डा. विकास सिंह। इतिहास और आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि आर्थिक विकास किसी भी राष्ट्र की सामाजिक-आर्थिक उन्नति का अहम घटक होता है। गरीबी उन्मूलन, जीवन की गुणवत्ता, सामाजिक समरसता और सतत विकास में इसकी भूमिका रहती है। चुनावों के दौरान सत्तासीन दल बेतहाशा खर्च करते हैं। कल्याणकारी योजनाएं और मुफ्त वाले वादे मतदाता को खरीदने का जरिया बनते हैं। कई वादे ऐसे होते हैं, जो चुनावी जीत के बाद अर्थव्यवस्था को डुबाने का कारण बनते हैं। यह खतरनाक प्रवृत्ति है।

हमने लगातार देखा है कि नेता बहुत बड़े वादे करते हैं और उनमें से बहुत थोड़े वादे पूरे करते हैं। अव्यावहारिक वादों और मुफ्त उपहारों का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। राजनीतिक दल अपनी जीत के लिए मतदाताओं का भविष्य दांव पर लगा रहे हैं। चुनावी उपहारों से केवल कुछ लोगों को ही फायदा होता है और अर्थव्यवस्था का नुकसान होता है। प्राथमिकताएं गड़बड़ा जाती हैं। नेता अक्सर दूरगामी भविष्य के बारे में नहीं सोच रहे होते हैं। उनका जोर तात्कालिक फायदों पर रहता है, उनके दूरगामी प्रभाव पर नहीं। यह ज्ञात तथ्य है कि कृषि क्षेत्र में बांटे जाने वाले ज्यादातर उपहार बेहतर इन्फ्रा और गांवों तक सड़कें पहुंचाने की कीमत पर दिए जाते हैं। अच्छा इन्फ्रास्ट्रक्चर सिंचाई के साधनों तक पहुंच बढ़ा सकता है और किसानों को बेहतर बाजार दे सकता है। इससे किसान सशक्त होंगे। ऐसा ही तमाम लोकलुभावन वादों के साथ होता है। नेता अस्पतालों के निर्माण की घोषणा पर जोर देते हैं, क्योंकि इससे वोट मिलता है। लेकिन बेहतर स्वास्थ्य पर निवेश की उनकी कोई योजना नहीं होती है। स्वच्छ भारत, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा जैसे ¨बदुओं पर निवेश से अच्छे नतीजे मिल सकते हैं और इनसे इलाज का खर्च भी कम हो सकता है। अर्थव्यवस्था में स्वास्थ्य का बहुत बड़ा योगदान रहता है। इसी तरह, कौशल विकास, कारोबारी सुगमता और कई अन्य आर्थिक कदम विकास के वाहक हो सकते हैं। इनसे रोजगार सृजन होता है और सामाजिक समरसता बढ़ती है।

दिशाविहीन राजनीति: पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ के राजनीतिक दल दिशाविहीन हैं। वे ऐसे वादे करते हैं, जिनका न तो वास्तविक समस्याओं से कोई लेना-देना होता है और न ही अर्थव्यवस्था को कोई लाभ होता है। किसी राज्य में शादी में उपहार व साड़ियां दी जाती हैं, तो कहीं मतदाताओं को टीवी, सिलाई मशीन, ग्राइंडर, मोबाइल फोन और लैपटाप बांटे जाते हैं। वादा करने वाले जानते हैं कि वे आराम से जवाबदेही से बच जाएंगे और वे बच भी जाते हैं। मतदाताओं के पास कोई विकल्प नहीं होता कि इन योजनाओं की जवाबदेही के लिए उन्हें किसके पास जाना चाहिए। राजनीतिक दल स्कीम से होने वाले फायदों का श्रेय खुद लेते हैं और अलोकप्रिय स्कीम से पल्ला झाड़ लेते हैं। कई बार सामने वाले दल पर आरोप भी लगाते हैं कि उसने योजना का पूरा लाभ जनता को नहीं होने दिया। कुल मिलाकर जनता पूरी तरह भ्रमित हो जाती है।

