बरसात में भी सूखी महेंद्रतनया नदी: गजपति जिले की जीवनरेखा पर मंडराया संकट, वैज्ञानिक अध्ययन की उठी मांग
बरसात में भी गजपति जिले की जीवनरेखा महेंद्रतनया नदी सूख रही है, जिससे कृषि और जनजीवन पर संकट गहरा गया ...और पढ़ें

बरसात में भी सूखी महेंद्रतनया नदी
HighLights
बरसात में भी महेंद्रतनया नदी का जलप्रवाह कम।
गजपति जिले की कृषि और जनजीवन पर संकट।
नदी सूखने के कारणों के लिए वैज्ञानिक अध्ययन की मांग।
जागरण संवाददाता, भुवनेश्वर। बरसात के मौसम में भी नदी में सामान्य जलप्रवाह नहीं है। कहीं पानी ठहरा हुआ है तो कहीं नदी का तल सूखा पड़ा है। स्थिति यह है कि नदी के भीतर घास-लताएं और छोटे-छोटे पौधे तक उगने लगे हैं। गजपति जिले की जीवनरेखा मानी जाने वाली महेंद्रतनया नदी की ऐसी स्थिति को लेकर चिंता बढ़ गई है।
नदी के जलप्रवाह में कमी के वास्तविक कारणों का अभी तक स्पष्ट पता नहीं चल पाया है। हालांकि, महेंद्रगिरि के पर्यावरण, जंगलों और प्राकृतिक जलस्रोतों पर बढ़ते दबाव के संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
आशंका है कि इसका असर नदी के निचले हिस्सों में पानी की उपलब्धता और जनजीवन पर भी पड़ सकता है। ऐसे में सरकारी स्तर पर वैज्ञानिक अध्ययन कराने और पर्यावरणीय प्रभावों की जांच करने की मांग उठने लगी है।
कई क्षेत्रों की कृषि, जलापूर्ति और जनजीवन से जुड़ी है नदी
महेंद्रतनया नदी गजपति जिले के कई क्षेत्रों की कृषि, जलापूर्ति और जनजीवन से जुड़ी हुई है। नदी के जलप्रवाह पर निर्भर निचले इलाकों के लिए पानी की कमी चिंता का विषय बनती जा रही है।
बताया जा रहा है कि पिछले कुछ वर्षों से इस तरह की स्थिति देखने को मिल रही है। हालांकि, वर्षा की मात्रा, जलग्रहण क्षेत्र की स्थिति, भूजल स्तर और प्राकृतिक जलस्रोतों में आए बदलावों से संबंधित ठोस आंकड़े उपलब्ध नहीं होने के कारण जलप्रवाह में कमी के वास्तविक कारणों की पहचान नहीं हो पाई है।
तितली चक्रवात के बाद प्रभावित हुआ था महेंद्रगिरि का प्राकृतिक परिवेश
वर्ष 2018 में तितली चक्रवात के कहर के बाद महेंद्रगिरि क्षेत्र का प्राकृतिक पर्यावरण व्यापक रूप से प्रभावित हुआ था। पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन और मिट्टी धंसने के कारण भू-सतह में बदलाव आए थे। इसके बाद कुछ झरनों के जलप्रवाह और उनकी दिशा प्रभावित होने तथा पहाड़ की तलहटी वाले क्षेत्रों में जलसंकट उत्पन्न होने की बात सामने आई थी।
हालांकि, इन घटनाओं और वर्तमान में महेंद्रतनया नदी के जलप्रवाह में आई कमी के बीच सीधा संबंध है या नहीं, इसकी वैज्ञानिक जांच आवश्यक है।
उद्गम स्थल के आसपास खुदाई
महेंद्रगिरि की चोटी और महेंद्रतनया नदी के उद्गम स्थल के आसपास खुदाई तथा सीमेंट-कंक्रीट के निर्माण कार्यों से प्राकृतिक पर्यावरण और जलस्रोत प्रभावित हो रहे हैं या नहीं, इसकी भी जांच होनी चाहिए। इस संबंध में पर्यावरणीय प्रभावों के आकलन की मांग की जा रही है।
पहाड़ों के जंगल, मिट्टी और प्राकृतिक भू-संरचना वर्षा के पानी को संचित करने के साथ-साथ धीरे-धीरे प्राकृतिक जलस्रोतों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस प्राकृतिक व्यवस्था में किसी प्रकार की बाधा आने पर झरनों के जलप्रवाह और भूजल को संचित करने की क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसलिए पर्यावरण में बदलाव को लेकर आशंकाएं जताई जा रही हैं, लेकिन वैज्ञानिक अध्ययन और ठोस आंकड़ों के बिना किसी एक कारण को इसके लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।
वैज्ञानिक अध्ययन कराने की मांग
महेंद्रगिरि के पर्यावरण का संरक्षण और महेंद्रतनया नदी के प्राकृतिक जलप्रवाह को बनाए रखना अब महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। समाजसेवी संजय राउत ने नदी के उद्गम स्थल, पहाड़ी झरनों और जलग्रहण क्षेत्र की वर्तमान स्थिति का सरकारी स्तर पर विस्तृत अध्ययन कराने की मांग की है।
इसके साथ ही महेंद्रगिरि में चल रहे खुदाई और निर्माण कार्यों के पर्यावरणीय प्रभावों की जांच करने तथा आवश्यकता पड़ने पर नियमन संबंधी कदम उठाने की मांग भी की जा रही है।
विशेषज्ञों के अध्ययन के लिए नदी के जलप्रवाह, वर्षा की मात्रा, जंगलों के आवरण, भूजल स्तर और झरनों की स्थिति से संबंधित दीर्घकालिक आंकड़े जुटाना जरूरी है। इससे नदी की जलधारा में कमी के वास्तविक कारणों की पहचान करने में मदद मिल सकती है।
महेंद्रतनया केवल एक नदी नहीं है, बल्कि गजपति जिले के अनेक क्षेत्रों में जीवन और आजीविका का आधार भी है। ऐसे में बरसात के मौसम में भी नदी की जलधारा के सिमटने के कारणों का पता लगाना और निचले इलाकों में पानी की उपलब्धता पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का आकलन करना आवश्यक है।
अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर नदी के प्राकृतिक जलप्रवाह को बनाए रखने और महेंद्रगिरि के पर्यावरण की रक्षा के लिए समय रहते प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए।
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