प्रणय कुमार। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने गत दिनों अखिल भारतीय इमाम संघ के प्रमुख इमाम उमर अहमद इलियासी से मस्जिद जाकर भेंट क्या की, उनके अनुरोध पर एक मदरसे का अवलोकन क्या किया, अफवाहों का बाजार गर्म हो गया। अपने-अपने सोच एवं सुविधा के अनुसार कुछ लोग उसकी मीमांसा करने लगे। उल्लेखनीय है कि संघ प्रमुख पिछले माह ही देश के मुस्लिम बुद्धिजीवियों के एक प्रतिनिधिमंडल से भी मिल चुके हैं, जिनमें पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी, पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, सांसद एवं पत्रकार शाहिद सिद्दीकी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति जमीरुद्दीन शाह और कारोबारी सईद शेरवानी प्रमुख थे।

संघ की रीति-नीति का हिस्सा

संघ को जानने वालों के लिए संघ प्रमुख की यह भेंट कौतूहल से अधिक समाज के विभिन्न वर्गों के साथ संवाद बनाए रखने की सतत एवं सामान्य प्रक्रिया मात्र है। संघ जाति, वर्ग, क्षेत्र, लिंग, पंथ, मजहब जैसे भेदभाव से ऊपर उठकर समाज के मध्य जुड़ने-जोड़ने के नियमित कार्यक्रम चलाता रहता है। समाज-जीवन का कोई क्षेत्र, कोई कोना उसके स्वयंसेवकों, कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों से अछूता नहीं रहता। संघ की सदैव से यह घोषणा रही है कि वह समाज में एक संगठन नहीं, अपितु संपूर्ण समाज का संगठन है। संपूर्ण समाज का संगठन मुस्लिम समाज को साथ लिए बिना संभव नहीं। अतः यदि संघ-प्रमुख मुस्लिम बुद्धिजीवियों, इमामों या मौलानाओं से मिलते हों तो इसे कौतूहल से अधिक संघ की स्वाभाविक रीति-नीति-संस्कृति का हिस्सा माना-समझा जाना चाहिए। घृणा एवं कटुता से भरे आज के सामाजिक परिवेश में ऐसे संवाद सांप्रदायिक सौहार्द एवं अंतर सामुदायिक संबंध स्थापित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होंगे।

संघ की सदैव से यह धारणा एवं संकल्पना रही है कि भारत की संस्कृति एक है, जिसे कोई सनातन संस्कृति कहता है, कोई हिंदू तो कोई भारतीय। कुछ लोग इसे मिली-जुली, गंगा-जमुनी या सामासिक संस्कृति कहकर भी संबोधित करते हैं। नाम अलग-अलग हो सकते हैं, पर जिन भावों एवं मूलभूत विशेषताओं के कारण ये नाम पड़े हैं, उनका स्रोत या उद्गम सनातन ही है। संघ को इन नामों पर कोई आपत्ति भी नहीं, लेकिन उसकी स्पष्ट मान्यता है कि भारत भले ही बहुधर्मी देश हो, परंतु बहुसांस्कृतिक नहीं। वैविध्य में सौंदर्य देखने वाली, सबमें एक और एक में सबको देखने वाली उसकी संस्कृति नितांत मौलिक एवं सर्वथा भिन्न है, जो अनंत काल से चली आ रही है, जिसकी धारा सर्वसमावेशी है। संघ का मानना है कि मजहब बदलने से संस्कृति नहीं बदलती। नाम बदलने से पुरखे नहीं बदलते, पूजा-पद्धति बदलने से पहचान नहीं बदलती। समस्या उन्हें अधिक है, जो पृथक पहचान की राजनीति करते हैं, जो पृथक पहचान को राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक पहचान से ऊपर रखते एवं मानते हैं।

मुस्लिम समाज का उदार तबका

मुस्लिम समाज के समक्ष संघ इंडोनेशिया का दृष्टांत रखता रहा है। वहां की विमान-सेवा का नाम भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ पर है। वहां के हवाई-अड्डे के बाहर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित है। वहां रामलीला का भव्य मंचन किया जाता है। यदि इंडोनेशिया के मुसलमान मजहब बदलने के बाद भी अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रख सकते हैं तो भारत के मुसलमान क्यों नहीं! संघ, उसके सरसंघचालक और स्वयंसेवक इस भाषा को बखूबी जानते और समझते हैं। तभी तो वे किसी आपदा या संकट में हिंदू-मुसलमान की भेद-बुद्धि से ऊपर उठकर पीड़ितों की सहायता में सन्नद्ध एवं संलग्न दिखते हैं। अच्छी बात है कि मुस्लिम समाज का उदार तबका भी उसे समझने की कोशिश कर रहा है।

[सामाजिक संस्था शिक्षा सोपान के संस्थापक]

Edited By: Sanjay Pokhriyal

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