पिछले दिनों दिल्ली आई डॉ. सोमा घोष से अनौपचारिक मुलाकात हुई। बनारस में जन्मी, पली-बढ़ी और अब मुंबई में रह रही सोमा एक समय के महान फिल्मकार नवेंदु घोष की पुत्रवधू है। पिता मनमोहन चक्रवर्ती स्वतंत्रता सेनानी रहे है और मा अर्चना गायिका। वह अपनी संगीत प्रतिभा का श्रेय मा को ही देती है। व्यक्तित्व पर संगीत की कोमलता के साथ पिता की संघर्षशीलता की भी पूरी छाप है। संगीत की दुनिया में भी सोमा प्राचीन वाद्यों को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए संघर्षरत है। आज जो मुकाम उन्होंने हासिल किया है, उसके लिए वह डॉ. राजेश्वर आचार्य से मिली प्रेरणा को बहुत महत्वपूर्ण मानती है। बातचीत की शुरुआत ही उन्होंने 'आप मूलत: कहां से है' से की और यह जानते ही कि मैं गोरखपुर से हू, खुद बताने लगीं कि अगर आचार्य जी ने मुझे नौकरी करने से मना न किया होता तो आज मैं यह मुकाम हासिल न कर सकी होती।

आचार्य जी से आपकी मुलाकात कब हुई और उन्होंने नौकरी करने से आपको मना क्यों किया?

मैं उन दिनों बनारस में थी। संगीत के ही सिलसिले में एक नौकरी के लिए इटरव्यू देने गोरखपुर गई थी। बोर्ड में डॉ.आचार्य भी थे। थोड़ी देर के सवाल-जवाब में ही मेरी रचनात्मक प्रकृति को जानने के बाद उन्होंने कहा कि नौकरी के लिए तुम नहीं बनी हो। हर कलाकार का एक चरम होता है और मैं तुममें एक अलग क्वॉलिटी देख रहा हू। जो प्रयोगधर्मिता तुम्हारे अंदर है, नौकरी में तुम आई तो वह नष्ट हो जाएगी। बेहतर होगा कि संगीत में स्वतंत्र करियर बनाओ। इसके बाद मैंने तमाम मुश्किलों के बावजूद नौकरी के बारे में सोचा ही नहीं और संगीत को स्वतंत्र करियर बनाने की राह पर चल पड़ी।

आपको बिस्मिल्ला खा साहब की दत्तक पुत्री कहा जाता है..?

कहा क्या जाता है, हू ही! उन्होंने स्वयं मुझे अपनी कला विरासत का उत्तराधिकारी बनाया था। बाबा कहते थे, मैं नहीं रहूगा तो तू रहेगी। तू गाएगी तो बिस्मिल्ला की शहनाई तेरे गले में बजेगी।

आपने उनसे शिक्षा ली या..?

संगीत की शिक्षा तो मैंने अपनी मा के अलावा सेनिया घराने के पंडित नारायण चक्रवर्ती और बनारस घराने की श्रीमती बागेश्वरी देवी जी से ली। बाबा का स्नेह तो मुझे बनारस में ही एक आयोजन में प्रस्तुति के चलते मिला। 2001 में एक आयोजन में उन्होंने मेरा गायन सुना और बड़े प्रभावित हुए। तभी उन्होंने कहा कि तुम मेरे साथ जुगलबंदी करोगी। मुझे बतौर बेटी अपनाने के पहले उन्होंने अपने पूरे परिवार को बताया और सबकी अनुमति ली। इसके बाद ही उन्होंने इसकी घोषणा की।

जुगलबंदी कब हुई?

उस्ताद जी के साथ जुगलबंदी की प्रस्तुति 2002 में हुई। मुंबई में जब आयोजन हुआ तो उसमें जया जी और अमिताभ जी भी टिकट लेकर आए थे। नौशाद साहब पहली पंक्ति के श्रोताओं में थे। बाद में उन्होंने ग्रीन रूम में आकर कहा था, 'खयाल गायकी को तो तुमने बिलकुल नई दिशा दी है और ठुमरी, होरी जैसी विधाओं को तो नई पीढ़ी के लिए नए ढग से लोकप्रिय बना रही हो।'

आपने दरबारी महफिल का जो प्रयोग किया, इसकी क्या खासियत है?

असल में यह प्रयोग कम, परपरा का पुनर्जीवन ज्यादा है। दरबारी महफिलें पहले से होती रही है। गौहर जान के समय में तो इसमें शास्त्रीय परपरा का पूरा खयाल रखा जाता था। मैंने उसे आज के समय के समय के अनुकूल पुनर्जीवन देने का प्रयास किया है। शास्त्रीय परपरा का मैं भी काफी हद तक खयाल रखती हू।

आज के गायन में शास्त्रीय परपरा का लोप होता जा रहा है। इसे आप किस रूप में देखती है?

