नई दिल्‍ली [स्‍पेशल डेस्‍क]। दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश होने के बावजूद भी अमेरिका के लिए तीन देश हमेशा सिरदर्द बने रहे हैं और आगे भी बने रहेंगे। ये तीन देश हैं ईरान, पाकिस्‍तान और उत्तर कोरिया। इन तीनों पर यदि गौर किया जाए तो ये सभी को पता है कि काफी समय से उत्तर कोरिया से अमेरिका का छत्‍तीस का आंकड़ा रहा है। वहीं यदि ईरान की बात करें तो वहां हो रहा विरोध प्रदर्शन और ईरान के साथ अमेरिका समेत अन्‍य देशों की संधि भी अमेरिका को मुश्किलों में डाल सकती है। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि इस परमाणु संधि से अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप पीछे हटने की बात पहले ही कर चुके हैं। इसके अलावा बचा पाकिस्‍तान, जिसको लेकर ट्रंप अपना कड़ा रुख दिखा चुके हैं और करोड़ों डॉलर की मदद को रोक चुके हैं। यहां पर एक बात और बता देनी जरूरी होगी कि इन तीन देशों ने सिर्फ अमेरिका की ही नींद नहीं उड़ा रखी है बल्कि लगभग पूरे यूरोप और यूं कहें कि पूरे विश्‍व की ही नींद उड़ा रखी है। आईए अब इसको विस्‍तार से समझते हैं।

ईरान का मौजूदा तनाव

ईरान में महंगाई को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शन में भी अब अमेरिका का नाम सामने आने लगा है। इसको लेकर अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप लगातार ट्वीट कर रहे हैं। अपने एक ट्वीट में उन्‍होंने यहां तक लिखा है कि अब बदलाव का समय आ गया है और अमेरिका इन लोगों को निराश नहीं करेगा। अमरीकी गृह मंत्रालय ने भी इसको लेकर सभी देशों से आग्रह किया है कि वे ईरानी प्रदर्शनकारियों का समर्थन करें। मंत्रालय की तरफ से कहा गया है कि ईरानी नागरिकों की मांग बुनियादी अधिकारों के लिए और भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए है। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता सारा हकबी ने ट्वीट कर कहा है कि ईरानी सरकार को चाहिए कि वो लोगों के अधिकारों की रक्षा करे। इन्हें अपनी बात कहने का अधिकार है और इसे कुचला नहीं जा सकता है। दुनिया सब कुछ देख रही है।

बयानबाजी की इस सीरीज में ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने एक कदम आगे बढ़ते हुए डोनाल्ड ट्रंप को ईरान का दुश्मन बताया है। उनका कहना है कि अमरीका में ये जो सज्जन हैं, जो आजकल हमारे देश के साथ सहानुभूति जता रहे हैं, ऐसा लगता है कि वो ये बात भूल गए हैं कि कई महीने पहले उन्होंने ही ईरान को चरमपंथी देश कहा था. लेकिन सच तो ये है कि ये आदमी सिर से लेकर पैर तक ईरान का दुश्मन है। ईरान के मुद्दे पर जानकार मानते हैं कि अमेरिका खौफ का कारोबार कर रहा है। ईरान की राजनीति पर नजर रखने वाले सीरिया के वरिष्‍ठ पत्रकार वईल अवाद का कहना है कि अमेरिका सिर्फ दबाव बना रहा है। इसके पीछे उसकी मंशा अपने हथियारों की बिक्री तक जुड़ी है। वह ईरान का खौफ दिखाकर इसके पड़ोसी देशों में अपने हथियारों के बाजार को बड़ा करना चाहता है।

न्‍यूक्लियर डील पर पेंच

ईरान को लेकर अमेरिका के बीच जिस न्‍यूक्लियर डील का पेंच फंसा हुआ है वह ओबामा प्रशासन के दौरान वर्ष 2015 में की गई थी। इस डील में अमेरिका और फ्रांस के अलावा रूस, चीन, ब्रिटेन और जर्मनी भी शामिल हैं। डोनाल्‍ड ट्रंप जहां इस डील के विरोध में हैं वहीं फ्रांस ने भी इस डील पर दोबारा विचार करने की जरूरत बताकर आग में घी डालने का काम किया है। वहीं रूस की बात करें तो वह अमेरिका के रुख से काफी खफा है। रूसी राष्‍ट्रपति ने पूर्व में यहां तक कहा था कि संधियों को तोड़ना अमेरिका का पुराना इतिहास रहा है। उन्‍होंने इसको लेकर यहां तक चेताया था कि यदि डोनाल्‍ड ट्रंप संधि से पीछे हटते हैं तो इस इलाके में परमाणु युद्ध का खतरा बढ़ जाएगा। उनकी इस आशंका को ईरान के रिवोल्‍यूशनरी गार्ड के उस बयान से भी जोड़कर देखा जा सकता है जिसमें कहा गया था कि अमेरिका के संधि से पीछे हटने की सूरत में ईरान भी लंबी दूरी की मिसाइल के निर्माण में लगेगा।

