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BJP का परिसीमन चक्रव्यूह: क्या कांग्रेस होगी अलग-थलग, विपक्ष की एकता में लगेगी सेंध?

By Shubham TiwariEdited By: Shubham Tiwari
Published: Tue, 20 Oct 2026 07:55 PM (IST)

भाजपा की परिसीमन रणनीति ने विपक्षी खेमे में हलचल मचा दी है, जिससे महिला आरक्षण विधेयक और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने पर कांग्रेस की चिंताएं बढ़ गई हैं।

भाजपा का परिसीमन दांव, क्या टूटेगी विपक्षी एकता? (फाइल फोटो)

भाजपा का परिसीमन दांव, क्या टूटेगी विपक्षी एकता? (फाइल फोटो)

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। परिसीमन के मुद्दे पर भाजपा की नई राजनीतिक चाल ने विपक्षी खेमे में हलचल बढ़ा दी है। कांग्रेस को आशंका है कि सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए विपक्षी खेमे में सेंध लगाने और रणनीति बनाने में जुटी है।

दरअसल, केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस बात की अटकलों को फिर से हवा दी है कि परिसीमन विधेयक पर चर्चा के लिए संसद का संक्षिप्त सत्र बुलाया जा सकता है। ऐसे में अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या बीजेपी का यह कदम कांग्रेस को अलग-थलग कर देगा और SIR के खिलाफ बने संयुक्त विपक्षी मोर्चे को कमजोर करेगा। चलिए जानते हैं विस्तार से...

लोकसभा में अटक गया था विधेयक

सरकार ने इस साल अप्रैल में लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने की कोशिश की थी, लेकिन असफल रही। अप्रैल में महिला आरक्षण और लोकसभा सीटें 850 करने वाला संविधान संशोधन विधेयक दो-तिहाई बहुमत न मिलने से अटक गया था।

क्या है विधेयक का उद्देश्य?

सरकार द्वारा प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य 2029 से विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करना और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करना है। विधेयक के पक्ष में 298 वोट और विपक्ष में 230 वोट पड़े। इसके लिए उपस्थित और मतदान करने वाले 528 सदस्यों में से कम से कम 352 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता थी।

इसके बाद विधेयक के पक्ष में 298 वोट और विपक्ष में 230 वोट पड़े। इसके लिए उपस्थित और मतदान करने वाले 528 सदस्यों में से कम से कम 352 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता थी। हालांकि अभी तक सत्रावसान नहीं हुआ है।

कांग्रेस को किस बात का है डर?

अब कांग्रेस को इस बात का डर है कि सरकार बहुमत जुटाकर इस विधेयक को दोबारा पारित कराने की तैयारी में है और दो-तिहाई बहुमत हासिल करने और दोनों विधेयकों को पारित कराने के लिए विपक्षी खेमे की अन्य पार्टियों के साथ पर्दे के पीछे साजिशें रच रही है।

खरगे ने पीएम मोदी को लिखा चौथा पत्र

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 16 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चौथा पत्र लिखकर परिसीमन और महिला आरक्षण विधेयकों पर सर्वदलीय बैठक बुलाने का अपना अनुरोध दोहराया है। खरगे ने सरकार को आगाह किया है कि राष्ट्रीय परिसीमन जैसे संवेदनशील संवैधानिक सुधारों पर एकतरफा रुख अपनाना उचित नहीं है, क्योंकि इसका सीधा असर संसदीय क्षेत्रों की सीमाओं और राज्यों के क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व पर पड़ता है।

पीएम मोदी को लिखे अपने पत्र में खरगे ने याद दिलाया कि उन्होंने सबसे पहले 11 अप्रैल, 2026 को सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की थी, जिसे नजरअंदाज कर 14 अप्रैल की देर शाम विधेयक सार्वजनिक किए गए और 16 अप्रैल को विशेष सत्र बुलाया गया।

हालांकि, 17 अप्रैल को यह संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में जरूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका था। खरगे ने कहा कि इसके बाद उन्होंने 16 जुलाई और 27 अगस्त को भी पत्र लिखे थे और अब चौथी बार सरकार से एकतरफा कदम रोकने और सभी दलों से परामर्श करने की अपील कर रहे हैं।

खरगे को रिजिजू की तीखी प्रतिक्रिया

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा पीएम मोदी को लिखे पत्र पर केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। रिजिजू ने कहा कि बार-बार अनुरोध के बावजूद जब कांग्रेस ने चर्चा के लिए तारीखें तय नहीं कीं, तो सरकार ने व्यापक सहमति बनाने के लिए अन्य राजनीतिक दलों का रुख किया।

