-15वीं विधानसभा चुनाव में बीजद को मिली सफलता

-147 में से 115 पर नवीन पटनायक की पार्टी आगे

-18 सीटों से संतोष करना पड़ सकता है कांग्रेस को

-11 पर भाजपा व निर्दल दो स्थानों पर बनाए हैं बढ़त

-समता क्रांति दल का एक प्रत्याशी जीत सकता है चुनाव

-मतगणना जारी, देर रात तक सभी परिणाम आने की उम्मीद

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राजेश पाण्डेय, भुवनेश्वर : एक बार फिर ओडिशा की बागडोर बीजू जनता दल (बीजद) सुप्रीमो नवीन पटनायक के हाथों में होगी। वह सूबे में लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनेंगे। 15वीं विधानसभा चुनाव में बीजद ने अपनी पताका फहरा दी है।

विधानसभा की कुल 147 सीटों में बीजद को 115 सीटों पर सफलता मिलने की संभावना है। उधर, कांग्रेस 18 सीट पर ही सिमटी नजर आ रही है। भाजपा को 11 व समता क्रांति दल को एक जगह से जीत की उम्मीद है। वहीं दो स्थानों पर निर्दल उम्मीदवार के सिर सेहरा बंधने की आस है। लोकसभा व विधानसभा की मतगणना जारी है। देर रात तक सभी परिणाम आने की उम्मीद जताई जा रही है।

पटनायक पहली बार 5 मार्च, 2000 में सूबे की कमान को संभाले थे। इसके बाद से वे लगातार इस कुर्सी पर विराजमान हैं। सूबे में पहली बार फरवरी, 1952 में विधानसभा चुनाव हुआ। तब कांग्रेस की सरकार बनी और मुख्यमंत्री का ताज नबकृष्ण चौधरी ने पहना। ये कुर्सी पर 1957 तक रहे। अप्रैल, 1957 में हुए चुनाव में कांग्रेस ने दोबारा सरकार बनाई और मुख्यमंत्री हरेकृष्ण महताब बने। 25 फरवरी 1961 से 23 जून 1961 तक यहां पहली बार राष्ट्रपति शासन रहा। तीसरी बार प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की लहर बरकरार रही और जून, 1961 से अक्टूबर, 1963 तक बीजू पटनायक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहे। इसी विधानसभा के कार्यकाल में अक्टूबर 1963 में कांग्रेस के ही विरेन मित्रा को मुख्यमंत्री बनाया गया। यह फरवरी, 1965 तक सीएम रहे। इसके बाद एक बार फिर तीसरी विधानसभा में ही कांग्रेस ने सदाशिव त्रिपाठी को प्रदेश की बागडोर सौंप दी। वह मार्च, 1967 तक कुर्सी बचाए रहे। इसके बाद चौथी विधानसभा का चुनाव हुआ और कांग्रेस हार गई। इसमें स्वतंत्र पार्टी ने सत्ता को झटक लिया और राजेंद्र नारायण सिंहदेव को सिंहासन सौंप दिया। इन्होंने लगभग चार साल तक शासन किया। 11 जनवरी 1971 को प्रदेश में फिर राष्ट्रपति शासन लगा जो तीन अप्रैल, 1971 तक रहा। मार्च 1971 में पांचवीं विधानसभा का चुनाव हुआ और मुख्यमंत्री निर्दल विश्वनाथ दास बने। वे अप्रैल, 1971 से जून, 1972 तक सत्तासीन रहे। कांग्रेस ने उन्हें उखाड़कर इसी विधानसभा में नंदिनी सत्पथी को जून, 1972 में देश की दूसरी और प्रदेश की पहली महिला सीएम बना दिया। इन्होंने लगभग नौ महीने शासन किया। तीन, मार्च, 1973 में राज्य में तीसरी बार राष्ट्रपति शासन लगा। मार्च, 1974 में विस चुनाव हुआ और विजयी कांग्रेस ने मार्च, 1974 में दोबारा नंदिनी सत्पथी को प्रदेश की बागडोर थमा दी। इन्होंने लगभग दो साल नौ महीने तक विकास का वीणा उठाया। प्रदेश में चौथी बार राष्ट्रपति शासन मात्र 13 दिन के लिए लगा। इसके बाद कांग्रेस के विनायक आचार्य को 29 दिसंबर 1976 से लगभग पांच महीने के लिए मुख्यमंत्री का कार्यभार सौंपा गया। अप्रैल 1977 से जून 1977 तक पांचवी बार सूबे को राष्ट्रपति शासन झेलना पड़ा। जून, 1977 में हुए विधानसभा चुनाव में जनता पार्टी विजयी हुई। इसके शासनकाल में नीलमणि राउतराय को मुख्यमंत्री बनाया गया। वे जून, 1977 से फरवरी, 1980 तक कुर्सी पर रहे। फरवरी, 1980 में छठी बार चार महीने के लिए राष्ट्रपति शासन लगा। 1980 में आठवीं विधानसभा के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस की सरकार बन गई। जून, 1980 से मार्च, 1985 जानकी बल्लभ पटनायक मुख्यमंत्री बने। नौवीं विधानसभा के लिए मार्च 1985 में चुनाव हुए और कांग्रेस की सरकार बनी। मुख्यमंत्री की कुर्सी भी पटनायक को ही मिली। वह दिसंबर, 1989 तक कुर्सी पर रहे। दिसंबर, 1989 कांग्रेस के हेमानंद विश्वाल को सूबे का मुखिया बनाया गया। उन्होंने मात्र तीन महीने बचे कार्यकाल को पूरा किया। 1990 में बोफोर्स घोटाले की आग में कांग्रेस जल गई और ओडिशा में जनता दल की सरकार बनी। इस सरकार में बीजू पटनायक ने पूरे पांच साल तक शासन किया। 1995 में हुए चुनाव में फिर से कांग्रेस की सरकार बनी व जानकी बल्लभ पटनायक को प्रदेश का मुखिया बनाया गया। वे फरवरी, 1999 तक मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद दस महीने तककांग्रेस की सरकार गिरधर गोमांग ने चलाई। दिसंबर 1999 में हेमा को पुन: मुख्यमंत्री का भार दिया गया। यह मार्च, 2000 तक कुर्सी पर बने रहे। इसके बाद से नवीन पटनायक मुख्यमंत्री हैं।