पाकिस्‍तान को लेकर सिरदर्द

ट्रंप प्रशासन के बाद से अमेरिका और पाकिस्‍तान के रिश्‍तों में लगातार खटास आ रही है। अब हालात इस कदर खराब हो चुके हैं कि दोनों ही देश एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी तक पर उतर आए हैं। इसी सीरीज में ट्रंप ने पाकिस्‍तान को दी जाने वाली करोड़ों डॉलर की राशि को रोक दिया है। यह राशि पाकिस्‍तान को आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए काफी समय से दी जाती रही है। ट्रंप ने यहां तक कहा है कि आतं‍कवाद से लड़ने के नाम पर अमेरिका को धोखा देता रहा है। वहीं पाकिस्‍तान की तरफ से बयान दिया गया कि वह अमेरिका की राशि के नाम पर अपना खर्चा नहीं चलाता है। बहरहाल इन दोनों के बिगड़ते रिश्‍तों के बीच चीन ने एक बार फिर से पाकिस्‍तान का हाथ थामा है और कहा है कि दुनिया को पाकिस्‍तान द्वारा आतंकवाद के खिलाफ उठाए कदमों का सम्‍मान करना चाहिए।

बहरहाल, इन दोनों के बीच हालात चाहे जैसे भी हों लेकिन यह बात साफ है कि पाकिस्‍तान न सिर्फ अमेरिका के लिए बल्कि कई पूरी दुनिया के लिए सिरदर्द बना हुआ है। भारत के लिए पाकिस्‍तान सीधेतौर पर चुनौती है। चीन पाकिस्‍तान के रिश्‍तों पर बात करते हुए पूर्व मेजर जनरल पीके सहगल का मानना है कि पाकिस्‍तान को लगने लगा है कि चीन उसका ज्‍यादा बड़ा साझेदार और समर्थक बन सकता है लिहाजा अब वह अमेरिका की परवाह कम करता है और उसका झुकाव चीन की तरफ ज्‍यादा है। उनका यह भी कहना है कि अमेरिका अब पहले जैसा नहीं है उसमें काफी बदलाव आ चुका है जिसे पाकिस्‍तान भी समझता है। वहीं दूसरी तरफ पाकिस्‍तान के लिए अमेरिका से बड़ी जरूरत चीन की है। इसकी वजह न सिर्फ कूटनीतिक है बल्कि रणनीतिक भी है।

उत्तर कोरिया की चुनौती

वर्षों से उत्‍तर कोरिया और चीन के बीच तनातनी को सभी ने देखा है। हाल ही में दोनों देशों के राष्‍ट्राध्‍यक्षों ने परमाणु बम को लेकर तीखी बयानबाजी भी की है। इतना ही नहीं संयुक्‍त राष्‍ट्र द्वारा उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध लगाने के बाद भी अमेरिकी जंगी जहाजों ने उत्तर कोरिया की लगभग नाकेबंदी कर रखी है। अमेरिका की परमाणु पनडुब्‍बी से लेकर तीन जंगी जहाज कोरियाई प्रायद्वीप में काफी समय से डेरा डाले हुए हैं। इसके अलावा दक्षिण कोरिया में थाड मिसाइल सिस्‍टम को भी तैनात किया जा चुका है। पिछले वर्ष तक इस पूरे प्रायद्वीप में माहौल काफी तनावपूर्ण रहा है। इसी बीच में उत्तर कोरिया ने अपने आपको परमाणु शक्ति संपन्‍न राष्‍ट्र भी घोषित कर दिया है। हालांकि नववर्ष की शुरुआत में एक बात जरूर अच्‍छी हुई है और वो ये कि उत्तर और दक्षिण कोरिया में वार्ता का दौर शुरू हुआ है। दोनों देशों के बीच शुरू हुई इस वार्ता को ऑब्‍जरवर रिसर्च फाउंडेशन के प्रोफेसर हर्ष वी पंत का कहना है कि वार्ता शुरू होने के बाद इस बात की उम्‍मीद जरूर की जा सकती है कि कुछ समय के लिए माहौल में शांति जरूर आएगी। हालांकि उन्‍होने यह भी कहा है कि इन दोनों ही देशों की राह इतनी आसान नहीं है। इसकी वजह ये है कि उत्तर कोरिया मुमकिन है कि दक्षिण कोरिया के रास्‍ते अपने को परमाणु संपन्‍न देश स्‍थापित करने की कोशिश करे। लेकिन यदि ऐसा हुआ तो जापान और अमेरिका समेत कई दूसरे देश उसके खिलाफ हो जाएंगे।

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By Kamal Verma