राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। आतंकियों के साथ पकड़े गए डीएसपी देविंदर सिंह का शुरू से ही विवादों से नाता रहा है। आतंकियों के गढ़ कहे जाने वाले त्राल का रहने वाला देविंदर सिंह कभी भी विभाग में एक ईमानदार अधिकारी की छवि नहीं बना पाया। हालांकि सभी इस बात से हैरान रहते थे कि वह न जाने कैसे आतंकी संगठनों में आसानी से अपने मुखबिर पैदा कर लेता था। पुलिस विभाग में सब इंस्पेक्टर भर्ती हुआ देविंदर डीएसपी तो बन गया, लेकिन काफी समय से उसकी उगाही करने की भी शिकायतें मिल रहीं थीं। यही कारण है कि वह बीते 20 वर्षो से लगातार डीएसपी पद पर तैनात था, उसकी पदोन्नति रुकी हुई थी।

1992 में हुआ था पुलिस में भर्ती

देविंदर सिंह वर्ष 1992 में सब इंस्पेक्टर भर्ती हुआ था। पुलिस ट्रेनिंग पूरी करने के बाद वह जब दक्षिण कश्मीर में बतौर प्रोबेशन तैनात था तो उसने एक अन्य साथी सब इंस्पेक्टर संग एक ट्रक में नशीले पदार्थो की खेप बरामद करने के साथ तस्कर भी पकड़ा। आरोप है कि बाद में पैसे लेकर उसने मामला निपटा दिया। नशीले पदार्थ भी बेच डाले थे। इस मामले की जांच हुई और उसकी सेवामुक्ति का निर्देश जारी हो गया। नौकरी जाने पर उसने अपने परिवार के प्रभाव का इस्तेमाल किया, माफी मांगी। लिहाजा तत्कालीन आइजी पुलिस ने उसे एक मौका देते हुए जम्मू-कश्मीर पुलिस के नवगठित विशेष अभियान दल (एसओजी) में भेज दिया।

एसओजी में था तैनात

देविंदर सिंह ने एसओजी में शामिल होने के बाद कई आतंकरोधी अभियान में हिस्सा लिया। आतंकियों से मुठभेड़ में वह कई बार बाल-बाल बचा। उसके शरीर में आज भी गोलियों के घाव हैं। आतंकरोधी अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण उसे समय पूर्व पदोन्नति भी मिली और छह सालों में वह डीएसपी बन गया।

नहीं छूटी भ्रष्टाचार की आदत

आरोप है कि आतंकरोधी अभियान दल का हिस्सा बनने के बावजूद उसकी जल्द पैसा कमाने की आदत नहीं छूटी। वह अक्सर आतंकियों के साथ संबंध होने के आरोप में पकड़े गए लोगों के परिजनों से मोटी रकम लेने के कई मामलों में फंसा। आरोप है कि वर्ष 2005 में बड़गाम के एक ईंट भट्टा मालिक नजीर अहमद सोफी को भी झूठे मामलों में फंसाने की धमकी देते हुए उससे करीब पांच लाख रुपये लिए थे। इसके अलावा एक नागरिक ने भी एक मजहबी नेता के कहने पर देविंदर पर उसे परेशान करने और वसूली करने का आरोप लगाया था।

अपने ही साथी की छीन ली थी राइफल

बड़गाम में एसओजी यूनिट में तैनात रहते हुए डीएसपी देविंदर सिंह का एक बार अपने एक साथी से झगड़ा हो गया था। उसने कथित तौर उसकी राइफल छीन उसे गोली मारने की धमकी दी थी। देविंदर सिंह के खिलाफ पुलिस संगठन ने बीते दस सालों में दो बार विभागीय जांच बैठाई है।

हिरासती मौत का मामला भी है

देविंदर सिंह का नाम वर्ष 2003 में बड़गाम में मोहम्मद अयूब डार पुत्र अब्दुल रहमान डार निवासी शोलीपोरा पखरपोरा की कथित हिरासती मौत में भी आया है। राज्य पुलिस की अपराध शाखा ने भी इस संदर्भ में एक मामला दर्ज किया है।

दो दशकों से त्राल में अपने पैतृक घर नहीं गया

देविंदर सिंह के परिजनों ने दावा किया है कि आतंकियों की हिटलिस्ट में होने के कारण वह बीते दो दशकों के दौरान एक बार भी त्राल में अपने पैतृक घर नहीं गया है। एक बार अपने किसी निकट संबंधी के घर हुई मौत के सिलसिले में वह गया था, लेकिन कुछ ही देर में लौट आया था। हालांकि कुछ पुलिस अधिकारी कहते हैं कि वह आतंकियों की हिट लिस्ट में होने के कारण नहीं, बल्कि लोगों से जबरन वसूली के कारण अपनी दुश्मनी के चलते ही त्राल जाने से कतराता था।

पूर्व पुलिस महानिदेशक से रही है करीबी

दावा किया जाता है कि वर्ष 2015 के अंत में तत्कालीन राज्य पुलिस महानिदेशक ने उसे शोपियां में डीएसपी के पद पर नियुक्त किया था। इसके बाद उसका तबादला पुलवामा में हो गया था। भ्रष्टाचार की शिकायतों के आधार पर तत्कालीन पुलिस महानिदेशक शेषपाल वैद्य ने उसे करीब डेढ़ साल पहले एंटीहाईजैक विंग श्रीनगर एयरपोर्ट पर तैनात किया था।

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