कटहल के छिलकों से अब शुद्ध होगा पीने का पानी, NIT राउरकेला ने विकसित की सस्ती तकनीक
एनआईटी राउरकेला के शोधकर्ताओं ने कटहल के छिलकों का उपयोग कर पानी से फ्लोराइड हटाने की एक सस्ती और टिकाऊ तकनीक विकसित की है।

कटहल के छिलकों से शुद्ध होगा पीने का पानी (एआई जेनरेटेड तस्वीर)
HighLights
कटहल के छिलकों से फ्लोराइड हटाने की तकनीक।
एनआईटी राउरकेला ने विकसित की सस्ती, टिकाऊ विधि।
10 मिनट में 90% से अधिक फ्लोराइड खत्म।
जागरण संवाददाता, राउरकेला। देश के कई राज्यों में भूजल में फ्लोराइड की गंभीर समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए एक बड़ी राहत की खबर है। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) राउरकेला के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी किफायती और टिकाऊ तकनीक विकसित की है, जो कटहल के बेकार समझे जाने वाले छिलकों की मदद से महज 10 मिनट में पानी से 90 प्रतिशत से अधिक फ्लोराइड को खत्म कर सकती है।
कृषि अपशिष्ट को उपयोगी संसाधन में बदलने वाले इस खास नवाचार को पेटेंट भी मिल चुका है और इसे राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य व जल-शोधन के क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी माना जा रहा है।
पानी को शुद्ध करने के लिए आरओ का इस्तेमाल
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, पीने के पानी में फ्लोराइड की अधिक मात्रा मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। इसके कारण बच्चों और वयस्कों में दंत फ्लोरोसिस और अस्थि फ्लोरोसिस (हड्डियों की बीमारी) जैसी गंभीर समस्याएं जन्म लेती हैं।
वर्तमान में पानी को शुद्ध करने के लिए रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) जैसी तकनीक का व्यापक इस्तेमाल होता है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी खामी यह है कि इसमें भारी मात्रा में पानी व्यर्थ हो जाता है और यह पानी से कैल्शियम तथा मैग्नीशियम जैसे शरीर के लिए जरूरी खनिजों को भी नष्ट कर देता है।
इसके अलावा आयन एक्सचेंज जैसी विधियों में रसायनों का प्रयोग होता है। इसके उलट, एनआईटी राउरकेला की यह नई तकनीक पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल है। एनआईटी राउरकेला के रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग की प्रोफेसर सुस्मिता मिश्रा और शोधार्थी डॉ. प्रतिमा मिंज की टीम ने इस अनूठी तकनीक को ईजाद किया है।
परीक्षणों में उत्साहजनक परिणाम मिले
प्रो. सुस्मिता मिश्रा के अनुसार, इस तकनीक का मुख्य विचार कृषि अपशिष्ट सामग्री का उपयोग जल-शुद्धिकरण के संसाधन के रूप में करना है। शोध टीम ने फेंके जाने वाले कटहल के छिलकों से सक्रिय कार्बन (एक्टिवेटेड कार्बन) तैयार किया और पानी से फ्लोराइड को सोखने की इसकी क्षमता को और अधिक बढ़ाने के लिए इसे जिरकोनियम नामक तत्व के साथ संशोधित किया।

डॉ. प्रतिमा मिंज, रिसर्च ग्रेजुएट, एनआईटी राउरकेला
प्रयोगशाला परीक्षणों में इसके बेहद उत्साहजनक परिणाम मिले हैं। परीक्षण के दौरान 1 से 5 मिलीग्राम प्रति लीटर फ्लोराइड सांद्रता वाले दूषित जल से इस सामग्री ने 10 से 20 मिनट के भीतर 90 से 97 प्रतिशत तक फ्लोराइड हटाने में सफलता हासिल की। इस शानदार और उपयोगी शोध के लिए एनआईटी की टीम को अगस्त 2025 में पेटेंट भी प्राप्त हो चुका है।

प्रोफेसर सुस्मिता मिश्रा, प्रोफेसर, एनआईटी राउरकेला
वर्तमान में यह शोध प्रौद्योगिकीय तत्परता के चौथे स्तर (टीआरएल-4) तक पहुंच गया है। शोध दल के आकलन के अनुसार, बिजली और रसायनों की लागत को मिलाकर प्रयोगशाला स्तर पर इस जल-शोधन सामग्री को तैयार करने की लागत लगभग 37 रुपये प्रति ग्राम आती है।
ग्रामीण क्षेत्रों के लिए वरदान साबित होगी तकनीक
भारत के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के लिए यह तकनीक एक वरदान साबित हो सकती है, जहां आज भी जल-शोधन के बुनियादी ढांचे का अभाव है। अगले चरण में शोध दल इसका एक भौतिक प्रोटोटाइप (मॉडल) विकसित करने की योजना बना रहा है, ताकि इसका दीर्घकालिक प्रदर्शन परखा जा सके और इसे जल्द ही आम जनमानस के उपयोग के लिए सुलभ कराया जा सके।
