश करनी चाहिए, अन्यथा प्रधानमंत्री की विदेश नीति को सुधारने की कोशिशें सार्थक नहीं हो पाएंगी। जाहिर है तब मोदी सरकार की विदेश नीति सवालों के घेरे में आ जाएगी।

(लेखक जामिया मिलिया इस्लामिया अध्येता हैं)

Posted By: Kamal Verma