संजय मिश्र, नई दिल्ली। पंजाब कांग्रेस की उठापटक का रास्ता निकालने के लिए गठित तीन सदस्यीय समिति ने सूबे के अगले चुनाव को देखते हुए पार्टी के सभी गुटों में संतुलन बनाने के रोडमैप की रिपोर्ट कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को सौंप दी है। अब सुलह का आखिरी फार्मूला निकालने की जिम्मेदारी कांग्रेस नेतृत्व पर है जो चौतरफा राजनीतिक चुनौतियों के बीच लंबे समय से दुविधा से ग्रस्त है।

समाधान निकालना परीक्षा से कम नहीं

ऐसे में मजबूत सियासी आधार वाले मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और फायर ब्रांड नवजोत सिंह सिद्धू के बीच जारी घमासान का समाधान निकालना कांग्रेस हाईकमान के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। पंजाब की उठापटक पर गठित तीन सदस्यीय समिति के प्रमुख राज्यसभा में नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने गुरुवार को अपनी सिफारिशें सोनिया गांधी को सौंपी।

कैप्टन के नेतृत्व को लेकर सवाल नहीं

पंजाब के प्रभारी महासचिव हरीश रावत और जयप्रकाश अग्रवाल इस समिति के दो अन्य सदस्य थे। बताया जाता है कि समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व को लेकर कोई सवाल खड़ा नहीं किया है और साफ कहा है कि उन्हें अधिकांश विधायकों का समर्थन हासिल है। साथ ही चुनाव को देखते हुए उनके नेतृत्व में ही पार्टी के मैदान में उतरने की ओर इशारा किया गया है।

सिद्धू को तवज्जो देने की सिफारिश

वहीं समिति ने फायर ब्रांड नेता नवजोत सिंह सिद्धू की कई शिकायतों को भी जायज मानते हुए इनके उचित हल की बात कही है। साथ ही सिद्धू के कद और राजनीतिक प्रभाव को देखते हुए उन्हें संगठन या सरकार में वाजिब तरीके से तवज्जो दिए जाने की सिफारिश की गई है।

कार्यशैली सुधारने की अपील

चर्चाओं के मुताबिक सिद्धू को डिप्टी सीएम बनाए जाने का विकल्प रखा गया है। इसी तरह प्रताप सिंह बाजवा और कुछ मंत्रियों की मुख्यमंत्री की कार्यशैली को लेकर की गई शिकायतों पर भी समिति ने अपनी राय देते हुए इन्हें दूर करने की जरूरत बताई है।

कार्यशैली पर असंतोष

सूत्रों का यह भी कहना है कि खड़गे समिति ने प्रदेश कांग्रेस के मौजूदा अध्यक्ष के तौर-तरीकों और पिछले कुछ समय के राजनीतिक कदमों को लेकर अपना असंतोष भी जाहिर किया है। हालांकि घमासान के हल के लिए सुझाए गए फार्मूले की तस्वीर अभी पूरी तरह सामने आना बाकी है।

फार्मूला निकालना बड़ी चुनौती

वैसे समिति की सिफारिशों के बावजूद कांग्रेस हाईकमान को ही रेफरी के तौर पर कैप्टन और सिद्धू के बीच संतुलन बनाने का अंतिम फार्मूला निकालने की मशक्कत करनी होगी जो मौजूदा परिस्थितियों में आसान नहीं है।

सिंधिया को चुननी पड़ी थी राह

खासकर यह देखते हुए कि राजस्थान में अहमद पटेल की अगुआई में गठित समिति की सिफारिशों के बावजूद हाईकमान अभी तक सचिन पायलट और उनके समर्थकों को समायोजित करने के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर दबाव नहीं बना पाया है। दीगर यह भी है कि मध्यप्रदेश में दो पार्टी दिग्गजों कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के सियासी प्रभाव से हाईकमान बाहर नहीं निकल सका और जिसकी वजह से ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस से बाहर जाना पड़ा।

सिद्धू को राहुल करते हैं पसंद

पंजाब प्रकरण में दिलचस्प यह भी है कि राजीव गांधी से मित्रता के चलते कैप्टन अमरिंदर सिंह के सोनिया गांधी से अच्छे रिश्ते दशकों पुराने हैं तो नवजोत सिंह सिद्धू को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा दोनों पसंद करते हैं। ऐसे में इन दोनों कट्टर प्रतिद्वंदियों के बीच संतुलन बनाते हुए समाधान निकालना नेतृत्व के लिए भी अग्निपरीक्षा सरीखा है।

 

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