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आर्थिक तंगी, टूटी कॉलर बोन फिर भी नहीं मानी हार, हर्ष सिंह ने मैट पर रचा इतिहास

Published: Sat, 01 Aug 2026 07:57 PM (IST)

दिल्ली के द्वारका स्थित ककरोला इलाके के एक छोटे से 60 गज के घर में रहने वाले 23 वर्षीय जूडो ...और पढ़ें

हर्ष सिंह

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लोकेश शर्मा, जागरण नई दिल्ली। सफलता केवल मेडल जीतने का नाम नहीं है, बल्कि उन संघर्षों को पार करने का भी नाम है जो हर कदम पर इंसान की परीक्षा लेते हैं। दिल्ली के द्वारका स्थित ककरोला इलाके के एक छोटे से 60 गज के घर में रहने वाले 23 वर्षीय जूडो खिलाड़ी हर्ष की कहानी इसी जज्बे की मिसाल है।

सीमित आर्थिक संसाधनों, गंभीर चोट और लगातार मिली असफलताओं के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और आज भारतीय सेना का हिस्सा बनने के साथ देश के लिए पदक जीत रहे हैं। हर्ष सिंह ने राष्ट्रमंडल खेल 2026 की पुरुष 60 किग्रा जूडो स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता है। फाइनल मुकाबले में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के जोशुआ काट्ज को हराकर इतिहास रचा और राष्ट्रमंडल खेलों के जूडो इतिहास में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय पुरुष जूडो खिलाड़ी बने।

 

 

हर्ष ने महज आठ वर्ष की उम्र में जूडो की शुरुआत विक्ट्री जूडो क्लब से की। बाद में उन्होंने दादा देव जूडो क्लब में प्रशिक्षण लिया। उनके पिता उदयभान सिंह फिलहाल कोई काम नहीं करते हैं, जबकि मां बबली सिंह गृहिणी हैं।
परिवार की मासिक आय करीब 10 हजार रुपये होने के बावजूद माता-पिता ने बेटे के सपनों के सामने आर्थिक तंगी को कभी आड़े नहीं आने दिया। बेहतर डाइट, प्रतियोगिताओं में भागीदारी और प्रशिक्षण के लिए परिवार ने हर संभव त्याग किया। हर्ष सिंह भारतीय सेना में सीएमपी कैंप बेंगलुरु में पोस्टेड हैं।

साल 2017 हर्ष के करियर का सबसे कठिन दौर लेकर आया। दिल्ली राज्य स्तरीय प्रतियोगिता के दौरान उनकी कॉलर बोन टूट गई। डाक्टरों के इलाज के साथ-साथ रिश्तेदारों और परिचितों ने उन्हें खेल छोड़ने की सलाह भी दी।
लगातार राष्ट्रीय रैंकिंग प्रतियोगिताओं और अंतरराष्ट्रीय ट्रॉयल्स में तीसरे स्थान पर रह जाने या हार मिलने से उनका आत्मविश्वास भी डगमगाया। कई बार उन्होंने जूडो छोड़ने का मन बनाया, लेकिन माता-पिता, बड़े भाई विनीत और शुरुआती बचपन के कोच सतवान ने उनका मनोबल टूटने नहीं दिया।

 

 

कोच सतवान ने बताया कि कड़ी मेहनत का परिणाम रांची में आयोजित नेशनल गेम्स में मिला, जहां हर्ष ने ब्रॉन्ज, सिल्वर और गोल्ड जैसे अहम पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। उनकी उपलब्धियों के आधार पर वर्ष 2023 में उनका चयन आईटीबीपी में कांस्टेबल के रूप में हुआ। इसके बाद मार्च 2024 में भारतीय सेना में हेड कांस्टेबल के पद पर चयन ने उनके संघर्ष को नई पहचान दी।

हर्ष के बड़े भाई विनीत का कहना है कि सेना में शामिल होने के बाद हर्ष को बेहतर प्रशिक्षण और सुविधाएं मिलीं। जेएसडब्ल्यू की सहायता, जर्मन कोचों का मार्गदर्शन और सीनियर खिलाड़ी निशांत का सहयोग उनके खेल को नई ऊंचाइयों तक ले गया। डाइट, सप्लीमेंट्स और अंतरराष्ट्रीय स्तर की तैयारी ने उनके प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार किया।

हर्ष का कहना है कि मुश्किल परिस्थितियां व्यक्ति को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत बनाती हैं। उनका सफर उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं। यदि परिवार का साथ, गुरु का मार्गदर्शन और खुद पर विश्वास बना रहे, तो कोई भी बाधा मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती।

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