जासं, भुवनेश्वर : चक्रवात फणि से ओडिशा में हुई तबाही के सात दिन बीत गए हैं पर राहत एवं पुनर्वास कछुआ चाल से चल रहा है। यूं तो फणि का असर तटीय जिलों समेत 14 जिलों पर रहा, लेकिन सबसे ज्यादा तबाही का मंजर पुरी, खुर्दा (भुवनेश्वर) और कटक में दिखा। चक्रवात गुजरने के बाद पुरी अभी कटऑफ एरिया है। बाकी क्षेत्रों में पानी, बिजली, संचार व्यवस्था धीरे-धीरे सुधर रही है। राहत, पुनर्वास एवं उजड़े गावों के पुनर्निर्माण की दिशा में हो रहे धीमे कायरें से लोगों की परेशानिया बढ़ी हैं।

नीति आयोग की स्थायी समिति के सदस्य पूर्व सूचना आयुक्त जगदानंद रिलीफ के लोगों तक पहुंचने और क्षति का आकलन के लिए सिविल सोसाइटी की मदद से जमीनी हकीकत पता करके शासन को रिपोर्ट दे रहे हैं ताकि लोगों को राहत जल्द मिले। उनके साथ देसी-विदेशी 40 गैर सरकारी संगठन सहयोग कर रहे हैं। जगदानंद सीवाईएसडी के सह-संस्थापक भी हैं। वह कहते हैं कि सड़कों पर पड़े हाई, लो पॉवर की बिजली की लाइन के खंभे, विशाल वृक्ष समेत राहत के अन्य कायरें में काफी तेजी लाकर बिजली, पानी, संचार व्यवस्था सुदृढ़ हो सकती थी यदि राज्य सरकार सेना की सहायता ले लेती। कहा कि उन्हें अच्छी तरह याद है जब 1999 में सुपर साइक्लोन की तबाही से दस हजार लोगों की मौत और अरबों की संपत्ति का नुकसान हुआ था। ओडिशा में सेवा बहाली में तब सेना की मदद ली गई थी। फणि की तीव्रता सुपर साइक्लोन से कम नहीं थी। फिर राज्य सरकार ने सेना की मदद क्यों नहीं ली, यह समझ के परे है। कहा कि मैनें तो ग्राम्य विकास मंत्रालय को सुझाव पत्र लिखा है। बताया है कि फणि से प्रभावित गावों के पुनर्निर्माण के लोगों को मनरेगा के तहत मजदूरी दी जा सकती है। गाव वालों को पैसा भी मिल जाएगा और उजड़े गावों का पुनर्निर्माण भी हो जाएगा। रबी की फसल बिक्री के लिए मंडी खोल देनी चाहिए।

Posted By: Jagran

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