नीलू रंजन, नई दिल्ली। सीबीआइ को हमीरपुर में हुए खनन घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के शामिल होने के पुख्ता सबूत मिले हैं। एजेंसी के पास मौजूद दस्तावेजों के अनुसार अखिलेश यादव ने अपनी ही सरकार की ई-टेंडर की नीति और इस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का उल्लंघन करते हुए खनन पट्टे बांटे। खनन मंत्री के रूप में उन्होंने खुद 14 पट्टों का आवंटन स्वीकृत किया, इनमें 13 पट्टे तो एक ही दिन में दे दिये गए। वहीं उसके बाद खनन मंत्री बने गायत्री प्रजापति ने आठ पट्टों के आवंटन को मंजूरी दी थी।

ई-टेंडर से नीलामी का नियम बनाया
सीबीआइ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि खुद मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश यादव ने 31 मई 2012 को खनन पट्टों की नीलामी ई-टेंडर से कराने का नियम बनाया था। इसके बाद 29 जनवरी 2013 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी इस पर मुहर लगा दी थी। यही नहीं हाईकोर्ट ने यह भी साफ कर दिया था कि 31 मई 2012 के पहले जिन लोगों ने पट्टों के आवेदन किए थे या जिनके आवेदन लंबित थे, उन सभी को निरस्त माना जाए। यानी सभी को ई-टेंडर प्रणाली के माध्यम से नया आवेदन करना होगा।

खनन मंत्री के रूप में एक ही दिन में 13 पट्टों को दी थी मंजूरी
हाईकोर्ट के फैसले के 18 दिन बाद ही खनन मंत्री के रूप में अखिलेश यादव ने अपने नियम और हाईकोर्ट के फैसले की धज्जियां उड़ा दी। हमीरपुर की जिलाधिकारी के रूप में बी चंद्रलेखा ने खनन के 13 पट्टों के आवंटन का प्रस्ताव भेजा और अखिलेश यादव ने 17 फरवरी 2013 को इन सभी को मंजूरी दे दी। इसके बाद 14 जून 2013 को उन्होंने इसी तरह से एक खनन पट्टे की मंजूरी दी। गायत्री प्रजापति ने खनन मंत्री बनने के बाद कुल आठ पट्टों को मंजूरी दी, जिनमें एक पट्टा सपा सांसद घनश्याम अनुरागी को दे दिया।

सीबीआइ के अनुसार उत्तरप्रदेश सरकार के नियम के मुताबिक पांच लाख रुपये तक का खनन पट्टा देने का अधिकार जिलाधिकारी को होता है। लेकिन पांच लाख रुपये से अधिक के पट्टे के लिए खनन मंत्री की मंजूरी जरूरी होती है।

सीबीआइ से नोटिस नहीं मिला
खनन घोटाले की सीबीआइ जांच को लेकर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोमवार को भी भाजपा पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि अभी तक उन्हें सीबीआइ से न कोई नोटिस मिला है और न ही समन, लेकिन भाजपा अपनी मर्यादाएं भूल खुद सीबीआइ की जगह बैठ गई है। भाजपा सरकार के मंत्री किस संवैधानिक अधिकार से आरोप लगाने का दुस्साहस कर रहे हैं? यह सवाल देश की जनता भी पूछ रही है।

लखनऊ में पार्टी मुख्यालय स्थित डॉ. लोहिया सभागार में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि भाजपा सीबीआइ को कठपुतली बनाकर झूठे और अनर्गल आरोपों से बदनाम करने की साजिश कर रही है। उसका करारा जवाब दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि भाजपा की मंशा संपूर्ण व्यवस्था पर कब्जा करने की है। अखिलेश ने कहा कि भाजपा के झूठ से हर वर्ग में असंतोष है। पिछले उपचुनाव और हाल में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली शिकस्त से जनता का आक्रोश सिद्ध हुआ। प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन से भाजपा नेतृत्व की बौखलाहट चरम पर है। झूठ, फरेब और साजिश भाजपा के चरित्र में है। इसकेबल पर दिल्ली की कुर्सी हासिल की, लेकिन अब जनता उनसे सावधान हो गई है।

भाजपा नेता बने सीबीआइ प्रवक्ता
इस मामले में उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कहा कि अगर यह कार्रवाई राजनीतिक साजिश नहीं है तो यह पहले होनी चाहिए थी। इस मामले में भाजपा नेता जिस तरह बयानबाजी कर रहे हैं, उससे लगता है वे सीबीआइ प्रवक्ता बन गए हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की तरह भाजपा भी अपने विरोधियों को फर्जी तरीके से फंसाने में माहिर रही है। बसपा इसको झेल चुकी है। जब लोकसभा चुनाव में बसपा ने 80 में से 60 सीटें भाजपा को देने से इंकार किया तो उन्हें ताज मामले में फर्जी फंसा दिया था। इस पर बसपा आंदोलन का हित देखते हुए उन्हें 26 अगस्त 2003 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सीबीआइ को सौंपी जांच की जिम्मेदारी
जाहिर है इन सभी पट्टों के आवंटन पर खनन मंत्री के रूप में अखिलेश यादव ने मंजूरी दी थी। अपने आदेश का उल्लंघन कर खनन पट्टों के आवंटन को देखकर खुद इलाहाबाद हाईकोर्ट हैरान था। यही कारण है कि हाईकोर्ट ने सीबीआइ को पूरे जांच की जिम्मेदारी सौंपी थी।

राजनीतिक दवाब में सीबीआइ की कार्रवाई के बारे में पूछे जाने पर वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि अखिलेश यादव राजनीतिक रूप से कोई भी आरोप लगाने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन एजेंसी के सामने उन्हें यह बताना ही होगा कि अपने ही बनाए नियम और हाईकोर्ट के फैसले का उल्लंघन करते हुए उन्होंने खनन पट्टों के आवंटन पर मुहर कैसे लगाई।

अखिलेश यादव को पूछताछ के लिए बुलाए जाने के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि फिलहाल जांच चल रही है और समय आने पर केस से संबंधित सभी लोगों से पूछताछ की जाएगी।

सीबीआइ की सूची में 15 से अधिक पूर्व अधिकारी
हमीरपुर समेत अन्य जगहों पर सीबीआइ की एक साथ कार्रवाई के बाद फतेहपुर में भी अवैध खनन की जांच के दायरे में शामिल कई चेहरों की धड़कनें बढ़ गई हैं। जनवरी 2017 में सीबीआइ टीम ने दस दिन जिले में ठहरकर दस्तावेज खंगाले थे। उस दौरान 15 से अधिक अधिकारियों के नाम सीबीआइ की सूची में शामिल हुए थे। सपा शासनकाल में जिले पर मौरंग के अवैध खनन पर बड़ा दाग लगा था। वर्ष 2015-16 के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अवैध पुल बनाकर यमुना की जलधारा रोकने के मामले में तत्कालीन प्रयागराज के कमिश्नर बीके सिंह व जिलाधिकारी राकेश कुमार सहित खनन अधिकारी को निलंबित कर दिया था। हाईकोर्ट के निर्देश पर सीबीआइ ने मौरंग खनन की जांच में बुंदेलखंड के साथ फतेहपुर को भी शामिल किया।

Posted By: Bhupendra Singh

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