यह तो कहना सही नहीं होगा कि शास्त्रीय परपरा का सिर्फ लोप ही हो रहा है, क्योंकि नई पीढ़ी के गायक अपने ढग से जो नए-नए प्रयोग कर रहे है उसमें बहुत कुछ शास्त्रीय परपरा से भी लिया जा रहा है। अब यह अलग बात है कि कोई उसे सही तरीके से ग्रहण कर रहा है, कोई सिर्फ लकीर पीट रहा है तो कोई ऐसा भी कर रहा है जो नहीं करना चाहिए। कई लोगों ने शास्त्रीय परपरा को बिलकुल छोड़ भी दिया है और इसका असर अच्छा नहीं हुआ है। आप देखें तो पाएंगे कि लोग असमय बूढ़े होते जा रहे है। बच्चों में ही बचपना नहीं बचा है। क्योंकि आज की जो तथाकथित फास्ट म्यूजिक है, उसमें धूम-धड़ाका तो खूब है, पर कहीं कोई रिलैक्स नहीं है। संगीत सुना जाता है रिलैक्स के लिए। हमारी जो परपरा है वह आनंद की है। हम गाते है तो आनंद में रहते है और सुनते है तो भी आनंद में ही रहते है। अपनी परपरा में हम आनंद में रहते है। शायद इसका ही असर है कि हमारा बचपना आज तक बचा हुआ है।

इसके लिए क्या परपरा से बंधे लोग जिम्मेदार नहीं है?

मतलब?

मतलब यह कि युवा वर्ग शास्त्रीय संगीत से जुड़े, इसके लिए शास्त्रीय संगीतज्ञों ने कुछ खास किया क्या?

हा, इस लिहाज से कुछ तो वे जिम्मेदार हैं। पहले लोग गायन के लिए मेहनत करते थे, लंबी रियाज करते थे। वे शास्त्रीय विधान का पूरा ध्यान रखते थे। आज व्यावसायिकता के दौर में यह सब नहीं रह गया है। नतीजा यह हुआ है कि व्याकरण है तो रस गायब और रस लाने की कोशिश है तो व्याकरण को छोड़ दिया जा रहा है। नतीजा यह है कि न तो रस आ रहा है और न शास्त्र ही बच रहा है। युवा वर्ग को जोड़ने के लिए जरूरी है कि रस में गाएं और व्याकरण को ध्यान में रखें। ऐसा बहुत कम लोग कर रहे है।

अगर आप रस में गा रहे है तो सबको अच्छा लगेगा, लेकिन उस चीज को शुद्ध व्याकरण में प्रस्तुत करेगे तो आम लोगों को उसमें मजा नहीं आएगा। पारखी तो सुनता है, यूथ भाग जाता है। यह ध्यान रखना पड़ेगा, तभी हमारा शास्त्रीय संगीत बचेगा। वरना जैसा नौशाद साहब ने कहा है कि शास्त्रीय संगीत भी हमें अमेरिका में जाकर सीखना पड़ेगा, वही होगा।

पुराने वाद्यों को बचाने के लिए जो 'मधु मूर्छना' प्रोजेक्ट आपने शुरू किया, इस ओर आपका ध्यान कैसे गया?

असल में इस ओर सबसे पहले ध्यान दिया था नौशाद साहब ने। हम भी देख रहे है कि हमारे जो पुराने वाद्य थे, उन्हे बजाने वाले बहुत लोग अब दाने-दाने को मोहताज है। कोई तरबूज बेच रहा है तो कोई ठेला खींचने को मजबूर है। जब उन्हे अपनी प्रतिभा और श्रम के अनुकूल मूल्य नहीं मिला तो क्या करते? आखिर भूखे रह कर संगीत की साधना तो की नहीं जा सकती? नौशाद जी ने इस दिशा में काम की कोशिश की, लेकिन बेचारे खुद परेशान हो गए। अब अगर इन्हे बचाने की कोशिश हम नहीं करते है तो अपनी समृद्ध विरासत खो देंगे। उस विरासत को बचाना जरूरी है।

आप अभी इस विरासत को बचाने के लिए क्या कर रही है?

जो करना चाह रही हूं मैं, वह तो नहीं कर पा रही हू। इस पूरे प्रोजेक्ट पर कई करोड़ का खर्च है। इतनी बड़ी पूंजी का इतजाम बनाना अभी संभव नहीं हो पा रहा है। लेकिन अगर पूंजी के इतजाम के इतजार में चुपचाप बैठे रहे तो बहुत देर हो जाएगी। तब तक इस बीच मैं यह कर रही हूं कि अपने हर कंसर्ट में एक प्राचीन वाद्य इट्रोडयूस कर रही हूं और मैं इसका अच्छा असर देख रही हू।

आपके जीवन का बड़ा महत्वपूर्ण हिस्सा बनारस में गुजरा है, जो देश का सबसे प्राचीन जीवंत शहर होने के साथ-साथ भारत की सास्कृतिक राजधानी भी माना जाता है। आपका अनुभव क्या है?

मैं बनारस को हमेशा जीते हुए अपने भीतर महसूस करती हूं। बनारस को शिव की नगरी कहा जाता है और यह अपनी मूल प्रकृति में बिलकुल वैसा ही है भी जैसे कि स्वयं शिव। वहा के लोग भी वैसे ही है। बनारस का मुझ पर खासा असर है और मुझे तो लगता है कि खुद मैं भी ऐसी ही हू।

इष्ट देव साकृत्यायन

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