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भारतीय वायुसेना के मिग-21 का 62 साल का गौरवशाली सफर समाप्त, शौर्य गाथा अब सुनाबेड़ा के HAL संग्रहालय में

Published: Thu, 15 Oct 2026 11:38 AM (IST)

भारतीय वायुसेना में 62 साल की सेवा के बाद मिग-21 विमानों का युग समाप्त हो गया है। इसका शौर्य अब ...और पढ़ें

सुनाबेड़ा स्थित एचएएल संग्रहालय में अपनी वीरता की गाथा सुनाएगा, जिसने कई युद्धों में देश को विजय दिलाई।

सुनाबेड़ा स्थित एचएएल संग्रहालय में अपनी वीरता की गाथा सुनाएगा, जिसने कई युद्धों में देश को विजय दिलाई।

HighLights

  1. मिग-21 ने भारतीय वायुसेना में 62 साल सेवा दी।

  2. इसका पराक्रम 1971 युद्ध, कारगिल में महत्वपूर्ण रहा।

  3. अब सुनाबेड़ा एचएएल संग्रहालय में इसकी वीरगाथा।

जागरण संवाददाता, भुवनेश्वर। भारतीय वायुसेना में 62 साल तक देश की सेवा करने के बाद मिग विमानों का युग समाप्त हो गया है।पाकिस्तान को कई युद्धों में चुनौती देने वाला मिग-21 अब सुनाबेड़ा स्थित एचएएल संग्रहालय में अपनी वीरगाथा बयां कर रहा है।

नए युद्ध विमानों के शामिल होने के बावजूद मिग-21 का पराक्रम आज भी याद किया जाता है। रूस में विकसित मिग-21 की तकनीक अपनाकर भारत ने इसका निर्माण किया था। यह भारतीय वायुसेना का पहला सुपरसोनिक फाइटर जेट बना।

1968 में मिग इंजन निर्माण की जिम्मेदारी सुनाबेड़ा एचएएल को मिली। एचएएल ने मिग-21, मिग-27 और मिग-29 के इंजन सफलतापूर्वक बनाए। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में मिग-21 ने भारतीय सेना को बढ़त दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

इसने पाकिस्तान के चार पीएएफ-104एएस, दो एफ-6सीएस, एक एफ-86एफ सबर और एक सी-130ई हरक्यूलिस विमान को नष्ट किया, जबकि दो एफ-104एएस विमानों को निष्क्रिय कर दिया। इसके प्रदर्शन से प्रभावित होकर इराक समेत कई देशों ने भारत से विमान और तकनीक लेने में रुचि दिखाई।

कारगिल युद्ध में मिग विमानों ने 16,000 फुट की ऊंचाई पर उड़ान भरकर दुश्मन को रोकने में भूमिका निभाई। 1999 में भारतीय सीमा में घुसे पाकिस्तान के ब्रिके-1150 अटलांटिक मैरीटाइम पेट्रोल विमान को भी मिग ने मार गिराया।

2019 में ग्रुप कैप्टन अभिनंदन वर्तमान ने मिग से पाकिस्तान के अमेरिकी विमान को गिराया। आपरेशन सिंदूर में भी दो मिग फाइटर जेट ने पाकिस्तानी आतंकी ठिकानों पर सीधे प्रहार किए।बदलती युद्ध रणनीति के साथ मिसाइल और ड्रोन सेना में शामिल हुए हैं। तेजस, राफेल और सुखोई जैसे आधुनिक विमान आने के बाद मिग ने सम्मान और गर्व के साथ सेवा से विदाई ली।

'फ्लाइंग कॉफिन' से लेकर 'आसमान के बाज़' तक का सफर

समय के साथ जहां एक ओर रक्षा विशेषज्ञों ने इसे इसके पुराने होते प्रारूप के कारण 'फ्लाइंग कॉफिन' का नाम दिया, वहीं दूसरी ओर युद्ध के मैदान में इसने हमेशा 'आसमान के बाज़' की तरह दुश्मनों के छक्के छुड़ाए।

पायलटों के बीच यह विमान अपनी असाधारण गति (स्पीड) और वर्टिकल क्लाइंबिंग क्षमता के लिए खासी लोकप्रियता रखता था। यही वजह है कि तकनीक पुरानी होने के बावजूद इसने रिटायरमेंट तक देश की सरहदों की मुस्तैदी से रक्षा की।

सुनाबेड़ा का विशेष योगदान: जहां धड़कता था मिग का दिल

ओडिशा के सुदूर इलाके में स्थित सुनाबेड़ा स्थित एचएएल (HAL) संयंत्र का मिग के इतिहास से एक गहरा और भावनात्मक रिश्ता रहा है। यहां केवल इंजन बनाने का काम नहीं होता था, बल्कि यह मिग-21, मिग-27 और मिग-29 जैसे दिग्गजों को जीवन देने का पावरहाउस था।

अब सुनाबेड़ा संग्रहालय में मिग-21 की मौजूदगी आने वाली पीढ़ियों और एयरोस्पेस के छात्रों को भारत की आत्मनिर्भरता और तकनीकी महारत की प्रेरणा देती रहेगी।

भविष्य की ओर कदम: नए युग के 'रक्षक'

मिग-21 का जाना एक युग के अंत जैसा जरूर है, लेकिन यह भारतीय वायुसेना की आधुनिकता और बढ़ती ताकत का प्रतीक भी है। अब स्वदेशी तकनीक से बने 'तेजस', अत्याधुनिक 'राफेल' और शक्तिशाली 'सुखोई' भारतीय आकाश की नई पहचान बन चुके हैं। पुरानी पीढ़ियों के अनुभव और नई तकनीक के इस संगम के साथ भारतीय वायुसेना पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली और आत्मनिर्भर हो चुकी है।

एक नजर में मिग-21 का सफर

  • सेवा काल: 62 वर्ष (भारतीय वायुसेना का पहला सुपरसोनिक फाइटर जेट)
  • इंजन निर्माण केंद्र: एचएएल (HAL) सुनाबेड़ा, ओडिशा (1968 से मिग इंजनों का सफल निर्माण)
  • प्रमुख युद्ध/अभियान: 1971 का भारत-पाक युद्ध, कारगिल युद्ध (1999), बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद अभिनंदन का पराक्रम, और ऑपरेशन सिंदूर।
  • अब कहां है इतिहास: ओडिशा के सुनाबेड़ा स्थित हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) संग्रहालय में इसकी वीरगाथा को जीवंत किया गया है।