नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव को लेकर जहां अटकलों का बाजार गर्म है, वहीं तीन राज्यों- छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में काबिज भाजपा की निगाहें मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस की अंदरूनी कलह पर भी टिकी हैं। खासतौर से उस राजस्थान में भाजपा बहुत कुछ कांग्रेस से आस लगाए बैठी है, जहां हर सर्वे रिपोर्ट भी पार्टी को निराश कर रही है।

 कुछ ही दिन पहले मध्य प्रदेश में सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस के दो बड़े नेता दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया का जिस तरह टकराव हुआ था, वह पंद्रह साल बाद सत्ता में वापसी की आस लगाए बैठी कांग्रेस के लिए झटका जैसा था। हालांकि अब कांग्रेस में दावा किया जा रहा है कि सब कुछ थाम लिया गया है और चुनाव में पूरा सामंजस्य दिखेगा।

छत्तीसगढ़ में लंबे अरसे से कांग्रेस के पूर्व नेता अजीत जोगी पार्टी को खून का घूंट पिलाते रहे हैं। ऐसे में राजस्थान ही ऐसा प्रदेश है जहां वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ जनता की नाराजगी के कारण कांग्रेस वापसी को लेकर थोड़ी आश्वस्त है। लेकिन यहां भी अंदरूनी खींचतान कांग्रेस को परेशान करेगी इसमें कोई शक नहीं है।

सूत्रों का मानना है कि राष्ट्रीय महासचिव अशोक गहलोत विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। जाहिर तौर पर मुख्यमंत्री दावेदारी की इच्छा संजोए बैठे कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट के लिए एक तरह की चुनौती होगी। गहलोत के चुनाव लड़ने का अर्थ होगा कि वहां उनके समर्थक भी बड़ी संख्या में उतरेंगे। दूसरी तरफ प्रदेश में ऊपर से लेकर नीचे तक संगठन में सचिन के समर्थकों का कब्जा है। यानी मैदान में कांग्रेस उम्मीदवार भाजपा से मुकाबला करेंगे, उससे पहले प्रत्यक्ष या परोक्ष आपसी मुकाबला हो सकता है।

बड़ी संख्या में उम्मीदवार बदलाव के साथ उतरने वाली भाजपा शायद इसका लाभ उठाने की कोशिश करेगी। वैसे भी कांग्रेस के अंदर असमंजस और अस्पष्टता के कारण ही पिछले कुछ महीनों में भाजपा अपनी स्थिति में थोड़ा सुधार करती दिख रही है, हालांकि अभी भी अंतर बरकरार है। सूत्रों के भाजपा के चुनावी सर्वे में अभी दूरी बरकरार है।

लोकसभा चुनाव से महज पांच छह महीने पहले होने वाले इन चुनावों पर भाजपा का बहुत कुछ दांव पर है। ऐसे में हर कोशिश है कि तीनों राज्यों में फिर से वापसी हो ताकि विपक्ष को मनोबल के स्तर पर भी तोड़ा जा सके। इस कोशिश में संघ भी खम ठोककर खड़ा है।

दरअसल, राजस्थान में अरसे से संघ पदाधिकारियों और वसुंधरा में थोड़ी टकराव की स्थिति रही है। लेकिन इस बार टकराव नहीं है। बजाय इसके संघ मुस्तैदी से टिका है।

 

Posted By: Arun Kumar Singh

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