छोटे और बड़े पर्दे पर अभिनेत्री सुप्रिया पाठक ने तमाम तरह के किरदार बड़ी खूबसूरती से निभाए हैं। फिल्मों और धारावाहिकों में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाने वाली सुप्रिया पाठक एक्टिंग की चलती-फिरती क्लास की मानिंद हैं। उनका मानना है कि आजकल की लड़कियों में गजब का आत्मविश्वास भरा हुआ है...

आपने इतने किरदार निभाए हैं, अपने किस किरदार को आप अपने सबसे नजदीक पाती हैं?

मेरे ख्याल से न तो मैं हंसा हूं, न ही धनकौर और न ही रामभतेरी। मैंने अलग-अलग रोल किए हैं, लेकिन मैं इनकी जैसी नहीं हूं। मैं बहुत सिंपल पर्सन हूं। मेरी जिंदगी में कोई प्रॉब्लम या जटिलता नहीं है। मैं बहुत कंटेंटेड पर्सन हूं। मैं हैप्पी गो लकी पर्सनैलिटी हूं। मेरे साथ वह सब मुश्किलें नहीं हैं, जो और लोगों के साथ होती हैं, लेकिन मुझे आलस में रहना पसंद नहीं। मुझे काम करते रहना अच्छा लगता है।

अभी तक मुझे ऐसा कोई कैरेक्टर नहीं मिला है, जो बिल्कुल मेरे जैसा हो, लेकिन कुछ किरदार हैं जो मेरे नजदीक हैं। जैसे 'वेक अप सिड' में कुछ ठीक था। एक अंग्रेजी फिल्म, जो ऑस्ट्रेलिया में बनी थी, उसमें जो कैरेक्टर था उसका कुछ हिस्सा ऐसा है जिससे मैं रिलेट कर सकती हूं, लेकिन 'धनकौर' जैसा शेड मैं खुद में फील नहीं करती। मैं तो बस 'मैं' हूं।

जब खुद से अलग किरदार निभाने की जिम्मेदारी लेती हैं तो कितनी मेहनत करनी पड़ती है? काफी मेहनत करनी पड़ती है। हर रोल कठिन होता है, लेकिन आपको बैलेंस रखना होता है। क्या सोचकर आप हंसा बनीं?

मेरे पास जयश्री और हंसा में से कैरेक्टर चूज करने का ऑप्शन था। जयश्री का कैरेक्टर पावरफुल था और

हंसा के लिए कुछ करने का अवसर ही नहीं था। मैंने हर तरह की महिला का कैरेक्टर किया था, लेकिन हंसा जैसा कोई नहीं था। इसलिए मैंने कहा कि मैं हंसा का रोल करूंगी।

टीवी पर 'जाने क्या होगा रामा रे'में आपके लुक को रामलीला की धनकौर की तरह देखा गया है। क्या वाकई में ऐसा है?

सीरियल 'जाने क्या होगा रामा रे' में मेरी ड्रेस के रंग रामलीला के हैं, लेकिन रामलीला का कैरेक्टर काफी पावरफुल था। मैं काली बिंदी और काली ड्रेस पहन रही हूं तो ऐसा लग रहा है कि यह कैरेक्टर सेम पैटर्न है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है।

आपको किस तरह के किरदार करने में मुश्किल महसूस होती है?

मुझे कोई कैरेक्टर करने में तभी मुश्किल आती है, जब मैं उस पर विश्वास नहीं कर पाती हूं। जिस किरदार को मैं सही नहीं समझती, जिसे मैं रिलेट नहीं कर सकती, उन्हें खुद में उतारना बेहद मुश्किल हो जाता है।

टीवी आज हर घर की जद में है। क्या इसके कंटेंट को क्वालिटी मेंटेन करने की जरूरत है?

टीवी ग्रेट मीडियम है। यह इतना बड़ा हो गया है कि फिल्म वाले अपनी फिल्मों का प्रमोशन करने टीवी पर आ रहे हैं, लेकिन टीवी को उतना वैल्यू नहीं मिलता जितना कि मिलना चाहिए, जबकि दर्शकों तक पहुंचने की टीवी की पावर फिल्मों से काफी ज्यादा है। एंटरटेनमेंट के लिए इसका अच्छा प्रयोग हो सकता है, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा जिसका मुझे अफसोस है। मैं चाहती हूं कि टीवी मीनिंगफुल हो। इसमें क्वालिटी नजर आए। एक सीरियल आठ-दस साल तक चलता है चाहे कोई उसे देखना चाहे या नहीं।

धारावाहिकों की कहानी की शुरुआत तो बेहतरीन होती है, लेकिन बहुत जल्दी यह भटक जाती है। क्या ऐसा मानती हैं?

जहां तक सास-बहू सागा और एकता कपूर के लाए गए बदलाव की बात है तो लोगों ने इसे काफी पसंद किया

था, लेकिन अब चैनल्स क्या सोचते हैं मुझे पता नहीं। एक सीरियल में मेरी एक लाइन काफी पॉपुलर हुई थी, 'भगवान सबका भला करे और शुरुआत मुझसे करे।' एक दिन जब मैं बिल्डिंग से नीचे उतर रही थी तो बच्चेयही लाइन बोल रहे थे। तब मुझे लगा कि मैंने काफी दिन से यह लाइन बोली नहीं है। जब मैंने सेट पर इस लाइन को बोलने के लिए कहा तो पता चला कि चैनल ने मना किया है। इसके पीछे क्या कारण था मुझे नहीं पता।

आजकल फिल्मों और धारावाहिकों का प्रमोशन इतना आगे क्यों बढ़ गया है?

