जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। पड़ोसी देश म्यांमार में लोकतांत्रिक सरकार का तख्ता पलट के बाद जो स्थिति बनी है उसने भारत को बड़े कूटनीतिक पशोपेश में डाल दिया है। भारत तख्ता पलट के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों पर म्यांमार की सेना की हिंसक कार्रवाइयों का विरोध तो कर रहा है लेकिन अमेरिका और ब्रिटेन जैसे लोकतांत्रिक देशों की तरह प्रतिबंध लगाने से परहेज कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में म्यांमार की स्थिति पर बुधवार को चर्चा में भारत ने म्यांमार सेना की कार्रवाइयों की निंदा की है और तेजी से लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल करने की मांग की है।

बिम्सटेक में मुद्दे को उठाने से किया परहेज

हालांकि गुरुवार को ही बिम्सटेक देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने म्यांमार के मुद्दे को उठाने से परहेज किया। इस बैठक में म्यांमार के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। यूएनएससी की बैठक में भारत के स्थाई प्रतिनिधि टी एस त्रिमूर्ति ने म्यांमार में जारी हिंसा की कड़े शब्दों में निंदा की और वहां हो रही मौतों पर शोक जताया।

भारत का रवैया नरम

साथ ही उन्होंने कैद किए गए राजनीतिक बंदियों को जल्द से जल्द छोड़ने और आम जनता की उम्मीदों को पूरा करने के लिए कदम उठाने की बात कही है। हालांकि भारत का यह रवैया यूएनएससी बैठक में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे देशों के रूख से काफी नरम है। इन देशों की तरफ से म्यांमार सेना की तरफ से संचालित निगमों के खिलाफ और सख्त कार्रवाई करने की धमकी दी गई है।

ब्रिटेन ने लगाए प्रतिबंध

बैठक के बाद ब्रिटेन ने तो म्यांमार इकोनॉमिक कार्पोरेशन (एमईसी) के खिलाफ प्रतिबंध लगा भी दिए। एमईसी और म्यांमार इकोनॉमिक होल्डिंग्स लिमिटेड जैसी कंपनियों की बागडोर सेना के हाथ में है और ये देश विदेश में खनन से संबंधित कारोबार से जुड़ी हुई हैं। एक फरवरी, 2021 को तख्ता पलटने के बाद म्यांमार की सेना ने सभी सरकारी कंपनियों का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया है।

विशेष प्रतिनिधि ने गृह युद्ध की आशंका जताई

म्यांमार मामलों के यूएन की तरफ से नियुक्त विशेष प्रतिनिधि ने अपनी रिपोर्ट में म्यांमार की स्थिति बेहद चिंताजनक बताते हुए यूएन से ज्यादा निर्णायक कार्रवाई करने की बात कही है। उन्होंने यहां तक कहा है कि अगर बाहरी हस्तक्षेप नहीं किया गया तो म्यांमार में बड़ा गृह युद्ध होगा और यह एक असफल देशों में शामिल हो सकता है जिसका स्थानीय व वैश्विक दुष्प्रभाव होगा। अमेरिका का रवैया भी धीरे धीरे काफी सख्त होता दिख रहा है।

ब्रिटेन ने भी दिए कड़े संकेत

ब्रिटेन के विदेश मंत्री डोमिनिक राब ने भी संकेत दिया है कि वह म्यांमार के खिलाफ दूसरे कड़े विकल्पों पर विचार कर रहा है। इसके विपरीत गुरुवार को बिम्सटेक संगठन (भारत, बांग्लादेश, भूटान, थाईलैंड, नेपाल, श्रीलंका और म्यांमार) के विदेश मंत्रियों की बैठक में विदेश मंत्री एस जयशंकर के भाषण में म्यांमार की मौजूदा स्थिति का कोई जिक्र नहीं था। इसमें म्यांमार की सेना की तरफ से नियुक्त विदेश मंत्री ने हिस्सा लिया था।

कड़ी मशक्कत के बाद सुधरे थे संबंध

माना जा रहा है कि अपने बड़े रणनीतिक हितों को देखते हुए भारत ने म्यांमार को लेकर फूंक-फूंक कर कदम आगे बढ़ा रहा है। काफी मशक्कत के बाद भारत ने हाल के वर्षों में म्यांमार के साथ अपने रिश्तों को काफी सुधार लिया था। भारत को म्यांमार की जरूरत सिर्फ चीन के बढ़ते प्रभुत्व की वजह से ही नहीं है बल्कि पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय आतंकी संगठनों को काबू में करने के लिहाज से भी म्यांमार का सहयोग की दरकार होती है। इनमें से कई संगठनों के बारे में माना जाता है कि वो म्यांमार स्थित जंगल में छिपे हुए हैं। यही वजह है कि भारत वहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया का समर्थन कर रहा है लेकिन सैनिक शासन का अभी मुखर विरोध नहीं कर रहा। 

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