योगेश शर्मा, नई दिल्ली। इस साल हुए बर्मिंघम कामनवेल्थ गेम्स में जब भारतीय पहलवान मैट पर उतरे थे तो उनसे सिर्फ कुछ पदकों की आशा थी, लेकिन सभी पहलवानों ने 12 पदक जीतकर देश की झोली में डाल दिए।उनके इस दमदार प्रदर्शन के बाद लगा कि कुश्ती का स्तर और पहलवानों का प्रदर्शन काफी ऊंचा उठ गया है, लेकिन अब जैसे ही उनके सामने असली चुनौती आई तो ये कामनवेल्थ गेम्स के सितारे विश्व चैंपियनशिप में गिर गए।

कामनवेल्थ गेम्स में एक के बाद एक पहलवान पदक जीत रहे थे तो बेलग्रेड में विश्व चैंपियनशिप में एक के बाद एक पहलवान हार के साथ बाहर लौट रहे थे। सिर्फ विनेश फोगाट ही भारत को पदक दिला पाईं जिससे भारतीय टीम खाली हाथ स्वदेश नहीं लौटेगी। बजरंग पूनिया (65 किग्रा) क्वार्टर फाइनल में हार गए थे, लेकिन अब वह रविवार को रेपचेज के जरिये कांस्य पदक के लिए खेलेंगे। विश्व चैंपियनशिप में फ्री स्टाइल, ग्रीकोरोमन और महिला वर्ग में मिलाकर कुल 30 भारतीय पहलवान खेलने गए थे और अभी तक हाथ में सिर्फ एक पदक आया है।

भारत के अब स्वर्ण के दावेदारों में ओलिंपिक पदक विजेता रवि दहिया, बजरंग पूनिया, दीपक पूनिया तो महिलाओं में विनेश फोगाट का नाम आता है। इन पहलवानों की जो भी मांग भारतीय कुश्ती महासंघ और भारतीय खेल प्राधिकरण से होती है वो उन्हें पूरा भी करते हैं, लेकिन वे उनकी कसौटी पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं। कामनवेल्थ गेम्स को एशियन गेम्स और ओलिंपिक गेम्स की तुलना में काफी हल्का टूर्नामेंट माना जाता है और ये पहलवान भी अच्छे से जानते हैं। कामनवेल्थ गेम्स के बाद पहलवानों की असली चुनौती विश्व चैंपियनशिप में थी और इसमें सफल होने के बाद वे बड़े आत्मविश्वास के साथ आगामी एशियन गेम्स में खेलने के लिए जाते, लेकिन अब ऐसा नहीं हो पाएगा।

विनेश और बजरंग को छोड़ रवि पदक के मैच तक भी नहीं पहुंच पाए। इस पूरी कुश्ती टीम में ये चारों पहलवानों सबसे ज्यादा अनुभवी हैं और वे सभी इस चैंपियनशिप में पदक भी जीत चुके हैं। ईरान, उज्बेकिस्तान, कजाखस्तान जैसे एशियाई देश हैं जिनके पहलवान काफी मजबूत हैं। अभी भारतीय पहलवान अपने मनमुताबिक शिविर में हिस्सा लेने के लिए ज्यादातर अमेरिका जाते हैं जबकि अमेरिका का कुश्ती में इतना दबदबा नहीं है। अगर देश के पदकों की संख्या विश्व चैंपियनशिप, एशियन गेम्स और ओलिंपिक में बढ़ानी है तो भारतीय कुश्ती महासंघ और भारतीय खेल प्राधिकरण को पहलवानों के लिए ज्यादा शिविर एशियाई देशों में लगाने होंगे।

Edited By: Sanjay Savern