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19 साल साथ रही पालतू बकरी की मौत पर मुंडन, ओडिशा की फैमिली ने 21वें दिन कराया मृत्युभोज

Published: Tue, 22 Sep 2026 04:31 PM (IST)

ओडिशा के संबलपुर जिले में एक परिवार ने अपनी पालतू बकरी 'कुंआर' की मृत्यु पर अनोखी मिसाल पेश की, जिसने 19 साल तक उनके साथ जीवन बिताया था।

ओडिशा में पालतू बकरी के निधन पर परिवार ने किया मुंडन और मृत्युभोज, 19 साल का रिश्ता

ओडिशा में पालतू बकरी के निधन पर परिवार ने किया मुंडन और मृत्युभोज, 19 साल का रिश्ता

HighLights

  1. ओडिशा के संबलपुर में परिवार ने पालतू बकरी का श्राद्ध किया।

  2. 19 साल साथ रही बकरी 'कुंआर' के लिए मुंडन और मृत्युभोज।

  3. यह घटना इंसान और बेजुबान के निस्वार्थ प्रेम की मिसाल बनी।

संवाद सूत्र, बामड़ा। आधुनिक दौर में जहां इंसानों के बीच संवेदनाएं दम तोड़ती नजर आती हैं, वहीं ओडिशा के संबलपुर जिले के बामड़ा सीमावर्ती इलाके से इंसान और बेजुबान जानवर के बीच निस्वार्थ प्रेम की एक ऐसी भावुक कर देने वाली कहानी सामने आई है, जो हर किसी का दिल छू रही है।

तपगुंजा गांव में एक परिवार ने अपनी पालतू बकरी की मौत पर न सिर्फ मुंडन कराया, बल्कि किसी सगे-संबंधी की तरह ही पूरे विधि-विधान से उसका श्राद्धकर्म और मृत्युभोज भी आयोजित किया। पशु-प्रेम का यह विरला दृश्य पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।

19 वर्षों तक आंगन में गूंजती रही कुंआर की चंचलता

जाममाल ग्राम पंचायत के पूर्व नायब सरपंच, सामाजिक कार्यकर्ता और पश्चिम ओडिशा यादव सेना के मुख्य निदेशक अभिराम करसेल के परिवार के लिए 'कुंआर' महज एक पालतू बकरी नहीं, बल्कि उनके घर का अभिन्न सदस्य था। करीब 19 वर्षों तक इस परिवार के आंगन में कुंआर की चंचलता गूंजती रही।

परिवार के सदस्यों का उससे ऐसा लगाव था कि नाम पुकारते ही वह दौड़ा चला आता था। इंसानी भाषा भले ही वह न बोल पाता हो, लेकिन जज्बातों की डोर इतनी मजबूत थी कि वह परिवार के सुख-दुख का मूक साक्षी बन चुका था।

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बकरी और इंसान के बीच मिटा हर फासला

19 साल का यह सफर इतना आत्मीय था कि बकरी और इंसान के बीच का हर फासला पूरी तरह मिट चुका था। बीते 29 अगस्त को जब कुंआर ने अपनी अंतिम सांस ली, तो करसेल परिवार पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। घर में वैसा ही मातम पसर गया, जैसे किसी अपने के दुनिया से चले जाने पर होता है।

इस बेजुबान साथी की आत्मा की शांति और उसके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए परिवार ने वह सब किया, जो एक सनातन परिवार अपने प्रियजन के लिए करता है।

मौत के 21वें दिन मृत्युभोज

कुंआर के सम्मान में अभिराम करसेल ने अपना मुंडन कराया। मौत के 21वें दिन पूरे विधि-विधान से श्राद्धकर्म और एक विशाल मृत्युभोज का आयोजन किया गया, जिसमें न केवल सगे-संबंधी, बल्कि गांव के युवा, महिलाएं और बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।

इस अवसर को और भी पवित्र बनाने के लिए गांव में भागवत कीर्तन का आयोजन भी किया गया। कीर्तन गायक एवं सामाजिक कार्यकर्ता बनमाली खरसले के नेतृत्व में हुए इस आध्यात्मिक कार्यक्रम ने माहौल को बेहद गमगीन और भावुक बना दिया।

कार्यक्रम में विशेष रूप से पहुंचे पश्चिम ओडिशा यादव सेना के प्रमुख वेदव्यास भैंसा ने इस अनोखी पहल की सराहना करते हुए समाज को पशु-पक्षियों के प्रति दया, प्रेम और मानवीय संवेदनाएं जिंदा रखने का संदेश दिया।

उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि बेजुबानों के प्रति करुणा और असहायों की मदद ही सच्चे मनुष्य की पहचान है। इस मृत्युभोज और श्रद्धांजलि सभा में श्रीकांत बाग, दुबराज बाग, पवन बाग, इंद्रजीत करसेल, रंजीत बाग, दिलीप बाग, घनश्याम बालुआ और दिनबंधु खरसले समेत सैकड़ों ग्रामीणों ने नम आंखों से कुंआर को विदाई दी।

कुंआर आज भले ही इस दुनिया में नहीं है, लेकिन 19 सालों की उसकी मीठी यादें करसेल परिवार के दिलों में हमेशा धड़कती रहेंगी।

एक पालतू बकरी के लिए मुंडन, क्रियाकर्म और मृत्युभोज का यह आयोजन पूरे देश के लिए इस बात की एक मार्मिक नजीर बन गया है कि जब स्नेह सच्चा हो, तो इंसान और पशु के बीच कोई भेद नहीं रह जाता, वहां सिर्फ और सिर्फ प्रेम शेष रहता है।

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