इन दिनों फिल्म से ज्यादा उसका प्रमोशन महत्वपूर्ण हो गया है। लोगों को थियेटर तक लाने के लिए फिल्मों का प्रमोशन बहुत जरूरी है। आज महंगाई इतनी हो गई है कि फिल्म को प्रोमोट तो करना ही पड़ेगा। ऐसे ही

टीवी एक हैबिट है, जैसे आप रोज एक ही चीज खाने या पीने की आदत डाल लेते हैं वैसे ही शोज देखने की भी आदत पड़ जाती है। एक शो दिलचस्प तरीके से शुरू हुआ और आप उसे देखने लगे। धीरे-धीरे आपको आदत पड़ गई। अब वह सीरियल चलता जा रहा है और आप उसे आदतन देखते चले जा रहे हैं।

ऐसे में कोई नया शो आएगा तो उस आदत को तोड़कर नए पर लाने के लिए सीरियल को प्रोमोट तो करना ही पड़ेगा। अगर वह दिलचस्प होगा तो दर्शक शिद्ब्रट कर जाएंगे। मैं कहती हूं कि अगर कंटेंट अच्छा और

धारावाहिक लंबे न ंिखचे तो अच्छा काम सामने आएगा।

क्या चैनल्स हावी हैं कलाकारों पर?

जब कोई प्रोड्यूसर किसी चैनल के साथ काम करता है तो उसे यह पता नहीं होता कि उसे इसके बाद कोई और शो मिलेगा कि नहीं? ऐसे में यही शो उसकी पूरी जिंदगी का आधार बन जाता है। अब उसे इस शो को चलाना ही होता है चाहे जो भी करना पड़े। अगर चैनल कह देता है कि इसके बाल बदल दो तो प्रोड्यूसर, डायरेक्टर चाहे या नहीं,

उन्हें बाल बदलने ही पड़ते हैं। गंजा भी करना पड़ सकता है। इस तरह से काम कर रहे हैं आजकल लोग। इनके बदलने की गुंजाइश भी नहीं है। इन्हें कंटेंट और क्वालिटी से कुछ लेना-देना नहीं, बस शो चलाना है, अपना घर चलाना है। चैनल जो कहता है उसे प्रोड्यूसर, डायरेक्टर को करना ही पड़ता है।

आजकल जिस तरह से मुद्दों का राजनीतिकरण हो रहा है उसके बारे में आप क्या कहना चाहेंगी?

अगर आप कोई अभियान चलाते हैं तो उसे एक मंजिल तक पहुंचना चाहिए। मैं कहती हूं कि कोई भी मुद्दा हो उसको पूरा करें। उसका समाधान लाएं, जो लोग अपने दिल और दिमाग से सोचते हैं वे यह जानते

हैं कि हमने पुरस्कार वापस करने को मुद्दा बना दिया है। सब इसी पर बात कर रहे हैं, असली बात तो भूल गए हैं। किसी एक ने पुरस्कार वापस किया तो सब करने लगे। क्या आप इससे कुछ बदल पाए हैं। जितने लोग पुरस्कार वापस करते हैं उनकी फोटो अखबार और चैनल्स में नजर आती हैं। क्या मिला है इससे? फिल्म

इंस्टीट्यूट का मुद्दा कितना चला, बच्चों का कितना समय बरबाद हुआ, लेकिन क्या हुआ? मूल समस्या महत्वपूर्ण है, लेकिन उसका राजनीतिकरण हो जाता है तो वह भटक जाती है।

सासू मां के रोल में कैसा महसूस कर रही हैं?

मैं सास बनकर बहुत खुश हूं। मेरी बहू बहुत ही प्यारी है। मुझे डॉटर इन लॉ कहना भी समझ में नहीं आता। मीरा मेरी बेटी है। वह अच्छी लड़की है और मुझे उसके साथ बहुत अच्छा लग रहा है। तीनों बच्चों के साथ मेरी रिलेशनशिप अलग-अलग है। मैं उनके साथ लड़-झगड़ सकती हूं।मैं उनको मना भी सकती हूं, नाराज

भी हो सकती हूं। वे भी ऐसा कर सकते हैं। हम परिवार हैं और जो नया सदस्य यानी बहू घर में आती है

तो परिवार का हिस्सा बन जाती है। उसके साथ नॉर्मल रिलेशनशिप बन जाती है, जिसमें प्यार और तकरार सब

होता है।

क्या महिलाओं में कल्चर एडॉप्ट करने की क्षमता ज्यादा होती है?

इस दुनिया में औरत से ज्यादा कुछ है ही नहीं। मालिक ने जब औरत बनाई थी तो इसमें सारी क्वालिटी डाल दी थी। मैं बिलीव करती हूं कि औरत में हर गुण है। जिस तरह से हम चीजें हैंडल करते हैं, जिस तरह से हम लोगों

से व्यवहार करते हैं, मैं नहीं सोचती कि कोई और ऐसा कर सकता है। पुरुष तो बिल्कुल ही नहीं कर सकते। कल्चर तो क्या, हम किसी भी चीज को एडॉप्ट कर लेते हैं। किसी भी स्थिति में अपने आपको सही बिठा लेते हैं। आज की युवतियां तो काफी कॉन्फिडेंट हैं। इनमें नॉलेज भी काफी है।

यशा माथुर

Posted By: Babita kashyap

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