संतुलित विकास से लोकतंत्र में सहभागिता बढ़ती है: कई बार यह दावा किया जाता है कि ऐसे वादे बाजार में खपत बढ़ाते हैं। मोटे तौर पर यह बात सही है। मुफ्त वाले वादों से बाजार में खपत तो बढ़ती है, लेकिन यह बहुत क्षणिक होता है। इससे अर्थव्यवस्था का चक्र चलाने में मदद नहीं मिल पाती है। वहीं, निवेश आधारित विकास संतुलित होता है और विकास चक्र को गति देता है। इससे नए अवसर बनते हैं, समृद्धि बढ़ती है और प्रगतिशील व्यवस्था तैयार होती है। संतुलित विकास से लैंगिक समानता का माहौल बनता है। स्वस्थ एवं समावेशी समाज बनाने में भी इसकी भूमिका रहती है। मतदाता उम्मीद करते हैं कि उनके चुने नेता ऐसी व्यवस्था तैयार करें, जिसमें गरीब तबके को समान अवसर मिले और लोग आत्मनिर्भर हों। इससे इतर, हमारे नेता एक विपरीत व्यवस्था तैयार करते हैं। चुनाव वाले राज्यों में ऐसा और भी ज्यादा होता है। इनके वादों से ऐसी व्यवस्था बनती है, जिसमें हर व्यक्ति भूखा ही रहेगा। लोकतंत्र में उनको चुनना चाहिए, जिनमें लोकलुभावन योजनाओं को छोड़कर सुधारवादी कदम बढ़ाने की ताकत हो। नेताओं को चुनाव से परे जाकर सोचना चाहिए।

मतदाताओं की भूमिका अहम: इस प्रक्रिया में मतदाताओं की भूमिका अहम है। लोकतंत्र में मतदाता ही मुख्य हैं। वही देश के संसाधनों के हकदार हैं। साइकिल या टीवी सेट के बदले उन्हें इनका सौदा नहीं करना चाहिए। वैसे भी मुफ्त की चीजों का अर्थ है बढ़ा हुआ टैक्स और कई ऐसी सुविधाओं की कुर्बानी, जिनसे अंतत: आम जनता को ही तकलीफ होनी है। उन्हें समाज के हित में निवेश पर जोर देना चाहिए। मतदाताओं को समझना चाहिए कि वित्तीय रूप से मजबूत राज्य ही उनके जीवन स्तर को बेहतर कर सकता है। सभी मतदाता पढ़े-लिखे बेशक न हों, लेकिन उनकी बुद्धिमत्ता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। बस जरूरत है कि उन्हें सही मार्गदर्शन मिले। चुनाव आयोग, मीडिया और अन्य संस्थानों को ऐसी व्यवस्था तैयार करनी चाहिए, जिसमें राजनेताओं द्वारा किए गए वादों और उसके लिए जरूरी संसाधनों का लेखाजोखा हो। मतदाता ऐसे लोगों को चुनें, जिनके एजेंडा में शिक्षा, इन्फ्रास्ट्रक्चर, रोजगार, समानता और स्वास्थ्य हों। उपहार के बदले वोट पाने की कोशिश को हतोत्साहित करने की जरूरत है। मान लीजिए कि चुनाव के दौरान कुछ मुफ्त की चीजें आपको मिल भी जाती हैं, लेकिन जरूरत आपको अच्छे स्कूल, अच्छी सड़क, पेयजल और स्वास्थ्य सुविधाओं की है जिसे धन की कमी के चलते सरकार मुहैया नहीं करा पा रही है तो क्या आप मुफ्त में मिले उपहार से खुद को दिलासा दे पाएंगे?

[मैनेजमेंट गुरु, वित्तीय एवं समग्र विकास विशेषज्ञ]

Edited By: Sanjay Pokhriyal