जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। विदेश मंत्री एस. जयशंकर की दो दिवसीय जार्जिया यात्रा सिर्फ इसलिए ऐतिहासिक नहीं मानी जाएगी कि वह इस देश की यात्रा करने वाले पहले भारतीय विदेश मंत्री हैं। बल्कि इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने इस यात्रा के दौरान जार्जिया की पवित्र देवी संत क्वीन केतेवान की अस्थियों को वहां की सरकार और जनता को सौंपा। क्वीन केतेवान 17वीं सदी में जार्जिया की रानी थीं। कहते हैं कि ईरान में उनकी हत्या इसलिए हत्या कर दी गई थी क्योंकि उन्होंने इस्लाम स्वीकार नहीं किया था।

जार्जिया सरकार लगा रही थी गुहार

उनकी अस्थियों को वर्ष 2005 में गोवा के एक चर्च के खंडहर में खोज निकाला गया था। जार्जिया सरकार लगातार उन्हें सौंपने का आग्रह कर रही थी। अब भारत ने उनकी अस्थियों का एक हिस्सा लौटा दिया है, जबकि एक हिस्सा अपने पास रखने का फैसला किया है। भारत अभी तक पारंपरिक मित्र रूस की वजह से जार्जिया के साथ अपने रिश्तों को खास तवज्जो नहीं दे रहा था, लेकिन भारत का यह फैसला दोनों देशों के रिश्तों के बीच तमाम खाइयों को भरने के संकेत दे रहा है।

जार्जिया में केतेवान को देवी का दर्जा

बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के देश जार्जिया में संत केतेवान की अहमियत देवी की तरह है। यही वजह है कि जब विदेश मंत्री जयशंकर ने उनके अवशेष जार्जिया के सबसे बड़े चर्च के प्रमुख पादरी को सौंपे तो वहां के प्रधानमंत्री इराक्ली गैरीबाश्विली भी मौजूद थे। अब पूरे देश में कार्यक्रमों का आयोजन होगा। वहां के स्थानीय मीडिया में लोगों के साक्षात्कार दिखाए जा रहे हैं जिनमें वे कह रहे हैं कि अब जार्जिया के दुखों के दिन बीत जाएंगे।

रूस के चलते नहीं बढ़े संबंध 

सनद रहे कि जार्जिया का रिश्ता अपने पड़ोसी व भारत के मित्र देश रूस के साथ वर्ष 1991 में सोवियत संघ के विभाजन के बाद से ही बेहद तनावग्रस्त है। दोनों देशों में वर्ष 2008 में भयंकर युद्ध हुआ था जिसमें जार्जिया को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। रूस के साथ रिश्तों की संवेदनशीलता को देखते हुए भारत ने जार्जिया को खास तवज्जो नहीं दी थी। संभवत: यही वजह है कि अभी तक भारत से जार्जिया की कोई शीर्षस्तरीय यात्रा नहीं हुई थी।

केतेवान के अनुयायी लाए थे अवशेष

विदेश मंत्रालय की तरफ से दी गई जानकारी के मुताबिक, वर्ष 1637 में क्वीन केतेवन के अवशेषों को गोवा लाया गया था। यहां किसी चर्च में उनके अवशेष रखे गए थे जो कालांतर में खंडहर में तब्दील हो गया। बताते हैं कि क्वीन केतेवान के कुछ अनुयायी उनके अवशेष छिपाकर समुद्री रास्ते से भारत लेकर आए थे। बाद में पुर्तगाली कागजातों के आधार पर वर्ष 2005 में उस चर्च की खोज की गई जहां क्वीन केतेवान के अवशेष मिले।

अवशेषों की हुई थी डीएनए जांच

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) के आदेश पर सीएसआइआर ने उन अवशेषों की डीएनए जांच की और इसकी सत्यता को प्रमाणित किया। इसका पता चलते ही जार्जिया सरकार ने लगातार भारत से आग्रह करना शुरू किया कि उनके देश की भावना, धार्मिक संवेदना और ऐतिहासिक तथ्यों को देखते हुए अवशेष लौटाए जाएं। 2017 में भारत ने छह महीनों के लिए क्वीन केतेवान के अवशेषों को जार्जिया को सौंपा था जिनका प्रदर्शन वहां देशभर में किया गया था। जार्जिया में इसे देखने वालों की भावना के मद्देनजर भारत ने उन्हें छह महीने और वहां रखने की इजाजत दे दी थी।

कूटनीतिक रिश्तों की नई शुरुआत

अब भारत ने जार्जिया के साथ कूटनीतिक रिश्तों की नई शुरुआत की है तो इसका आगाज क्वीन केतेवान के पवित्र अवशेषों के एक हिस्से को लौटाकर किया है। विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि इन पवित्र अवशेषों को सौंपने का दिन सिर्फ जार्जिया के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के लिए भी खास है। उन्होने उम्मीद जताई कि भारत और जार्जिया के लोग इन पवित्र अवशेषों की भावना के मुताबिक अध्यात्म और दोस्ती के रिश्ते को मजबूत करेंगे।