सचिन की जिंदगी से मिलेगी कभी हार नहीं मानने की प्रेरणा, बोच्चिया खेल में भारत को सफलता दिलाने की खोली संभावनाएं
सचिन चमरिया की कोशिश बोच्चिया खेल में भारत को मेडल दिलाना है। यह खेल पैरालिंपिक में भारत के लिए सफलता की नई संभावनाएं खोल सकता है।

सचिन चमरिया
HighLights
बोच्चिया खेल में भारत को पहचान दिलाने में जुटे सचिन चमरिया
2008 में सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हुए थे सचिन
अतीत को नहीं बदल सकता, वर्तमान को कैसे जीना है यह मेरे हाथ में: सचिन
जागरण न्यूज नेटवर्क, नई दिल्ली। सचिन चमरिया का सफर दृढ़ संकल्प, संघर्ष और कभी हार न मानने के जज्बे की प्रेरक कहानी है। पैरा स्पोर्ट्स की दुनिया में बोच्चिया जैसे खेल को भारत में पहचान दिलाने की उनकी कोशिश बताती है कि सफलता की राह हमेशा पारंपरिक नहीं होती।
लॉन बॉल्स से मिलते-जुलते इस खेल के नियम भले ही आसान नजर आएं, लेकिन इसमें रणनीति, सटीकता और धैर्य की अहम भूमिका होती है। सचिन की कहानी न सिर्फ बोच्चिया जैसे खेल को समझने का मौका देती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि किस तरह यह खेल पैरालिंपिक में भारत के लिए सफलता की नई संभावनाएं खोल सकता है।
विश्वास नहीं डगमगाया
साल 2008 में एक सड़क दुर्घटना में सचिन गंभीर रूप से घायल हो गए थे। हादसे से पहले वह मार्शल आर्ट्स में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके थे और राष्ट्रीय स्तर के ताइक्वांडो चैंपियन थे। वह नियमित रूप से फुटबॉल और क्रिकेट भी खेलते थे। दुर्घटना के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई, लेकिन उन्होंने खुद का आत्मविश्वास कमजोर नहीं होने दिया।
सचिन ने कहा कि मैं अतीत में जाकर अपनी चोट को मिटा नहीं सकता। जो होना था, वह हो गया। मेरे सामने दो रास्ते थे। पहला यह कि मैं हादसे के बारे में सोचकर रोता रहूं और परेशान होता रहूं और दूसरा रास्ता यह था कि मैं सोचूं कि अब अपनी जिंदगी को बेहतर कैसे बना सकता हूं। मैंने दूसरा रास्ता चुना।
परिवार का मिला पूरा साथ
उन्होंने कहा कि मैं अतीत को बदल नहीं सकता, लेकिन वर्तमान को कैसे जीना है, यह मेरे हाथ में है। सचिन ने बताया कि इस मुश्किल दौर में उनके परिवार ने उनका पूरा साथ दिया। परिवार के समर्थन ने उन्हें दोबारा आगे बढ़ने और खेल से जुड़ने की ताकत दी। बोच्चिया के बारे में सचिन ने कहा कि इस खेल में शारीरिक ताकत से ज्यादा दिमाग का इस्तेमाल करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि अगर आप रणनीति नहीं बना सकते तो इस खेल में सफल होना मुश्किल है। इसमें ज्यादा शारीरिक शक्ति की जरूरत नहीं होती, बल्कि आपको लगातार अपने दिमाग का इस्तेमाल करना पड़ता है। सचिन ने कहा कि रणनीति बनाना और हर समय कुछ नया सोचते रहना उन्हें शुरू से पसंद रहा है।
उन्होंने कहा कि मैं उन लोगों में हूं जो खाली नहीं बैठ सकते। मेरा दिमाग हमेशा किसी न किसी चीज में लगा रहता है। शायद यही वजह है कि बोच्चिया का यह पहलू मुझे हमेशा से आकर्षित करता रहा है।
