डा. अश्विनी महाजन। China API Industry भारत को दुनिया की फार्मेसी कहा जाता है। दुनिया के अधिकांश देशों में भारतीय दवा निर्यात की जाती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षो से भारत के दवा उद्योग पर चीन का ऐसा साया पड़ा है कि उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। कारण यह है कि दवा उद्योग की सप्लाई चेन पर चीन लगभग काबिज हो गया है। वर्ष 2000 से पूर्व भारत दवा उद्योग की सप्लाई चेन का अग्रणी देश था और देश में बने एपीआइ यानी एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट्स की दुनियाभर में मांग थी। वर्ष 2000 के बाद भारत दुनिया के लिए तैयार दवाओं का स्रोत तो बना रहा, लेकिन एपीआइ और मध्यवर्ती सामग्रियों का निर्माण भारत से खिसकते हुए चीन के हाथों में पहुंच गया और भारत समेत पूरा विश्व चीनी एपीआइ पर निर्भर हो गया। यह चीन की सोची समझी चाल थी।

चीन ने सामान्य कीमत से आधे से भी कम पर एपीआइ की भारत समेत दुनिया के बाजारों में डंपिंग प्रारंभ कर दी। चीनी सरकार की इस मामले में सक्रिय भागीदारी रही। कम ब्याज पर ऋण, लंबे समय के लिए ऋण अदायगी से मुक्ति, मार्केटिंग में प्रोत्साहन, सस्ती बिजली और सामुदायिक सुविधाएं, जानबूझकर लचर पर्यावरण नियामक कानून आदि ऐसे कई प्रविधान किए गए जिनमें से कई अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों के विरुद्ध भी थे। इन हथकंडों से चीन ने भारतीय एपीआइ उद्योग को नष्ट कर दिया।

एंटीबायोटिक दवाओं के लिए मूल रसायन ‘6एपीए’ के उदाहरण से यह बात स्पष्ट की जा सकती है। ध्यातव्य है कि 2005 में भारत चार निर्माताओं के साथ एपीआइ के क्षेत्र में पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर था। आज स्थिति यह है कि भारत इस एपीआइ के लिए 100 प्रतिशत चीन पर निर्भर हो गया है। यही नहीं, पूरा विश्व इस एंटीबायोटिक हेतु 100 प्रतिशत चीन पर निर्भर है। वर्ष 2001 तक चीन की बाजार आक्रामकता से पहले यह एपीआइ औसतन 22 अमेरिकी डालर प्रति किग्रा के हिसाब से बिकता था। चीन के द्वारा भारत और शेष दुनिया की उत्पादन क्षमता को नष्ट करने के लिए 2001 से 2007 के बीच एपीआइ की कीमतों को नौ डालर प्रति किलोग्राम कर दिया गया। नतीजन भारत की सभी चार कंपनियों ने इसका उत्पादन बंद कर दिया, क्योंकि इतने अधिक घाटे पर वे इस एपीआइ का उत्पादन नहीं कर सकती थीं। जैसे ही भारतीय कंपनियां इसके उत्पादन से बाहर हो गईं, चीन ने इस एपीआइ की कीमत को बढ़ाना शुरू किया और अब यह 34 डालर प्रति किलोग्राम पहुंच चुकी है।

वास्तव में चीन की रणनीति यह थी कि जहां-जहां भारत या वैश्विक स्तर पर कोई कंपनी उनके साथ प्रतिस्पर्धा में थी, तो कीमतों को इतना नीचे गिराया जाए कि वह कंपनी बाजार से बाहर हो जाए। इस प्रकार चीन का एकाधिकार स्थापित हो जाए तो कीमतों को बढ़ा दिया जाए। आज चीन लगभग सभी प्रकार के एपीआइ में एकाधिकार स्थापित कर चुका है। यदि हम जनवरी 2020 से जुलाई 2021 के आंकड़े लें तो पता चलता है कि सभी प्रकार के एंटीबायोटिक के मुख्य एपीआइ की कीमत 66 प्रतिशत बढ़ी, जबकि एंटी मलेरिया दवा हेतु मुख्य एपीआइ ‘डीबीए’ की कीमत 47 प्रतिशत बढ़ी, एजिथ्रोमाइसिन हेतु एपीआइ की कीमत 44 प्रतिशत बढ़ी, पैनिसीलिन जी की कीमत 97 प्रतिशत और इसी प्रकार से बाकी सभी एपीआइ की कीमत भी बढ़ी। अभी भी जो एपीआइ भारत में बन रहे हैं या उनका उत्पादन बढ़ाने के प्रयास हो रहे हैं, उनकी कीमतें घटाकर उन्हें प्रतिस्पर्धा से बाहर करने का खेल चल रहा है।

कहा जा सकता है कि चीन भारत की जनस्वास्थ्य सुरक्षा को ध्वस्त करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहा है। भारत का दवाओं के क्षेत्र में इन महत्वपूर्ण आगतों के संदर्भ में चीन पर पूरी तरह से निर्भर होने के कारण ऐसा संभव है कि चीन यदि अचानक इन एपीआइ की आपूíत बंद कर दे तो हमारी जन स्वास्थ्य सुरक्षा पूरी तरह से ध्वस्त हो सकती है। देश में हर साल डेढ़ करोड़ लोग मलेरिया से पीड़ित होते हैं। करीब 5.45 करोड़ हृदय रोगों से ग्रस्त हैं, तीन करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं और करोड़ों लोगों को एंटीबायोटिक की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे में इन मरीजों का क्या होगा। चीन द्वारा ऐसा कदम उठाए जाने की आशंका कपोल कल्पना नहीं, बल्कि हकीकत है। चीन पहले ही अमेरिका को दवा आपूर्ति रोकने की धमकी दे चुका है और अमेरिका में इस हेतु चिंता व्यक्त की जा रही है। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने चेतावनी दी थी कि भारत की चीन पर एपीआइ हेतु निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा का खतरा हो सकती है।

हाल ही में सरकार ने देश में एपीआइ उत्पादन बढ़ाने हेतु उत्पादन से जुड़े हुए प्रोत्साहनों की घोषणा की है, जिसके अंतर्गत 12 हजार करोड़ रुपये की राशि रखी गई है। लेकिन केवल यही पर्याप्त नहीं होगा। चीन को ‘कीमत युद्ध’ में पराजित करने के लिए सरकार को सभी एपीआइ में ‘सेफगार्ड’ और ‘एंटी डंपिंग’ शुल्क लगाने होंगे। शोध एवं विकास इकाइयों की स्थापना और उत्पादकों को उनकी सुविधा, पर्यावरण कानूनों में उचित प्रविधानों द्वारा एपीआइ इकाइयों के लिए जल्दी मंजूरी, टेस्टिंग उपकरणों हेतु आयात शुल्क में छूट, पर्यावरण कानूनों में इन इकाइयों को विशेष छूट और सस्ती दरों पर भूमि का आवंटन आदि कुछ प्रयास हैं, जिनको अपनाकर हम देश पर आसन्न इस संकट से पार पा सकते हैं।

[प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय]

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