ओरल कैंसर के इलाज में मिली बड़ी कामयाबी : NIT राउरकेला और IISER बरहमपुर ने खोजी नई दवा, पेटेंट मिला
एनआईटी राउरकेला और आइजर बरहमपुर के शोधकर्ताओं ने मुंह के कैंसर के इलाज के लिए एक नई दवा विकसित की है, जिसे भारत सरकार से पेटेंट मिला है।

रिसर्च करने वाली टीम। (जागरण)
HighLights
एनआईटी राउरकेला और आइजर बरहमपुर ने मुंह के कैंसर की नई दवा बनाई।
भारत सरकार ने इस जीवनरक्षक खोज को पेटेंट प्रदान किया है।
दवा कैंसर कोशिकाओं को कम मात्रा में नष्ट करने में सक्षम है।
जागरण संवाददाता, राउरकेला। भारत में मुंह के कैंसर (ओरल कैंसर) के लगातार बढ़ते मामलों और इसके इलाज में आने वाली चुनौतियों के बीच देश के वैज्ञानिकों ने एक बड़ी उम्मीद जगाई है।
राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) राउरकेला और भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आइजर) बरहमपुर के शोधकर्ताओं ने संयुक्त रूप से मुंह के कैंसर के इलाज के लिए एक नई दवा (फॉर्मूलेशन) विकसित की है।
चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में इसे एक बड़ी कामयाबी माना जा रहा है, क्योंकि भारत सरकार ने इस जीवनरक्षक खोज को डिजाइन, सिंथेसिस, एंड फॉर्मूलेशन ऑफ ए कोटारनिन डेरिवेटिव फॉर ओरल कैंसर थेरेपी शीर्षक के तहत पेटेंट (पेटेंट संख्या 604125) भी प्रदान कर दिया है।
वैज्ञानिकों ने कोटारनिन नामक एक रासायनिक तत्व के आधार पर एक नया मॉलिक्यूलर डेरिवेटिव (अणु) और उसका विशेष फॉर्मूलेशन तैयार किया है।
बेहद कारगर है नई दवा
आसान शब्दों में कहें तो यह मुंह के कैंसर के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार किया गया एक नया रासायनिक हथियार है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि यह नई दवा मुंह के कैंसर, विशेषकर जीभ के कैंसर की कोशिकाओं को नष्ट करने में बेहद कारगर है।
सबसे बड़ी बात यह है कि दवा की बहुत ही कम मात्रा भी कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने में सक्षम है, जिससे भविष्य में मरीजों को भारी-भरकम डोज से बचाया जा सकेगा।
भारत में कैंसर से होने वाली मौतों में मुंह के कैंसर का एक बहुत बड़ा हिस्सा है। अक्सर लोग शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं और जब तक बीमारी पकड़ में आती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है।
इसके अलावा, वर्तमान में मौजूद कैंसर के पारंपरिक इलाजों (जैसे कीमोथेरेपी या रेडिएशन) के कई दुष्प्रभाव होते हैं जो मरीज के शरीर को तोड़ देते हैं।
इसी समस्या को सुलझाने के लिए कम दुष्प्रभावों और अधिक प्रभाव वाली इस नई दवा को मेडिसिनल केमिस्ट्री और फॉर्मूलेशन साइंस के बेहतरीन तालमेल से तैयार किया गया है।
एनआईटी राउरकेला के प्रो. विवेकानंद मल्लिक स्पष्ट करते हैं कि पेटेंट मिलना पहला बड़ा और सफल कदम है, लेकिन दवा को सीधे इंसानों को देने से पहले कुछ जरूरी प्रक्रियाएं बाकी हैं। अब इस दवा का प्री-क्लिनिकल ट्रायल होगा, यानी पशुओं पर इसका परीक्षण करके इसकी पूरी सुरक्षा जांची जाएगी।
पशुओं पर सफल होने के बाद इसे इंसानों पर क्लीनिकल ट्रायल के लिए ले जाया जाएगा। इन सभी चरणों में पूरी तरह सुरक्षित और प्रभावी साबित होने के बाद ही इसे आम मरीजों के इलाज के लिए बाजार में उतारा जाएगा।
सालों की मेहनत का फल
यह सफलता रातों-रात नहीं मिली है, बल्कि इसके पीछे एनआईटी राउरकेला के रसायन विज्ञान (केमिस्ट्री) और जीवन विज्ञान (लाइफ साइंस) विभाग तथा आइजर बरहमपुर के रसायन विज्ञान विभाग की एक समर्पित टीम की सालों की मेहनत है।
इस पेटेंट में आविष्कारकों के तौर पर एनआईटी राउरकेला से लक्ष्मीप्रिया प्रस्टी, प्रो. हरेकृष्ण साहू, श्रुति बिस्वाल और प्रो. विवेकानंद मल्लिक का नाम शामिल है।
वहीं, आइजर बरहमपुर की ओर से प्रद्योत कुमार बेहरा और प्रो. लक्ष्मीधर राउत ने इस शोध को सफल बनाने में अपना अहम योगदान दिया है। प्रो. हरेकृष्ण साहू के अनुसार, यह शोध स्वास्थ्य क्षेत्र की जटिल चुनौतियों से निपटने के लिए विभिन्न विभागों के आपसी सहयोग का बेहतरीन उदाहरण है।