उन्होंने बताया कि इस प्रस्तावित कानून पर सपा, डीएमके, वाईएसआरसीपी, एनसीपी (एसपी), शिवसेना (यूबीटी), एआईएमआईएम और बीजद समेत कई प्रमुख दलों के प्रतिनिधियों के साथ परामर्श किया गया है। इसके साथ ही, रिजिजू ने मानसून सत्र के सत्रावसान में हो रही देरी को लेकर खरगे की चिंताओं को पूरी तरह खारिज कर दिया।

तय समयसीमा के भीतर सत्रावसान का कोई नियम नहीं

पुराने उदाहरणों का हवाला देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान में ऐसा कोई नियम नहीं है जो अनिश्चितकाल के लिए स्थगित सदन को एक तय समयसीमा के भीतर सत्रावसान करने को अनिवार्य बनाता हो। उन्होंने कहा कि केवल सत्रावसान न होने से कोई संवैधानिक या प्रक्रियात्मक अनियमितता पैदा नहीं होती है।

क्यों चिंतित हैं विपक्षी दल?

गौरतलब है कि जब संसद को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किया जाता है, न कि सत्रावसान के लिए, तो इसे अल्प सूचना पर सत्र के लिए बुलाया जा सकता है। अनिश्चितकाल के लिए सत्र स्थगित करने का अर्थ है कि सत्र को पुनः बुलाने की तिथि निर्धारित किए बिना अनिश्चित काल के लिए निलंबित कर दिया जाता है। इसका अर्थ सत्र का औपचारिक अंत नहीं है, जिसके लिए भारत के राष्ट्रपति द्वारा आधिकारिक सत्रावसान आदेश की आवश्यकता होती है।

चूंकि परिसीमन एक संविधान संशोधन विधेयक है जिसे अध्यादेश से नहीं लाया जा सकता, इसलिए बिना सत्रावसान के यह विकल्प खुला रखा गया है। इससे संकेत मिलता है कि सरकार अभी भी बहुमत जुटाने के प्रयास में है और यहीं से विपक्ष की एकता का दूसरा सवाल उठता है।

एसआईआर पर एकजुटता, परिसीमन पर भ्रम

पिछले कुछ हफ्तों में एसआईआर के विरोध में 'इंडी ब्लॉक' और अन्य क्षेत्रीय दल कांग्रेस के नेतृत्व में एकजुट नजर आ रहे हैं। डीएमके और आम आदमी पार्टी विपक्षी गठबंधन के कार्यक्रमों से दूर रहने के बावजूद इस मुद्दे पर एकजुट हैं।

लेकिन डीएमके ने मिले-जुले संकेत दिए हैं- एक तरफ तो वह नीट विरोधी आंदोलन का समर्थन कर रही है, वहीं दूसरी तरफ तमिलनाडु में विजय और टीवीके सरकार को समर्थन देने के लिए कांग्रेस पर दोहरे रवैये का आरोप भी लगा रही है। इसके अलावा कुछ ऐसे दल भी हैं जो दोनों पक्षों में रहे हैं, जैसे शिवसेना (यूबीटी) और टीएमसी।

हालांकि, परिसीमन विधेयक पर सरकार की सीधी बातचीत ने विपक्षी खेमे में दुविधा पैदा कर दी है, जिससे एसआईआर पर बनी इस एकजुटता के बिखरने की आशंका बढ़ गई है।

विपक्षी एकजुटता के सामने परिसीमन की चुनौती

एसआईआर (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ बीजेडी समेत कई क्षेत्रीय दल और नागरिक समाज समूह एकजुट हैं। हालांकि, परिसीमन विधेयक पर इन दलों की सरकार के साथ अलग से हो रही बातचीत ने कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है, जिससे इस संयुक्त विरोध के बीच विपक्षी एकजुटता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

भाजपा का क्षेत्रीय दलों को साधने की रणनीति और सियासी दांव

भाजपा परिसीमन विधेयक पर आम सहमति बनाने के लिए क्षेत्रीय दलों को यह भरोसा दिला रही है कि नए बदलावों से लोकसभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व प्रभावित नहीं होगा। सरकार के फॉर्मूले के तहत सीटों का बंटवारा विशुद्ध रूप से वर्तमान आबादी के बजाय सभी राज्यों में समान रूप से 50% सीटें बढ़ाकर किया जाएगा।

इसके साथ ही, महिला आरक्षण विधेयक विपक्षी दलों के लिए दोधारी तलवार साबित हो रहा है। इसका विरोध करने पर भाजपा उन्हें महिला-विरोधी ठहराने का मौका पा जाती है, जबकि समर्थन करने पर क्षेत्रीय दलों को पुरुष नेताओं के राजनीतिक समीकरण बिगाड़े बिना महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने का सीधा लाभ मिलता है। यानी बीजेपी की यह परिसीमन चाल कहीं ना कहीं विपक्षी की एकता में सेंध लगाकर उनमें मतभेद डाल सकती है।